बनारस घाट और गंगा
बनारस घाट और गंगा
वह बनारस सा शीतल प्रिय था, और मैं गंगा की लहर जैसी मचलती थी।
वह बनारस के घाट जैसा संतोष था, पर मुझमें गंगा जैसा संतोष नहीं था।
मेरी आकांक्षाएँ थीं, अभिलाषाएँ थीं और सपने थे।
वह बनारस के घाट पर ही खुश था और मैं आगे बढ़ना चाहती थी।
गंगा को बनारस से प्रेम था, परंतु उसे स्वयं से भी प्रेम था।
अंत में बनारस अपने घाट पर ही रह गया और गंगा आगे बढ़ गई अपने नए सफर पर।
वह बनारस सा शीतल प्रिय था और मैं गंगा की लहर सी मचलती थी।
वह उसी घाट पर रह गया और मैं कहीं दूर आगे बढ़ गई थी।
प्रेम तो था बनारस के घाट से, परंतु गंगा की लहर की तरह उससे भी अधिक मुझे प्रेम था स्वयं से।

