वह अपरिचित
वह अपरिचित
उन सजल संवेद आंखों की कहानी क्या कहूं
उसकी भाषा प्रेममय मीरा की वाणी क्या कहूं
उस प्रेम की धरती पे मैं बादल बना बरसा किया
वह प्यार था या कि मेरी आदत पुरानी क्या कहूं
प्रीत की यादें सुहानी आंख के कोनों में पानी
दे गई पतझड़ के मौसम में नया मधुमास जैसे
जी रहे है ऐसे कि हो आखिरी हर सांस जैसे
सद्भावना की ज्योति वो और प्रेम का पर्याय वो
हर व्यथा हर पीर की औषधि भी वो उपाय वो
कविता नहीं वह जिसको शब्दों में मै अपने बांध लूं
मेरी हर कविता के हर इक शब्द का अभिप्राय वो
वह सुदर्शन जिसका दर्शन जैसे रति का रति प्रदर्शन
उसका इक पल साथ होना स्वर्ग का आभास जैसे
जी रहे हैं ऐसे की हो आखिरी हर सांस जैसे
