STORYMIRROR

Anjali Singh

Abstract

3  

Anjali Singh

Abstract

इश्क़ और समाज

इश्क़ और समाज

1 min
416

क्यू तेरे इश्क़ मे बंजारा बने फिरता है, दिल 


ज़ब तक तुझे देख ना लूँ

तब तक तड़पता है, दिल 

ना समाज के बंदिशो की फिकर, 

ना बंधन है, दिखता रीति - रिवाजो का 


क्यूं तेरे इश्क़ मे बंजारा बने फिरता है, दिल 


बंदिशे बहोत है, तेरे इश्क़ मे 

फिर भी तुझे हर पल है, सोचता दिल 


बंजारा बने, हर गली बस 

तुझे ही तुझे ढूंढता है, दिल 


क्यूं तेरे इश्क़ मे बंजारा बने फिरता है, दिल।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract