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मेरी डायरी से...
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© Shambhu Amlvasi

Fantasy

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मेरी डायरी से* 🍁

"लेहरों से डरकर नोका पार नही होती और कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती"

दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेज से थक हारने के बाद मैने सत्यवती महाविद्यालय में अपना प्रवेश करवाया।

कुछ दिन कॉलेज आने के बाद मन ऐसा हो गया था की,अब में कॉलेज नही आऊंगा,इसी बीच मेरा ध्यान "छात्र यूनियन संघ" के नारों की आवाज़ मेरे कानों तक पहुँची। सभी छात्र आकाश यादव-आकाश यादव नाम से अपने नारे लगा रहे थे।

इसी शोर में , में-भी शामिल होने अपनी हिंदी(विशेष) कि कक्षा से निचे आ पहुँचा।जेसे ही मै निचे आया सभी छात्र कही और चले गए थे और अब कॉलेज के चारों तरफ़ शांति का वातावरण छा गया था।

अगले दिन जब मैने कॉलेज में प्रवेश किया तो सत्यवती महाविद्यालय के 'सुचना पाठ' पर कई सूचनाएं लगी हुई थी,उन्हीं सूचनाओं में से एक सूचना पर मेरा ध्यान गया। वह सुचना थी की "अमिताभ बच्चन" की 1970 में बनी फ़िल्म 'दीवार' पर (चर्चा -परिचर्चा) दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय के सभागार में होने वाली हे।

किरोड़ीमल कॉलेज का नाम बहुत सुना था शायद इसलिए की अमिताभ साहब का नाम इस महाविद्यालय से जुड़ा था.
इसलिए में उसी समय किरोड़ीमल महाविद्यालय पहुँचा लेकिन में कार्यक्रम के समय से पहले पहुँच गया था । समय का सद्उपयोग करने के लिए मेने कॉलेज का भ्रमण किया और भ्रमण करने के पश्चात मेने मन ही मन सत्यवती महाविद्यालय की तुलना किरोड़ीमल महाविद्यालय से कर डाली । कुछ और दोष-गुण निकलता  तभी जिस कार्य के लिए में यहाँ आया था उसका समय हो गया था

में सभागार में जाकर बैठ गया,कुछ समय बाद विभिन्न कॉलेज के छात्र वहाँ पहुच गए थे। सभी ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया था और कार्यक्रम शुरू होने की बड़ी बेसब्री से प्रतिक्षा कर रहे थे।

अब कार्यक्रम शुरू हो चुका था । सर्वप्रथम हमे 'सत्यवती वंदना' सुनाई गई। जिन छात्रो ने वंदना सुनाई थी उनकी आवाज़ इतनी मधुर और लयात्मक थी कि में उनकी कही हुई पंक्तियों को मन ही मन बार-बार दोहराए जा रहा था। वंदना ख़त्म होने के बाद हमे  'दीवार'  फ़िल्म दिखाई गई जो  "70 के दशक"  की फ़िल्म थी।

फ़िल्म ख़त्म होने के पश्चात कई सवाल मष्तिक में समाए हुए थे। उसमे से एक सवाल था की हमे ये फ़िल्म क्यों दिखाई गई हे?

फिर मैने सोचा कि हर कार्य के पीछे कुछ उद्देश्य होता हे। फ़िल्म दिखाने के पीछे भी कोई लक्ष्य ,उद्देश्य होगा लेकिन में  उस लक्ष्य और उद्देश्य को समझ नही पाया था।

फ़िल्म पर चर्चा-परिचर्चा के लिए किरोडीमल महाविद्यालय ने 'इग्नू' से "जितेंद्र श्रीवास्तव जी " को वक़्ता के रूप में आमंत्रित किया हुआ था।

जितेन्द्र श्रीवास्तव जी ने हमे बताया कि अमिताभ की 6 फिल्में  फ्लॉप होने के बाद उनकी कि हुई  'दीवार' फ़िल्म 70 के दशक की सबसे लोकप्रिय फ़िल्म बन गई थी और इसी फ़िल्म ने एक ऐसे अभिनेता को जन्म दिया जिसने कभी ये नही सोचा होगा की लगातार 6 फ़िल्मो के फ़्लॉप होने के बाद कोई छोटा-मोटा कलाकार आज इतना बड़ा 'अभिनेता' बन जायेगा।

