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UtkarSh Nath Garg

Abstract

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UtkarSh Nath Garg

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देख ये धरती क्या कहती

देख ये धरती क्या कहती

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हे कृष्ण दुलारे गोकुल प्यारे देख धरती क्या कहती

जंगल जलता नदियां मरती सब कुछ अब यह सहती ..


यदा यदा ही धर्मस्य का ज्ञान तूने बतलाया ।

असल धर्म क्या है बंशीधर किसी को समझ ना आया।।


यमुना में देखो रे कृष्णा नागराज फिर आया ,

यमुना क्या अब जगह जगह अपना साम्राज्य बिछाया ।। 


नही रहा अब गरुड़ का भी डर वो भी अब कमज़ोर हुआ  ।

काली घटाओं के अम्बर में मृत्यु का ही शोर हुआ ।।


गौ माता भी बेचारी अब यहां कहलाई जाती हैं । 

कूड़ा कचड़ा मल मूत्र अब सब सब ही खाए जाती हैं ।।


जंगल धमक धमक है जलता धुआं धुआं चहुँ ओर हुआ ।

जाने कितने दिनों से न सुबह हुई न भोर हुआ ।।


जय गोपाला जय नंदलाला , त्राहिमाम घनघोर हुआ ।

जंगल की लपटों में देखो मृत्यु का ही शोर हुआ ।।


जब जब धर्म अधर्म बना तो याद तुम्हारी आती है । 

फिर से जन्म लो बंसीधर , जान हमारी जाती है ।।


फिर से जनम लो नंदलाला जान हमारी जाती है ।।

फिर से जन्म लो गोपाला जान हमारी जाती है ।।


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