सफलता का रहस्य

सफलता का रहस्य

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                               सफ़लता का रहस्य

 

 

             आचार्य द्रोण द्वारा गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से अँगूठा माँग लिये जाने के बाद से अर्जुन के मन में एकलव्य के प्रति काफ़ी सहानुभूति एवं मैत्री का भाव जागृत हो गया था।आचार्य द्रोण के मन में भी एकलव्य के प्रति काफ़ी सहानुभूति का भाव आ चुका था।स्वर्ग आए हुअ भी उन लोगों को काफ़ी समय बीत चुका था।

    एक दिन अर्जुन के मन में अचानक यह बात आई कि क्यों न वह भी पृथ्वी पर चल कर किसी विश्वविद्यालय में युद्ध विद्या में शोध कार्य करें और वहां से पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त करके वापस स्वर्ग में आकर अपना एक विश्वविद्यालय स्थापित कर लें।

     यह विचार मन में आते ही अर्जुन एकलव्य को साथ लेकर आचार्य द्रोण के पास उनकी आज्ञा लेने जा पहुँचे। अर्जुन का प्रस्ताव सुनकर आचार्य कुछ देर तक विचारमग्न रहे,पर शीघ्र हि उन्होंने दोनों को पृथ्वी पर जाने की आज्ञा दे दी।

     अंत में पूरी तैयारी के साथ अर्जुन और एकलव्य पृथ्वी पर आ गये।लेकिन यह संयोग ही था कि एकलव्य और अर्जुन को स्थानाभाव के कारण एक ही विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिल सका।फ़िर भी प्रवेश मिल जाने पर दोनों ने अपने-अपने शोध निर्देशकों के साथ शोध प्रारंभ कर दिया। अर्जुन का अधिकांश समय पुस्तकालय में अध्ययन करने में बितता।प्रतिदिन शाम को वह अपने दिन भर किये गये कार्य को आचार्य के पास ले जाकर दिखलाते एवं उनसे परामर्श करते।

                     उधर एकलव्य अपने शोध कार्य के प्रति पूर्णतः उदासीन था।उसका अधिकांश समय विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच गपबाजी और अपने आचार्य की सेवा काने में बीतता था।

      एक वर्ष के बाद अचानक ही एक दिन एकलव्य घूमता  हुआ अर्जुन के पास पुस्तकालय में जा पहुँचा।वहाँ अर्जुन पुस्तकों के अम्बार के बीच बैठे थे।एकलव्य को अचानक वहाँ पाकर अर्जुन को काफ़ी आश्चर्य हुआ। अभिवादन के पश्चात एकलव्य ने प्रश्न किया, बन्धु,यह क्या हाल बना रखा है तुमने अपना?ऐसा लगता है तुम्हारा शोध कार्य शीघ्र पूरा होने वाला है।

          “कहाँ बन्धु---?अभी तो मेरा प्रथम अध्याय ही मेरे आचार्य जी ने स्वीकृत नहीं किया----अभी उसे ही चौथी बार लिख रहा हूँ।एकलव्य के स्वस्थ और मोटे होते जा रहे शरीर को देख एक ठण्डी साँस खींच कर अर्जुन बोले।

        “क्या----?अभी तुम्हारा प्रथम अध्याय ही नहीं पूरा हुआ?मेरे तो तीन अध्याय समाप्त हो चुके हैं और मेरे आचार्य ने उन्हें स्वीकृति भी दे दी है।एकलव्य आश्चर्य से अर्जुन को देख कर बोला।

   यह कैसे सम्भव हुआ बन्धु ?मैं तो प्रवेश लेने के बाद से ही अपना अधिकांश समय अध्ययन में ही व्यतीत कर रहा हूँ फ़िर भी मेरे आचार्य महोदय मुझसे तथा मेरे कार्य से असन्तुष्ट हैं---और तुम्हारे तीन अध्याय समाप्त भी हो चुके?आखिर इसका रहस्य क्या है?अर्जुन व्यग्रता से बोले।

           हा---हा---हा---इस सफ़लता का रहस्य?कभी मेरे विश्वविद्यालय आओ तो तुम स्वयं देख लेना अर्जुन।एकलव्य एक ज़ोरदार ठहाका लगा कर बोला। अर्जुन के साथ पूरा दिन उस शहर में भ्रमण करने  के बाद एकलव्य उसी दिन शाम को अपने शहर वापस चला गया।एकलव्य की प्रगति जानने के बादसे अर्जुन और अधिक परिश्रम के साथ शोध कार्य में जुट गये।इसी प्रकार छह माह कब बीत गये अर्जुन को पता ही नहीं चला।

   एक दिन प्रातःकाल ही अर्जुन एकलव्य के शहर में जा पहुँचे।वहाँ वो सीधे विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में गये।परन्तु वहां एकलव्य उन्हें नहीं मिला।वे एकलव्य का पता लगाते हुये उसके आचार्य के निवास पर जा पहुँचे।उनका परिचय जानकर आचार्य ने उनका स्वागत किया और

बताया कि एकलव्य अभी बाजार गया है आता ही होगा अर्जुन वहीं बैठ कर कुछ पुस्तकें देखने लगे।

   कुछ ही देर में एकलव्य अपने सिर पर सब्जियों की टोकरी लादे हुये और दोनों हाथों से एक गैस का सिलिण्डर लुढ़काता पसीने से लथपथ हाजिर हुआ।वह अर्जुन को वहाँ अचानक देख कर थोड़ा सकपका गया। अर्जुन भी आश्चर्यचकित होकर उसे देखते रह गये।खैर---। एकलव्य जल्दी से भीतर जाकर सारा सामान अपनी गुरुमाता को दे आया। और अर्जुन के पास बैठकर उसका समाचार पूछने लगा।परन्तु आचार्य की मौजूदगी में दोनों खुल कर बातें नहीं कर पा रहे थे।कुछ ही देर बाद अचानक एकलव्य घड़ी देख कर बोला,अच्छा बन्धु ,आओ अब चलें।जरा आचार्य जी के छोटे पुत्र को विद्यालय से लाने का समय हो चुका है,और उसे घर पहुँचाकर आचार्य जी की गायों को अस्पताल तक दिखाने भी जाना है। और अर्जुन को साथ लेकर एकलव्य विद्यालय के मार्ग पर चल पड़ा।अर्जुन यह सब देख कर एकदम स्तब्ध हो गये थे।

   लेकिन एकलव्य की प्रगति देख कर---उसके कार्यों और उसकी स्थिति देखकर अर्जुन के सामने एकलव्य का वह ठाका लगाता चेहरा घूम गया जब उसने उनसे पुस्तकालय में कहा था कि मेरी सफ़लता का रहस्य मेरे विश्वविद्यालय में आकर तुम स्वयं देख लेना।और अब अर्जुन के सामने धीरे-धीरे स्थिति काफ़ी स्पष्ट होती गयी।उन्हें अब काफ़ी हद तक एकलव्य की सफ़लता का रहस्य मालूम हो गया था।एकलव्य के साथ दिन भर शहर में भ्रमण करके अर्जुन सायंकाल अपने शहर वापस लौट गये।

        अगले दिन छात्रावास के छात्रों को यह देख कर काफ़ी आश्चर्य हुआ कि सबेरे उठते ही पुस्तकालय में जाकर जम जाने वाले अर्जुन आज अपने आचार्य महोदय के बगीचे में फ़ावड़ा लेकर उनकी क्यारियों की मिट्टी समतल कर रहे थे और उनके चेहरे पर एक परम सन्तुष्टि का भाव झलक रहा था।

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डा0हेमन्त कुमार

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