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Manju Saini

Inspirational

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Manju Saini

Inspirational

आखिर कब तक

आखिर कब तक

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जब तुमको लगा तब तब तुमने सराहा

जब जब लगा तुमने उपेक्षित किया

अपने मन के अनुसार तुमने निभाया

क्या कभी मेरे बारे में भी मन को समझाया..?

आखिर कब तक..?


यूँ ही तोड़ोगे ऐसे ही जज्बात मेरे 

या यूँ ही मेरे मौन को उग्रता देते रहोगे

नही सह पा रही हूँ ये रूप तुम्हारा

मेरी बेचैनी को समझते कभी 

आखिर कब तक..?


दर्द की छटपटाहट को अनदेखा करते रहोगे

आखिर कब तक तोड़ोगे ऐसे ही जज्बात मेरे

आज खड़ी हूँ मैं दुविधा के दोराहे पर कि

शायद आये आपको रहम किसी वक्त 

आखिर कब तक..?


मेरे समर्पण की परीक्षा होती रहेगी

या यूँ ही मैं भटकती रहूंगी आत्मसात को

आखिर कब तक तोड़ोगे ऐसे ही जज्बात मेरे

आखिर कब तक सहन कर पाऊंगी मैं।


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