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भेद कुल खुल जाए
भेद कुल खुल जाए
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© Suryakant Tripathi Nirala

Classics

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भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है ।

देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है ।। 

हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये,

हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है । 

तरस है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में,

और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है । 

पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली,

हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है । 

ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें,

सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है ।

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला भेद कुल खुल जाए उत्कृष्ट रचना

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