पीपल पात
पीपल पात
मेरे लिये तुम पीपल के पेड़ की तरह थे। कितने ऊँचे और घनेरे। अनगिनत हरियारे ताज़े दिल खिले रहते थे तुम पर। तुम्हारी छाँव भी कितनी छतनारी थी मंद-मंद शीतल, सुकून भरी। मैं एक चिड़िया की तरह तुम्हारे दिली पातों पर कभी यहाँ तो कभी वहाँ हरदम फुदकती रहती थी, कितनी तो चहचहाती रहती थी।
तुम्हारा सानिध्य मुझे कितना प्यारा था। भीगी-भीगी सी मैं; भोर होते ही दानों की तलाश में अपने पंख फैलाये उड़ती भी थी तो तुमसे ज्यादा दूर नही जा पाती थी। पलट-पलट कर तुम्हें तकती थी, रह-रह कर तुम्हारे पास आ तुम्हारा दिल टटोल जाती थी। शाम के धुुंधुलाते ही बौराई हुई सी वापस तुम पर ही आ बैठती थी। तुम भी अपने उर में छिपा लेते थे मुझे, मैं दुबकी बैठी रहती थी; निरंतर चहचहाते हुए अपनी खुशी जाहिर करती रहती थी, तुम कभी भी ऊबे नहीं उससे; हमेशा अपने हरे-भरे दिल लहरा कर एक लय में मेरी तान पर झूमते रहे। रात के अँधेरे में अपने आगोश में भर कर कैसे हौले-हौले थपकी देकर मुझे तसल्ली की नींद देते रहे !
और मैं....मैं मदमाती सी तुममें लीन होती रही।
रात- दिन, हर दिन ऐसे ही मीठे सुरीले से बीतते रहे।
पर पता नहीं क्या हुआ अचानक....तुम्हारे दिल मुरझाकर पीले पड़ने लगे। अपने में गुम जाने क्या सोचते-सोचते तुम्हारे शरीर से झर-झर कर नीचे झड़ने लगे। वो बहती हवा के साथ तुमसे दूर इधर-उधर छितरकर जाने कहाँ तो दूर-दराज़ उड़ते हुए जाने लगे और वहीं की माटी में लोट लगाने लगे। मैं मायूस तुम्हारी गोद में बैठी हुई अपनी आँखों से ये सब होते देखती रही, पर कुछ न कर सकी। गिरते हरेक पात के साथ मेरी चहचहाट भी गुम होती गई। मैं भी कुम्हलाती गई।
एक-एक करके तुम्हारे सारे हरे-भरे दिल पीले पड़कर कहीं और चले गये, जाने क्या हश्र हुआ उनका । मैं कभी जान न सकी और तुम ह्रदय विहीन एक ठूँठ की तरह बचे रह गये।
लेकिन पता है क्या, उन पातों में से एक पात मेरे उर के आँगन में आ गिरा था, उसे मैंने अपने ह्रदय की तलहटी में छिपा लिया। ताकि तुम्हारी निशानी हमेशा के लिये अपने पास संजो के रख लूँ। वक्त के साथ वो कोमल भारहीन पत्ता भावों के भार तले दबकर जीवाश्म बनकर वहाँ जड़ हो गया। अब यही मेरी थाती है, कभी ना नष्ट होने वाली। थोड़ी भारी, थोड़ी रुखी हो गई है पर है मेरे साथ; मेरे मरने तलक, बल्कि मेरे मरने के बाद भी जीवाश्म के रुप में धरोहर बन के जीती रहने के लिये।
तुम्हारे पीछे मरती सी जी तो रही हूँ मैं। अपने पंखों का भी बोझ उठा नहीं पाती अब। वो भी भार से लगते हैं। दाने दुनके के लिये फैलाती हूँ तो ज्यादा लंबी उड़ान भर नहीं पाती, आसपास जो हो उसे ही चुगकर रह जाती हूँ।
मैं अभी भी थोड़ी-थोड़ी देर में उड़कर तुम्हारे उजड़े ठूँठ पर आ बैठती हूँ, तान कोई नहीं छेड़ पाती, बस एक उदास सा सुर साथ रहता है और साथ रहती है एक उम्मीद कि कभी तो कोई कोंपल फूटेगी तुम्हारे भीतर, तुम फिर धीरे-धीरे पहले की तरह हो जाओगे...मेरे प्यारे छतनारे पेड़ !
