चौपाई छंद - मात-पिता की सेवा
चौपाई छंद - मात-पिता की सेवा
चौपाई छंद - मात-पिता की सेवा माता पिता की कर ले सेवा। खायेगा तू मिश्री मेवा।। मान ले प्यारे मेरा कहना। जीवन का ये सुंदर गहना।। सबके कहाँ नसीब में होता। जान-बूझकर तू क्यों खोता।। भाग्य-भाग्य की अलग कहानी। जिसे सुनाती दादी-नानी।। धरती पर जबसे वो लाए। आप स्वयं को हैं बिसराए।। बच्चों खातिर दिन भर खटते। फिर भी कभी नहीं है थकते।। जीवन का आधार हैं बच्चे। कहते सदा मात-पितु सच्चे।। समय खेलता खेल निराला। जिसने हमको दिया निवाला।। आई आज हमारी बारी। बूढ़े हुए पिता महतारी।। नहीं करो सेवा उपकारी। कर्ज़ मुक्त कब हो संसारी।। ईश्वर कृपा मातु-पितु साथा। नहीं पीटिए अपना माथा।। सबसे बड़े मातु-पित देवा। सेवा करके खाओ मेवा।। अपना जीवन धन्य बनाओ। इनका दिल न कभी दुखाओ।। सारे तीर्थ इन्हीं चरणों में। आप बसा लो रोम-रोम में।। यमराज मित्र का मानो कहना। आशीषों का पाओ गहना।। सेवाव्रती आप कहलाओ। अपना जीवन धन्य बनाओ।। सुधीर श्रीवास्तव
