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पथ आंगन में रख कर आई
पथ आंगन में रख कर आई
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© Suryakant Tripathi Nirala

Classics

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पल्लव - पल्लव पर हरियाली फूटी, लहरी डाली-डाली,

बोली कोयल, कलि की प्याली मधु भरकर तरु पर उफनाई। 

झोंके पुरवाई के लगते, बादल के दल नभ पर भगते,

कितने मन सो-सोकर जगते, नयनों में भावुकता छाई।

लहरें सरसी पर उठ-उठकर गिरती हैं सुन्दर से सुन्दर,

हिलते हैं सुख से इन्दीवर, घाटों पर बढ आई काई।

घर के जन हुये प्रसन्न-वदन, अतिशय सुख से छलके लोचन,

प्रिय की वाणी का अमन्त्रण लेकर जैसे ध्वनि सरसाई।

उत्कृष्ट रचना पथ आँगन में रख आई सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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