अमिताभ ने खुद कहा हे कि में अपनी हार को भी अपनी जीत समझता हु,क्योंकि हारने वाला ही इंसान ही जीत की कोशिश करता हे।

में थोडा न खुश था कुछ दिनों से, कारण कई थे।लेकिन फ़िल्म को देखने के बाद और उसके पीछे का जो इतिहास रहा उससे जानने के बाद निराशा में आशा का संचार हो गया था और अब मन बहुत हल्का और सुकून महसूस कर रहा था।

सभागार से बहार निकलते वक़्त मैने देखा कि किरोडीमल महाविद्यालय के N.S.S के छात्र छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर आ रहे थे*
*मष्तिक में फिर प्रश्न उठा की ये बच्चे यहाँ क्या कर रहे हे ?इन्हें यहाँ क्यों लाया गया हे,उत्तर पाने के लिए मैने एक n.s.s के छात्र से पूछा,तो जवाब मिला कि हम रोज कॉलेज के आस-पास जो झुग्गी-झोपड़ियाँ हे वहाँ से उन बच्चों को यहाँ पढ़ाने लाते हे,जो बच्चे स्कूल नही जाते तथा जिनके माँ-बाप आर्थिक कारण के चलते अपने बच्चों को स्कूल नही भेज पाते ,पढ़ा नही पाते।उन बच्चों को हम क्लास खत्म होने के बाद यहाँ उन्हें पढ़ाते हे। दिल बहुत खुश हुआ जब मैने उत्तर सुना।

अब मन कर रहा था कि उन छोटे बच्चों को पढ़ते हुए देखु....फिर में भी उनके पीछे चल दिया वो सब बच्चों को बास्केट बॉल कॉर्ट में पढ़ाते थे।में भी बच्चों से थोड़ी दूर बैठ गया और देखने लगा की यह सब बच्चों को कैसे पढ़ाते हे।जब सभी बच्चे पढ़ रहे थे तो चारों तऱफ शांति का वातावरण था।में थोडा हैरान था की सभी बच्चे कितनी शांति से पढ़ रहे हे।

अब सब जगह शांति थी कही कोई हल-चल नही हो रही थी।फिर में भी बेठे-बेठे बोर होने लगा और उठकर बास्केट बॉल कॉर्ट की सीढ़ियों पर जाकर बैठ गया और कुछ लिखनें की कोशिश में लग गया काफ़ी समय हो गया था सोचते-सोचते की क्या लिखु लेकिन कुछ सुझ नही रहा था। तभी...

बास्केट बॉल की धप्प-धप्प की आवाज़ मेरा ध्यान अपनी और खिंचती  हे ओर में देखता हु कि एक छोटी-सी लड़की शायद क़रीब पांच-छह साल की होगी, हाथो में बास्केट बॉल लिए और पुरे मंझे हुए खिलाडी की तरह बॉल को ज़मीन पर पटकती और बॉल को बास्केट में डालने के लिए बिल्कुल विपरीत अंदाज में ऊपर उछालती ।

बॉल कभी आधी दूरी से वापस लौट आती तो कभी बास्केट के बग़ल में लगकर रह जाती और कभी 90 डिग्री का कोण बनाती हुई वापस उसके सर पर ठप्प से गिर जाती । लड़की का प्रयास निरंतर जारी रहा और में भी उसे एका-एक देखे जा रहा था । काफी समय बीत गया। लेकिन...

बॉल बास्केट के इधर-उधर से गुजरती हुई निचे गिर जाती.लेकिन लड़की का प्रयास जारी रहा।आखिरकार उसकी कोशिश रंग लाई और इस बार बास्केट हार गई और बॉल उसके अंदर से गुजरती हुई निचे आई ,

और साथ में लाई उस लड़की के चेहरे-पे मुस्कान और मेरे लिए एक संदेश कि मेहनत करते हुए कई बार हमारे हाथ सिर्फ असफलता आती हे और मेहनत के बाद जब सफ़लता मिलती हे उस आनंद कि कोई परिभाषा नही हो सकती बस उसे महसूस किया जा सकता हे, बस जरूरत हे एक कोशिश की और कहा भी गया हे.

*लेहरों से डरकर नोका पार नही होती और कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती*

*शम्भू "अमलवासी"*
*छात्र:-हिंदी(प्रतिष्ठा)*
*सत्यवती महाविद्यालय*
*दिल्ली विश्विद्यालय*

 

 
 

लेहरों से डरकर नोका पार नही होती और कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती।

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