Gaurang Saxena

Inspirational


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विजयी भव:

विजयी भव:

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नमस्ते,मैं निशा, एक खुशमिजाज़ और हँसमुख लड़की। सच कहूँ तो परेशानियों को अपने से थोडा दूर ही रखना पसंद करती हूँ। वैसे पसंद की बात करे तो मुझे लॉन टेनिस खेलना सबसे अधिक अच्छा लगता है। कल शाम को मेरा ‘सेमी-फाइनल’ एक बहुत मजबूत खिलाड़ी के साथ था। बहुत तेज़ बारिश भी हो रही थी। पर अंतत: मैंने बाज़ी मार ही ली। भीगने की वजह से थोड़ी तबियत ज़रूर खराब हो गई, पर कोई नहीं। कल सुबह ‘फाइनल’ है। बस किसी तरह मै जल्दी से ठीक हो जाऊँ। यह खेल मुझे जीतना है वर्ना अपने दोस्तों के सामने मेरी नाक कट जाएगी।

कल का पूरा दिन ही व्यस्त रहा। शाम को ‘सेमी फाइनल’ था और सुबह दफ्तर में उत्सव मनाया गया। मुझे सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी का पुरस्कार जो मिला था। खाने पीने के लिए बहुत कुछ मँगवाया गया, हँसी मजाक और खूब मौज मस्ती हुई। सबने प्रशंसा भी की। बहुत अच्छा लगा।

अच्छा मैं बाद में बात करती हूँ, पापा मम्मी आ गए

भरत:" बधाई हो! बधाई हो! पुरस्कृत होने से आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाता है। ऐसे ही आगे बढती रहो। तुम्हरे लिए रसमलाई और जलेबी लाया हूँ। तुम्हे पसंद है न?"

निशा:" सच में! वाह! शुक्रिया पापा।"

भरत: "निशा, तुम्हे ध्यान होगा कि कल शादी के लिए तुमको देखने रघुबरदास और उनका लड़का शिखर आए थे। लडके से तुम्हरी बात भी हो गई थी। आज रघुबरदास अकेले में मुझसे मिलने आ रहे है। अब तुम भी बता दो कि क्या सोचा है। देखो, लड़का अच्छा है और उसके पिता जिस तरह से अपने परिवार के बारे में बता रहे थे उससे सब अच्छा ही लग रहा था। "

[इसे कहते है रंग में भंग पड़ना। लड़कों से तो मेरी कभी बनती ही नही है। किसी लड़के से मिलती हूँ तो लड़ाई तो ज़रूर होती है। उनसे मेरा ३६ का आंकड़ा है और यहाँ उन्ही के साथ शादी की बात हो रही। मैं शांत रही। कल खेल के दौरान भीगने के कारण तबियत कम अच्छी थी इसलिए मैं अपने कमरे में आराम करने चली गई। दफ्तर भी देर से जाने का निश्चय किया था। मैं अपने बिस्तर पर आराम कर रही थी कि मुख्य द्वार पर दस्तक हुई। रघुबरदास पधारे थे। उनका स्वागत किया गया और पुनः चर्चा की बिसात सज गई ]

रघुबरदास: "भरत जी, पिछली बार लोगों से मिल कर बहुत अच्छा लगा। हमें आपकी बेटी भी बहुत पसंद है। हम सभी को यह रिश्ता मंजूर है। आप लोगों ने क्या सोचा है?"

भरत: "बहुत-बहुत शुक्रिया। हमें भी शिखर बहुत पसंद है। आज से आपका बेटा हमारा और हमारी बेटी आपकी हुई। अब यह बताइए आगे कैसे करना है ?"

रघुबरदास: "हम कौन होते हैं बताने वाले। जैसा आप ठीक समझें। अब तो बस एक अच्छी शादी हो जाए तो मजा आ जाए। वैसे एक बात माननी पड़ेगी कि आपने अपने परिवार को काफी अच्छे से रखा है। आपका घर भी बहुत अच्छा है। काफी महँगा सामान रखा है आपने। अच्छा है शादी में आप अपनी बेटी को अच्छे तोहफे भी दे सकेंगे। आपका काम हल्का करने के लिए मैंने एक सूची तैयार की है।

इतने ऊँचे औदे पर बैठा लड़का आपका दामाद बन रहा है। तब आप भी यही चाहेंगे की वह एक आलिशान घर में रहे और बड़ी गाडी में चले जो उसके औदे से मेल खाए। आप चिंता मत कीजिए। मैंने एक तीन कमरों का घर और एक गाड़ी देख रखी है। आप वही उन्हें दे दीजिएगा।  

अब कल की ही बात है, शिखर की माताजी को एक हार पसंद आ गया। ५ लाख का था। अब वह लेना है। मै तो सोचता हूँ कि यह अच्छा मौका है। आप ही उन्हें दे दीजिएगा। इसी बहाने मेल मिलाप भी बढेगा।

आप देख ही रहे होंगे कि मेरे को कुछ नही चाहिए बस मैं तो आपकी मदद ही कर रहा हूँ। वर्ना आप को कितना कुछ सोचना पड़ता। मैं इस सूची को पढ़ देता हूँ। आपको भी आसानी हो जाएगी।


इन दोनों के भविष्य के लिए आप २-२ लाख की एक एफ.डी करवा दिजिएगा। तीन कमरों का घर, एक गाडी और शिखर की माँ के लिए हार मैंने आपको बता ही दिया था| तो वह आप ले लीजिएगा। हमारे यहाँ लड़की की तरफ से लड़के के ससुराल के सभी लोगों के लिए कुछ सामान दिया जाता है। इससे और अच्छे से जान पहचान हो जाती है। तो वह देख लीजिएगा। निशा के लिए आप ३-४ बस्तों में उसका सामान भिजवा दीजिएगा। जैसे साड़ी, ज़ेवर, बर्तन इत्यादि। जो सामान बताया है वह तो शादी के लिए जरूरी ही है परन्तु इसके अतिरिक्त कोई अन्य तोहफा आप किसी को देना चाहे तो जैसी आपकी इच्छा। हम चाहते है कि शादी इसी महीने हो जाए। अब दौड़ भाग न हो इसलिए आप हमें यह सब सामान शादी के पहले ही दे दीजिएगा। हम तो कहेंगे की घर की रजिस्ट्री और कार की चाबी तो आप २ हफ्ते में ही ले लीजिए और शिखर की माँ का हार इसी हफ्ते ले लीजिए। हमको बस दिखा दीजिएगा एक बार।

आपको हम बताए भाईसाहब, मेरे बेटे के लिए इतने रिश्ते आ रहे है कि क्या कहे। दरअसल प्रशासन में कई बड़े लोगो के साथ हमारा उठाना बैठना है इसलिए हर कोई हमसे रिश्ता जोड़ना चाहता है। आलम यह है कि कोई १० लाख नकद देने की बात कर रहा तो को कोई एक आलिशान बंगला। पर शिखर को तो सिर्फ निशा ही पसंद आई है। आपकी बेटी बहुत खुश रहेगी हमारे यहाँ। बस वह सब सामान याद रखिएगा। मेरे अनुसार आपको ४०-४५ लाख तक का ही खर्च आना चाहिए बस। अच्छा अब हम चलते हैं। नमस्ते। "

[उनके जाने के पश्चात पापा कुर्सी पर ही गड़ गए। वह पापा से इस शादी के लिए सीधा सीधा दहेज़ माँग रहे थे। अपने मन में बेटी के उज्जवल भविष्य की लौ पर एकाएक दहेज नाम की आँधी के प्रहार से वह अति व्याकुल हो गए। मैंने अपने आप को इतना असहाय कभी नहीं समझा था। आज मुझे यह बताया गया कि मैं एक लड़की हूँ, इंसान नहीं। आज मुझे यह बताया गया कि मैं सिर्फ एक वस्तु हूँ जिसे कोई खरीदने आता है और उसके गुण नहीं केवल कीमत पर बात करता है। आज मुझे मेरी पढ़ाई और जीवन में प्राप्त हर उपलब्धि एक बेईमानी लग रही थी। एक पिता से उसकी बेटी के भविष्य के लिए मूल्य माँगा जा रहा था। मैं अपने शोकाकुल पिता के पास गई। वह यह दिखाने का प्रयास कर रहे थे कि सब सामान्य था परंतु वह जो बिना कहे मेरी हर बात को समझ लेते हैं उनकी मन की पीड़ा समझने में मुझे देर न लगी]

भरत: "अरे! निशा, तुम्हारी तबीयत ठीक है अब ? तुम्हारी शादी तय हो गई है। तुम्हें तो खुश होना चाहिए और तुम मुँह लटकाए खड़ी हो।"

निशा:" पापा, वह आपका अपमान कर रहे थे। मेरी कीमत लगा रहे थे और आप मुझे खुश होने के लिए कह रहे हैं ?"

