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सांची
सांची
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© Rekha Chatterjee

Inspirational

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’क्या हुआ उदास क्यों है?’

सांची के घर में घुसते ही मैंने उसके चेहरे की उदासी भांपते हुए पूछा।

’परी को ये स्कूटर में बिठाकर गांव ले गए, बुखार था फिर भी। बहुत याद आ रही है उसकी।’ सांची बोली। सांची की छोटी बेटी का नाम था परी।

भले ही सांची हमारे घर में काम करने वाली बाई थी, लेकिन घर के सदस्य की तरह थी। नई-नई शादी होकर जब गांव से जयपुर आई थी, तभी से वह हमारे घर में काम करने लग गई थी। उमंगों और चाहत से भरपूर थी उसकी जिंदगी। पहली मुलाकात में ही उसने मेरा मन मोह लिया था।

वक्त हवा के पंख लगाकर कैसे तेजी से आगे बढ़ रहा था, पता ही नहीं चला। उसको हमारे घर में काम करते हुए छह साल बीत गए थे। इन छह साल में उसकी गृहस्थी भी आगे बढ़ चुकी थी। दो सुन्दर-सुन्दरी बेटियों की मां बन चुकी थी अब सांची। 

हालांकि पहली बेटी के जन्म के बाद ही सांची को यह एहसास हो चला था कि उसकी जिंदगी आसान नहीं है। क्योंकि उसका पति किशन काम सिर्फ नाम का करता था। आए दिन उसे अकेला छोड़ गांव चला जाता। पति के नाकारापन से वाक़िफ़ सांची ने हालात से समझौता करना सीख लिया था। इसके अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था

एक दिन काम करते-करते अचानक उसने कहा ’आंटी अब तो मेरे भी दो बेटियां है आपकी तरह।’‘तो क्या अब तुम बेटा नहीं करोगी?’ मैंने उससे पूछा।

ग़रीब और मध्यम तबके में औरत जब तक बेटा नहीं जनती, तब तक उसका दर्जा दोयम ही रहता है। ससुराल में उसको मान-सम्मान कभी नहीं मिलता। हां बोनस में परिवार वालों के साथ जात बिरादरी वालों के ताने ज़रूर मिलते हैं।

’नहीं आंटी! अब और नहीं। इन दोनों को खूब पढ़ाना चाहती हूं, कुछ बनाना चाहती हूं।’ आज उसकी बातों में जोश के साथ एक दृढ़ निश्चय साफ झलक रहा था।

पता नहीं क्यों उसकी सोच और दृढ़ निश्चय देखकर मुझे उस समय अच्छा लगा। सांची के चेहरे पर आए भाव और संतोष को मैं समझने की कोशिश कर रही थी।

अपनी ज़िद और दृढ़ निश्चय को पूरा करने के लिए अब सांची पर अधिक कमाने और अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखा कर कुछ बनाने की धुन सवार हो गई थी। जिसके चलते सांची के चेहरे की कांति भले क्षीण पड़ने लगी हो, लेकिन उसकी खिलखिलाहट यथावत थी। अपनी बड़ी होती बेटियों के भविष्य को लेकर अब उसकी सोच स्थिर हो चुकी थी।

बेटियों को पढ़ाना और कुछ बनाना, कहने में जितना आसान था, हकीकत में वो बड़ा कठिन रास्ता था, जिस पर से सांची को गुजरना था। बेटियों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने के लिए उसे ढेर सारे पैसे चाहिए थे। मगर हालात उसकी इस इच्छा के आगे दीवार बने हुए थे।

एक तो पति का नाकारापन ऊपर से घर पर आये दिन ससुराल वालों के आ धमकने से भी उसकी आर्थिक स्थिति डांवाडौल हो जाती थी, लेकिन हार मानना उसकी फितरत में नहीं था। दो चार घरों में काम करके जो कुछ कमाती उसमें से एक हिस्सा उसने बेटियों की पढ़ाई के लिए बचाना शुरू कर दिया था। कभी कभार मेरे से अपने मन की बात करके शायद उसे सुकून और हौसला मिलता था।

आंटी, मैं सौम्या और छुटकी को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना चाहती हूं। मैं नहीं चाहती मेरी बच्चियों की जिंदगी भी मेरी जैसी हो। मैं तो नहीं पढ़ पाई मगर इन दोनों को ज़रूर पढ़ाउंगी, उसकी बातें सुनकर लगा कि मां ही वो इन्सान है जो अपने बच्चे को हर दुख को अपने में आत्मसात करके उसे सदा सुख से सराबोर करने को लालायित रहती है। इतना तो मैं भी कभी अपनी बेटियों ऋतु और रीना के लिए सोच नहीं पाई थी, अपनी बेटियों की लिखाई-पढ़ाई पर कभी इतना ध्यान तो मैंने भी नहीं दिया, मैंने मन ही मन सोचा। यह डिपार्टमेंट राजेश को सौंप कर मैं बेफिक्र हो गयी थी। आज सांची को देखकर और उसकी बातों को सुनकर अच्छा लगा। एक छोटे से गांव से आई लड़की जिसने कभी स्कूल का मुंह ही ना देखा हो अपनी बेटियों का भविष्य उज्जवल करने के लिए कितनी ऊंची सोच रखती है।

एक दिन सांची ने मेरी छोटी बेटी ऋतु से पूछा ’दीदी, अगर मैं अपना खाता आपके बैंक मे खुलवाऊंगी तो मेरे आदमी को पैसे के बारे में पता तो नहीं चलेगा ना। ऋतु निजी बैंक में डिप्टी मैनेजर थी।

ऋतु से बात करने के अगले ही दिन सुबह करीब दस बजे सांची का फोन आया ‘आंटी आज काम पर आने में थोड़ी देर हो जाएगी

कुछ जरूरी काम आ गया होगा इसलिये देर से आने के लिए बोल रही है। यह सोचकर मैंने भी कह दिया ‘ठीक है।’ शाम को सांची ऋतु के पास एक फॉर्म लेकर आई।’

‘यह क्या लाई है’ मैंने उत्सुकतावश पूछा।

आंटी बैंक में खाता खुलवाने के लिए फॉर्म लाई हूं, दीदी से भरवाकर, उनके बैंक में ही अपना खाता खुलवा लूंगी।’

उसका आत्मविश्वास और उसकी सोच देखकर मुझे महसूस हुआ कि बदलाव की शुरूआत हो चुकी है। स्नेह भरी नजरों से सांची को देखते हुए मेरे मन में सिर्फ यही बात घूम रही थी कि सांची जितनी हिम्मत तो मैं साधन संपन्न होने के बाद भी कभी नहीं जुटा सकी। मेरी बेटियों का भविष्य संवारने में भी मेरा उतना योगदान कभी नहीं रहा जितना आज सांची अपनी बेटियों का भविष्य संवारने के लिए दे रही है।

भविष्य पढ़ाई बेटियाँ

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