STORYMIRROR

Mahendra Narayan

Abstract

3  

Mahendra Narayan

Abstract

आँखें मल रही है

आँखें मल रही है

1 min
279

अनवरत तृष्णा की साँसें चल रही हैं

भोर आशा की भी आँखें मल रही हैं।


कर्म ने दी है पटखनी यूँ भाग्य को

अब सफलता अंक में ही पल रही है।


जब से मर्दन हो गया अभिमान का

लोभ की अदृश्य छाया गल रही है।


सुख की परिभाषा बनाकर स्वयं ही

प्रीति भौतिकता से मिलकर छल रही है।


जब से सौदा हो गया दुःख आदमी में

सुख में प्रातः ओस से भी जल रही है।


महज मन की वृत्तियाँ दूषित नहीं है

तन की डाली पर तबाही फल रही है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract