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तरक्की पसंद
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© Gulshan Sahu

Comedy Tragedy

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छोटी गोल्ड को ६ कश्तो मे ख़त्म करके माधव ने सिगरेट का आधा जलता छोड़ अपने पैरों तले बुझा दिया। फिर हर दिन की तरह उसने पास-पास का एक पॅकेट फाडा और पॅकेट का सामान अपने बाएँ हाथ में डालकर उसे अपने दाएँ हाथ से रगड़ा। हाथ का आधा सामान मुँह में दबाया और आधा हवा मे झाड़कर हाथों से दाढ़ी रगड़ ली। उसे अच्छी तरह से पता था की घर में अगर उसकी सिगरेट की लत का पता चल गया तो २२ साल की बनी-बनाई छवि एक पल मे धूमिल हो जाएगी। पिताजी पंडित थे और एसी आदतों का खुल कर बहिष्कार करते थे। उनका मानना था की ये आदतें पश्चिमी सभ्यता की देन हैं और इनका शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ता है। दादाजी को सिगरेट की लत के कारण ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था और पिताजी बिल्कुल नहीं चाहते थे की घर मे ये घटना दोबारा हो। पर ये सब बनी-बनाई बातें थी और असल ज़िंदगी मे ना तो इनका महत्व था और इनके होने से ज़िंदगी बेरंग जान पड़ती थी। आख़िर एक सिगरेट से किसी का क्या बिगड़ने वाला था ? वो तो पिताजी रूढ़िवादी सोच का शिकार थे। आज तक ना कोई पाश्चात्य शैली अपनाई और ना ही घर मे किसी को इसकी लत लगने दी। ये आदत उन्होने माधव मे बचपन से ही लगा दी थी। सुबह जल्दी उठ कर नहा-धो लेना, फिर पूजा-पाठ करने के बाद अपने-अपने काम मे संलग्न हो जाना। इन आदतों को ही वो अपनी सफलता की कुंजी मानते थे। पिछले २२ सालों मे माधव ने अपने पिता को इन आदतों से भटकते ना देखा था।

माधव भी अपने पिता की तरह दृढ़-निश्चय का युवा था, एक बार जो ठान लिया, सो हासिल करना उसकी फ़ितरत थी। इस आदत के कारन ही वो अपने दोस्तों की भीड़ में अलग दिखता था और इस आदत के कारण ही वो माधव का मज़ाक बनाते थे, पर भूखा आदमी कब तक ही सामने रखा पकवान हाथ ना लगाए ? एक बार कर लूँगा तो क्या ही हो जाएगा के चक्कर में ही माधव सिगरेट की लत का शिकार बना था। जो धीरे-धीरे लत ने ज़ोर पकड़ा, एक सिगरेट कब चार हो गयी, पता ही ना चला। कब अगरबत्ती का धुआँ सिगरेट का हो गया और कब क्रिकेट के नाम से बाहर निकलना छल्ले बनाने का मौका बन गया, पता ही ना चला। माधव ने पनवाडी को दस का नोट थमाया और एक रुपया खाते मे लिखवा कर घर की तरफ चलता बना। बाज़ार के बीच से जब वो गुजरा तो उसे ध्यान आया कि माँ का मँगाया कॉफी पाउडर भी लेना है। उसने सोचा वो पाउडर कासलीवाल के दुकान से खरीद लेगा।

आज १४ फ़रवरी थी, देश भर मे जगह-जगह प्रेमी जोड़े अपने-अपने प्यार का इज़हार करने मे लगे हुए थे। कोई गुलाब देता, तो कोई उपहार। बाज़ार मे तरह-तरह के उपहारों का चलन था। टेडी बेअर से लेकर दो टुकड़ों मे बॅट जाने वाले लॉकेट, ४० से लेकर ४०० रुपये तक के, उससे भी महेंगे उपहार उपलब्ध थे और उन्हे खरीदने वालों की कमी भी ना थी। कासलीवाल की दुकान पर जब माधव रुका, तो पीछे आती हुई तेज़ गाड़ी उसे काट कर निकली। गाड़ी मे बैठा लड़का उसे गाली देते हुए निकल गया, “अँधा है क्या ? रोकने से पहले देखा तो कर।” माधव एक पल को भौचक्का उसे देखता रहा फिर हाथ उपर खड़े कर दिए मानो माफी माँग रहा हो। ग़लती उसकी ना थी, उसने अपनी साइकल सड़क के किनारे ही खड़ी की थी, पर उस लड़के का हुलिया देखकर उसने कुछ ना कहा। लड़का गले मे साफ़ा लपेटे, मूँह मे जरदा दबाए एसी शक्ल लेके घूम रहा था, मानो किसी की तलाश मे हो, दल का जान पड़ता था। एक पल को माधव को लगा उसे जवाब देना चाहिए तभी गाड़ियों का एक जत्था शोर मचाते हुए, माधव के बगल मे से गुजरा। ये सारी गाड़ियाँ एक साथ ही थी, देख के लगता था की चुनाव आने वाला है, या कोई शिकार करने निकला है. पूरा का पूरा दल आज वॅलिंटाइन डे के खिलाफ मोर्चा निकाले था। हर साल इस दिन ये जत्था गली-मोहल्लों के उद्यानों मे छापा मारता, प्रेमी-जोडियों से मार-पीट करता और उन्हे संस्कृति का ग्यान बाँटता। साल भर मे ये सेना कभी कभी ही सक्रिय होती और हिंसात्मक संस्कृति का रूप धारन कर लेती।

माधव ने कॉफी का पॅकेट लिया और बाएँ काउंटर मे रखे गुलाब को देखकर सहसा ही उसका दाम पूछ लिया।

“५० का एक है। दे दूँ ये भी?”, दुकानदार ने पूछा.

“नहीं, नहीं चाहिए।”

“अरे ले लो, २ लोगे तो ८० का लगा दूँगा।”

“नही चाहिए, भैया।”

“पंडित के लड़के हो ना ? अरे, हम से क्या शरमाना ? ले लो। नही बताएँगे तुम्हारे पिताजी को।”

“भैया, ज़रूरत ही नहीं है तो क्या करूँगा लेकर ? क्यूँ पीछा करते हो ?”

“ठीक है, मत लो, पर सबसे सस्ता यहीं पड़ेगा पूरे गोल-बाज़ार मे। यहाँ के सारे आशिक हम से ही तो खरीदते हैं।”

“हाँ, कोई नही”, माधव झुँझलाया और कासलीवाल को २० का नोट थमा दिया। उसने आगे कोई बात ना की, गुलाब की तरफ दो टुक देखा, फिर चलता बना।

माधव साइकल पर पैर फलाँग कर बैठ गया, साइकल सतह से बराबर की, और दूसरे पैर से स्टॅंड को उपर कर दिया। उसने नज़र एक पल को नीचे झुकाई तो कमीज़ के अंदर से होते हुए उसे नीचे का ज़मीन दिखाई दिया। सहसा उसे अपने पतले होने के एहसास से कूढ़ मची। अक्सर ही लोग माधव के दुबले-पतले शरीर को देख कर ये आंकलन कर लेते थे की वो नशा तो ज़रूर करता होगा, पर किसी ने ये बात उसके मूँह पर ना कही थी। पिताजी ने भी शक होने पर बहुत बार उससे पूछताछ की थी पर माधव हर बार यह कहकर टाल देता की वो खाने से ज़्यादा खेलता है, और माँस ना खाने की वज़ह से उसका शरीर नही बनता, वरना जिम तो वो लगातार ही जाता है। इस पर पंडितजी भड़क उठते की जान दे देना पर धर्म ना भ्रष्ट होने देना। आख़िर एक ही तो नियम है इस घर का, चाहे कुछ भी हो जाए पर माँस का सेवन नहीं करना है और कुछ हद तक माधव भी इसे सही मानता था। आख़िर क्यों एक निर्दोष जीव को मारकर खाया जाए ? उसके दोस्तों ने इस बात पर उसका बहुत मज़ाक बनाया और उसे बहुत मनाया भी कि एक बार तो माँस खाना बनता है, पर वो नही माना। इसके और भी कारण थे। उसे जेब-खर्च का सिर्फ़ ५० रुपये रोज़ाना मिलता, एसे मे या तो वो। चाय-सिगरेट पी ले या तो आधा पेट माँस खा लेता। ५० रुपये मे माधव अपने पिताजी के बनाए नियमों का केवल एक ही तरीके से उल्लंघन कर सकता था।

माधव ने साइकल का पेडल मारना चालू किया। पेडल पर पानी पड़ने की वजह से उसके चरखी का तेल धुल चुका था। इसके कारण हर चक्कर के साथ पेडल चै-चै की आवाज़ करता था। चलते-चलते रास्ते मे बाईं तरफ दशहरा का मैदान पड़ता था, आज वहाँ दल के कुछ लड़के एक प्रेमी-जोड़े को घेर कर खड़े थे। जोड़े का लड़का हाथ जोड़कर गिडगीडाते हुए कह रहा था, “जाने दो भैया, आगे से नही करेंगे।” उसकी शक्ल पर मायूसी और डर का अजीब मिश्रण था। दूसरी तरफ उसका कॉलर हाथ मे पकड़े उससे दुगुने कद के आदमी ने उससे पूछा, “साले, बताऊं तेरे बाप को ? तेको पढ़ने के नाम से भेजता है वो, के बेटा हमारा पढ़ेगा, होशियार बनेगा, घर की ग़रीबी मिटाएगा और तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?”

“भैया, छोड़ दो ना? कहो तो पैसे भी दे दूँ, बस पापा को मत बताना यार, प्लीज़।”

“अब पैसे भी देगा तू ? इतना बड़ा हो गया है ? या बाप अफ़सर है ? पता था जब कल पोस्टर निकाले हैं, कोई वॅलिंटाइन नहीं मनाएगा, तो क्या बकर है ये ?”

बगल मे खड़ी लड़की अपना चेहरा ढँकने की कोशिश कर रही थी तो वहाँ खड़े दूसरे आदमी ने उसका हाथ झटक के नीचे कर दिया और बोला, “अभी से क्या ढक रही हो ? ढाँकोसला करती हो ? अभी तो हमने कैमरा भी नहीं निकाला है।”

लड़की अपने बदनामी के डर से क्षुब्ध होकर एक ही चीज़ करती और इस प्रयास मे कभी-कभी उसके मूँह से एक धीमी आवाज़ निकल जाती, “भैया, जाने दो ना, प्लीज़, अब से नहीं करेंगे। गॉड प्रॉमिस, भैया।”

ये सिलसिला कुछ देर तक चला और आख़िर मे दल वालों ने दोनो से उनका और उनके पिता का नंबर लिया, और साथ में एक फोटो भी खीचीं। इस प्रक्रिया के दौरान लड़के को एक-आध दो झापड़ भी पड़े, पर आदमी को अंजानो के सामने बदनाम होने से उतना ड़र नहीं लगता जितना घरवालों के सामने पोल खुलने से लगता है।

माधव को ध्यान आया कि उसकी साइकल रुकी हुई है और वो उस मंज़र को एसे देख रहा था मानो कोई सिनेमा हो। उसने सर नीचे झुकाया, कमीज़ के अंदर से दिखती नीचे की ज़मीन को देखा और सोचा,“भारतीय संस्कृति का बखान करना एक बात है और उसे थोपना दूसरी। आख़िर मार पीट कर समझाने का क्या फ़ायदा ? आदमी इस चक्कर मे सिर्फ़ बदले की भावना मे जल-जलकर कुछ ना सिख पाएगा। खै़र, मुझे क्या ? और अच्छा हुआ मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है, वरना इस चोंचले मे फँस कर पैसे भी जाते और इज़्ज़त भी।”

माधव घर की तरफ चल पड़ा। घर पहुँच कर उसने साइकल बरगद के सहारे टीका दी और किवाड़ खटखटाया। कोई जवाब ना मिला। २ मिनट देखने के बाद वो फिर खटखटाया और चिल्लाया, “अरे दरवाज़ा खोल दो, माँ. पापा?” अंदर ठक-ठक की आवाज़ हुई, उसे सुन कर लगा अब कोई आकर दरवाज़ा खोल देगा। ५ मिनट और बीते, दरवाज़ा तब भी ना खुला। माधव के मन मे चिंता बढ़ने लगी और पड़ताल के लिए वो खिड़की की तरफ बढ़ा। “एसा पहले तो कभी ना हुआ? ये क्या चल रहा है? अच्छा, आज वॅलिंटाइन डे भी तो है। पापा कितने बड़े ही पंडित क्यूँ ना हो, विद्वान क्यूँ ना हो, जी तो सबका मचलता है, पर ये सब दिन-दहाड़े ? लगता है पापा भी तरक्की-पसंद हो रहे हैं।” माधव ने खिड़की से झाँकना उचित ना समझा और सोचा माँ-बाप का भी थोड़ा सम्मान कर लेता हूँ। माधव पीछे मुड़कर जाने ही लगा था की सड़क के दूसरी ओर से माँ आती दिखी। एकाएक घर का दरवाज़ा खुला और आधे-अधूरे कपड़े पहने घर के अंदर से पिताजी और रसोइया भीखू प्रसाद बाहर निकले।

परिवार आदतें संस्कृति कहानी

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