भरत:" यह तो बड़ों की बातें है। यह तो रिवाज है। वह तो यह कह रहे थे कि उन्हें सिर्फ तुम चाहिए और कुछ नहीं। तुम्हारे दादा जी ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ छोड़ा है। अपने गाँव में एक जमीन है। वैसे भी वह किसी काम की नही है। उसका उपयोग कर लेंगे। सब कुछ हो जाएगा तुम तो बस अब महल की रानी बनने की तैयारी करो। "

[मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि अपनी बेटी के लिए एक पिता के त्याग और प्यार पर गर्व करूँ या मुझे किसी और के चश्मे से मेरी हैसियत बताने वाले उस रघुबरदास से घृणा। मुझे घुटन सी महसूस होने लगी थी। मुझे लग रहा था कि सर्वदा उड़ान भरने के सपने देखने वाली निशा को कैद में बंद कर दिया गया था। घर पर और न रुक कर मैं दफ्तर चली गई पर जगह बदलने से भी मेरे मन में चल रहा भीषण महाभारत कहाँ थमने वाला था। काम करने में मन ही नहीं लग रहा था। सबसे मिलनसार हँसमुख और साल की सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी आज सबके बीच अकेली निराशा में डूबी अकर्मण्येय थी। मेरा दम घुट रहा था। मेरी आत्मा चीत्कार कर रही थी। मेरे व्यवहार को देखकर मेरे साथी भी संशय में पड़ गए। अपने प्रिय मित्रों के साथ मैं हर बात साझा करती थी परंतु अपने ऊपर हुए कुठाराघात के बारे में क्या कहती ? इन्हीं मित्रों के साथ आँख में आँख डालकर हर परिस्थिति का सामना किया था। परंतु अब इनसे ही आँख नहीं मिला पा रही थी। शाम को घर आने पर हल्का बुखार था परन्तु तन की पीड़ा से अधिक मन की पीड़ा से मुझे परेशानी हो रही थी। तभी वहाँ रमा आ गईं। वह माताजी को खाना बनाने में मदद करती हैं]

रमा: "नमस्ते निशा दीदी।"

निशा:"नमस्ते रमा। कैसी हैं आप?"

रमा: "मैं अच्छी हूँ। आपकी तबियत कैसी है ? आपकी मम्मी ने सेब का रस भिजवाया है। आपको ताकत मिलेगी और आप शीघ्र ही स्वस्थ हो जाएँगी।

निशा: मेज पर रख दीजिए। अभी कुछ पीने का मन नहीं कर रहा।"

रामा:"दीदी, छोटा मुँह बड़ी बात, यदि आप इजाजत दें तो मैं कुछ कहूँ ?"

[निशा ने हाँ में सिर हिलाया]

रमा:" मैंने साहब और उस व्यक्ति के बीच बात सुनी थी। मैं आपकी पीड़ा समझ सकती हूँ। जिस आघात से आप छत-विक्षत होकर तड़प रही हैं वहीं बाण हम लोगों को न जाने कितनी बार भेद चुका है। हमें तो अपनी बात कहने या विरोध करने का भी अधिकार नहीं है। हम लोग आपकी तरह पढ़े लिखे नहीं पर भावनाएँ तो हमारी भी होती हैं। इस कुरीति को भी कुछ लोगों ने अपनी सुविधानुसार गढ़ लिया है। कुछ तो कहते हैं कि मुफ्त का पैसा है जरूर लेना चाहिए और यदि कोई लेने से मना करें तो उसे बहुत संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे लोग समझते हैं कि लड़की पक्ष के सामने वह श्रेष्ठ है और उन्हें कुछ भी करने का अधिकार है।

आपको बताऊँ दीदी, मेरी सहेली की शादी हुई थी। बहुत खुश थी परंतु शादी के कुछ ही महीनों के बाद ससुराल पक्ष ने कम दहेज लाने के लिए उसे ताना देना शुरू कर दिया। एक मारुति कार माँगने लगे। उसे प्रताड़ित करने लगे। लड़की के पिता ने हाथ जोड़े परंतु वह लालची लोग टस से मस न हुए। किसी तरह उसके पिता ने अपनी जमीन गिरवी रख कर वाहन का इंतजाम किया। गाडी मिलने से कुछ समय के लिए सब शांत हो गया परंतु जब उसने एक कन्या को जन्म दिया तब वह सब कुछ फिर शुरू हो गया। उनको लड़का चाहिए था। इस बात को लेकर वह उसे पीटते, गालियाँ देते थे और वह बेचारी अपनी बच्ची को गोद में उठाए उसे निहारती रहती थी। वह तो भला हो उसके पड़ोसी का जिसने पुलिस की मदद से उस बेचारी को उसके पिता तक पहुँचाया। वरना वह लोग तो उसे मार ही डालते।

मैंने देखा है जब एक लड़का जन्म लेता है तब सभी उसके माता-पिता को बधाई देने आ जाते हैं। घरवाले भी समाज के लोगों को बड़ी शान से प्रीतिभोज खिलाते हैं और उस घर को ऊँचा दर्जा दे दिया जाता है। परंतु यदि कन्या ने जन्म लिया तब सभी उसके माता-पिता को सांत्वना देने आ जाते हैं। यद्यपि वह माता-पिता अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी अनुभव कर रहे हो पर उसका कोई मोल नहीं होता। आप जानती हैं दीदी, असल में घर वाले इस बात की खुशियाँ नहीं मनाते हैं कि पुत्र आया है, वह खुशी इस बात की मनाते हैं कि २५ साल के बाद वह दहेज लाएगा। वहीँ पुत्री के जन्म में दु:ख इस बात का नहीं है कि पुत्री हुई है, दु:ख इस बात का है कि उसके पिता को दहेज का भार उठाना पड़ेगा। आजकल अपनी संतान के प्रति अभिभावकों का स्नेह नि:स्वार्थ नहीं रह गया है। वह तो दहेज़ की परिधि में घूमने लगा है। "

निशा: आप ठीक कह रही हैं। लड़के तो लड़के, आजकल तो लड़कियाँ भी कुछ कम नहीं है। हँसी-मज़ाक में अपने पुरुष मित्रों से कहती हैं कि यदि वह मोटा हो जाएगा तो दहेज कम मिलेगा। यहाँ तक कि कुछ लड़कियाँ तो यह भी कहती हैं कि मेरा अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार है इसलिए यह सब अवश्य देना चाहिए। बताओ! जो इस कुरीति से सर्वथा प्रभावित हैं वहीं इसका स्पष्टीकरण और बढ़ावा देने लगे तो दूसरे का हौसला तो बुलंद होगा ही। ऐसी स्थिति में कैसे खत्म होगा यह सब। जितना बड़ा आदमी उसी अनुपात में माँगे।

मैं तो मानती हूँ कि जिसके पास पैसा नहीं वह आर्थिक गरीब है पर दहेज़ चाहने वाले लोग मानसिक गरीब है। शिक्षा आपको धन दे सकती है पर केवल एक अच्छी परवरिश ही दहेज प्रथा को खत्म कर सकती है। इस बात को रघुबरदास ने अच्छे से सिद्ध करके भी दिखा दिया है। उन्होंने मेरी कीमत लगाई रमा। उनके बेटे से अधिक पढ़ी हूँ मैं। शिखर की तुलना में मैं अधिक प्रतिष्ठित उद्योग में हूँ। संभव है कि मेरी आय भी उससे अधिक हो। यहाँ तक की खेल कूद में भी उसके मुकाबले बहुत आगे हूँ। परन्तु सिर्फ इसलिए कि मैं एक लड़की हूँ, क्या इन उपलब्धियों का कोई महत्त्व नहीं ?  

[मैं क्रोध में लाल हो गई थी। हो भी क्यों न, मेरे आत्मसम्मान का समूल नाश करने का प्रयत्न किया गया था। मैं इस तरह नहीं रह सकती थी। मैंने उन्हें सबक सिखाने का निश्चय किया और शिखर को दूरभाष कर दिया]

शिखर [रघुबरदास से]: पापा, आज आप निशा के घर गए थे और आपने उनसे दहेज माँगा यह जानते हुए भी कि मैं दहेज के सख्त खिलाफ हूँ?

रघुबरदास: “दहेज़ के खिलाफ हूँ” से क्या मतलब है ? शिखर तुम अभी बच्चे हो इसलिए तुम्हें नहीं पता दुनिया कैसे चलती है। जो तुम कह रहे हो यह सब किताबी बातों की भाँती परोक्ष होती हैं। प्रत्यक्ष दुनिया में यह किसी काम की नहीं। लड़की घर में आएगी तो उसका खर्च तुम्हारे पर ही तो आएगा। वैसे भी अभी लड़की के पिता ही तो लड़की का खर्च उठा रहे हैं। अब वह लड़की तुम्हें दे रहे हैं तो वह खर्च भी उनसे माँगने में क्या परेशानी है ? तुम्हारी बहन भी बड़ी हो रही है। उसकी भी शादी करनी है। उसके ससुराल वाले भी तो हमसे दहेज़ माँगेंगे। वह सब कहाँ से आएगा ?

शिखर: पापा, विवाह कोई व्यापार नहीं जिसे एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो की संज्ञा में रखा जाए। लाडो को हम इतना काबिल बनाएँगे कि लड़के खुद उससे विवाह की अर्जी लेकर हमारे पास आएँगे। यदि कोई व्यक्ति इस काबिल नहीं कि वह अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठा सके तो उसे शादी करने का अधिकार नहीं है। निशा तो स्वयं रोजगार कमाती है। वह तो मुझे सहारा देगी, मुझपर बोझ क्यों बनेगी ?"

रघुबरदास: "जवान लड़ाता है! लड़की काम करेगी तो तुम्हारा घर कौन संभालेगा? अपनी माताजी को देखो, यदि वह भी काम करने बाहर जाती तो तुम क्या आज इतने काबिल और सशक्त बन पाते? इसलिए मैं कहता हूँ कि सजीव उदाहरण देखो और समझो। बातों से घर नहीं चलता।

शिखर: आप और माताजी के त्याग और मेरे प्रति स्नेह के लिए मैं सदा ऋणी हूँ। पहले की लडकियाँ भी पढ़ी लिखी होती थी परंतु शादी के उपरांत उनसे कहा जाता था कि तुम अपने भविष्य में आने वाले अपने बच्चे के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए अपने वर्तमान में अर्जित सभी ज्ञान को भूल जाओ और घर पर रहो। तत्पश्चात हम बड़े ही गर्व से इसे त्याग कह देते थे। "

मेरे विद्यालय और अभियांत्रिकी के पहले दिन से मैंने लड़कियों के साथ पढ़ाई की। उनके साथ हँसी मजाक किया और परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। यहाँ तक की दफ्तर में भी मैंने लड़कियों के साथ काम किया। उनके और मेरे ज्ञान में कोई अंतर नहीं है। यहाँ तक की कई तो मेरे से भी अधिक मेधावी थीं। फिर शादी के बाद लड़के काम करें और लड़कियाँ न करें यह हम कैसे कह सकते हैं ? यदि यही बात लड़कियाँ लड़कों को कहने लगे कि लड़का घर संभाले और लड़की काम करके आमदनी का साधन बने, तब क्या होगा ? तब पुरुष इसे अपने अहं पर ले लेंगे। निशा मुझे बहुत पसंद है परंतु उसके लिए उसके स्वाभिमान से बढ़कर कुछ नहीं। उसका दूरभाष आया था और उसने मुझसे शादी करने से मना कर दिया है। आपसे बस यही प्रार्थना है कि किसी और लड़की से दहेज न माँगिएगा अन्यथा इसी प्रकार एक और निशा खड़ी हो जाएगी।

भरत [निशा से]: "तुमने शिखर से क्या कहा है? इतना अच्छा रिश्ता ऐसे ही ठुकरा दिया? तुम्हे किसने कहा था उससे बात करने को? कोई समस्या थी तो मेरे से बात करनी चाहिए थी। "

[मैंने अपनी पैरवी करते कहा]

निशा:" पापा, इज्जत से बढ़कर कुछ नहीं होता। अपने स्वाभिमान को तार-तार कर मैं एक सुंदर जीवन कैसे जी सकती थी? आपने सदैव मुझे सिर उठा कर जीना सिखाया है और आज कोई हम दोनों का सिर नीचे करना चाहता था तो मैं यह कैसे स्वीकार कर लेती? लालची लोग कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकते हैं। आज उनकी माँगों को पूरा करते तो वह कल शादी के बाद कुछ और भी माँग सकते थे। क्या हम शादी का हर्जाना पूरी जिंदगी भरते रहते? आप कहते हैं कि दहेज एक रिवाज है परन्तु मैं यह नही मानती। सती और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति भी रिवाज के नाम पर ही चलते थे। परंतु इन्हें भी हमारे समाज के लोगों ने ही खत्म किया। दहेज एक अपराध व कुरीति है जिसे हमें खत्म करना है। मैंने भी यही कोशिश की है। पापा, लड़की होना कोई पाप नहीं है बल्कि वह तो सम्मान, तहजीब और सुंदरता का पर्याय है। समाज के रसातल में पड़े इन जैसे लोगों को ईश्वर की इस अद्वतीय कृति के बारे में बताना बहुत जरूरी है। बस यही मैंने किया। "

[अपनी बेटी की बातें सुनकर भरत भावुक हो गए। उन्होंने निशा को अपने पास बुलाया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगे]

भरत: मुझे तो पता ही नही चला और तुम इतनी बड़ी हो गई? आज तुम्हारा लॉन टेनिस का मैच है न? जिस प्रकार लड़कियों के आत्मसम्मान के लिए तुमने लड़ाई जीती है उसी प्रकार अपने खेल में भी जीतना। विजयी भव:।


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