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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

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ब्रेक अप

ब्रेक अप

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खामोश आसमां कब से रोए जा रहा है 

पूनम का चांद बादलों में खोए जा रहा है 

ठहर गया वक्त गुमसुम है बहारों का मौसम 

ये ब्रेक अप इश्क की जान लिए जा रहा है 

तुझे बेवफा कह दूं तो इश्क की तौहीन होगी 

मैं चाहे जैसे रहूं पर तू तो बड़ी जहीन होगी 

अपना क्या है, जी लेंगे ये सोचकर ही जाना 

तेरी जिंदगी किसी और के साथ हसीन होगी 

ये ब्रेक अप का खेल कभी अच्छा नहीं होता 

मुहब्बत के खेल में हर कोई कच्चा नहीं होता 

यूं तो मिल जायेंगे हजारों प्यार करने वाले तुम्हें 

मगर हर कोई आशिक हमसा सच्चा नहीं होता! 


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