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Suyog Potdar

Classics Inspirational Others

4.4  

Suyog Potdar

Classics Inspirational Others

आधुनिक स्त्री और पुरुष - बदलते समय की तस्वीर

आधुनिक स्त्री और पुरुष - बदलते समय की तस्वीर

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लड़कियाँ पैसा कमाना सीख गईं,
अपने सपनों को पहचान गईं।
दफ्तर की राहें चुन लीं उन्होंने,
पर कई बार रसोई से दूर हो गईं।

लड़कियाँ आगे बढ़ना सीख गईं,
अपने लिए खड़ा होना सीख गईं,
पर कभी-कभी भागती दुनिया में,
घर की धीमी आवाज़ भूल गईं।

पार्टी करना, घूमना-फिरना,
नए कपड़े, नई सोच अपनाना —
ये सब गलत नहीं है बिल्कुल,
पर साथ में घर को भी है निभाना।

कुछ लड़के भी बदल गए हैं,
सिर्फ कमाने तक सीमित नहीं।
वे आज पैसा भी कमा रहे हैं,
और रसोई में हाथ भी बँटा रहे हैं ।

वे दोस्तों संग हँसते भी हैं,
पर माता-पिता का ध्यान भी रखते हैं।
आधुनिक जीवन जीते हैं,
पर त्योहारों में दीप भी जलाते हैं।

पर सच यही है —
न हर लड़की जड़ों से दूर हुई हैं ,
न हर लड़का पूरी तरह जुड़ा हुआ हैं ।
हर घर की कहानी अलग हैं ,
हर जीवन का रास्ता जुदा हैं ।

समय बदल रहा हैं ,
भूमिकाएँ भी बदल रही हैं।
अब घर सिर्फ औरत का नहीं,
और कमाई सिर्फ मर्द की नहीं।

जरूरत बस इतनी सी है —
हम आगे बढ़ें, पर भूलें नहीं।
नए सपने देखें,
पर पुराने रिश्ते तोड़ें नहीं।

आधुनिक होना अच्छा है,
पर संस्कार साथ हों तो और भी अच्छा है।
काम और परिवार दोनों जरूरी हैं,
संतुलन हो तो जीवन सच्चा है।

चलो ऐसा समाज बनाएँ,
जहाँ कोई किसी से कम न हो।
लड़कियाँ भी जड़ों से जुड़ी रहें,
और लड़के भी संवेदनशील हों।

क्योंकि घर तब ही सुंदर बनता है,
जब साथ चले परंपरा और नई सोच।
जब सम्मान हो दोनों के लिए,
तभी सच्ची तरक्की की होती है खोज।

न नया गलत है, न पुराना बोझ है,
दोनों का अपना ही एक सोच है।
अगर हाथ में मोबाइल है,
तो दिल में माँ-बाप की याद भी हो।
अगर आँखों में ऊँचे सपने हैं,
तो आँगन की मिट्टी का स्वाद भी हो। 

उड़ान भी हो, पर आसमान अपना लगे,
राह नई हो, पर मकान अपना लगे।
सपनों की रोशनी आँखों में रहे,
अपनो की ख़ुशी साँसों में रहे 

क्योंकि सच्ची तरक्की वही कहलाती है,
जो रिश्तों को साथ निभाती है।
जहाँ सपने भी हों, संस्कार भी हों,
वही असली खुशहाली लाती है।

- सुयोग पोतदार


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