STORYMIRROR

भाऊराव महंत

Abstract

3  

भाऊराव महंत

Abstract

बिन बच्चे सूना घर-आँगन लगता है

बिन बच्चे सूना घर-आँगन लगता है

1 min
325

बिन बच्चे सूना घर आँगन लगता है

खुशियों से खाली हर दामन लगता है


किलकारी जो गूँजे घर में बच्चों की 

आया जैसे रिमझिम सावन लगता है


बोली लगती है उनकी मीठी-मीठी 

बोले जब वो गायन वादन लगता है


पास नहीं हो दौलत तो क्या होता है 

बच्चों से घर साधन सम्पन लगता है


करते हैं जब-जब भी कोलाहल बच्चे  

तब-तब अपना हर्षित ये मन लगता है


ईश्वर बसता है बच्चों की मूरत में 

घर सारा जन्नत-सा पावन लगता है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract