महिलाओं का सशक्तिकरण
महिलाओं का सशक्तिकरण
ज्वलंत एवं समसामयिक विषय है "महिलाओं का सशक्तिकरण"। कैसे किया जाए यह ताकि हर महिला खुली हवा में साँस ले सके। महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं, योजनाएँ बनती हैं, नारेबाजी होती है केवल वोट बटोरने के लिए। सत्ता प्राप्ति के बाद सारी बातें हवा हो जाती हैं। इस समस्या को जड़ से समाप्त करना केवल कुछ लोगों का कर्तव्य नहीं है। इसका आरंभ तो माँ की कोख से ही होना चाहिए। महिलाओं को ही अपनी पौध को संस्कारों से पोषित कर नित-प्रति सुंदर भावों से सींचना चाहिए, जिससे युवावस्था तक आते-आते प्रत्येक युवक का हृदय महिलाओं के प्रति सम्मान से ओत-प्रोत हो। उसे हर स्त्री में अपनी माँ, बहन तथा बेटियाँ ही नज़र आएँ। परिवार में ही ज़िंदगी के सारे सबक सिखाए जाते हैं। माता-पिता युवाओं के मित्र बन उनके सपनों को उड़ान देते हैं, वर्तमान परिस्थितियों का सामना करना सिखाते हैं एवं बुज़ुर्ग अपने अनुभव साझा कर जीवन का सार युवाओं के सन्मुख परोसते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवार के युवकों का उचित मार्ग दर्शन किया जाए, उनकी मानसिकता को सुधारा जाए, उनकी हर गतिविधि पर कड़ी नज़र रखी जाए, भटकाव की स्थिति एवं हर गलत बात को वहीं रोका जाए, ‘यह कहकर कि गरम खून है, गलती हो जाती है’ हम बुराइयों को बढ़ावा देते हैं, अतः हमें घर से ही लगाम लगानी होगी। परिवार में बुज़ुर्गों का खाली स्थान समाज की बिगड़ती दशा का आईना है साथ ही बच्चों को भी पथभ्रष्ट कर देता है। परिवार ही वह पाठशाला है जहाँ ज्ञान का भंडार है, परिवार ही वह चिकित्सालय है जहाँ हर बीमारी का इलाज है, जहाँ लिंग समानता है वहाँ नारी स्वयम सशक्त है।
राम तो बन जाएँगे किन्तु हमें शूर्पनखाओं से भी बचना है, पाश्चात्य संस्कृति को त्याग भारतीय संस्कृति को अपनाना होगा। फूहड़, बेढंगा पहनावा रोककर सीता की संस्कृति को पहनना होगा। समानता का अधिकार, एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना एवं विचारों की पवित्रता ही महिलाओं को सशक्त बनाएगी।
पीड़ा होती है विकृत समाज को देखकर। अतः यह विषय मेरे अन्तर्मन को छू गया। समाज सुधार हेतु जो भी विचार मन में तरंगित हुए, बस उन्हें ही मैंने लेखनीबद्ध किया है। आशान्वित हूँ कि मेरे शब्द समाज में परिवर्तन लाएँगे।
