Asmita Satkar

Abstract


2  

Asmita Satkar

Abstract


बदलता शहर

बदलता शहर

1 min 267 1 min 267

मैंने इस शहर को बदलते देखा है,

शाखों से गिरे हर फूल को 

धूल बनते देखा है।


खामोश राहों में

शोर को गुजंते सुना है,

मैंने इसके अक्स को,

इसमें बसे हर शक्ख्स को,


रोज बदलते देखा है,

हां मैंने इस शहर को

बदलते देखा है !


Rate this content
Log in

More hindi poem from Asmita Satkar

Similar hindi poem from Abstract