Vivek Sharma

Action Fantasy Inspirational


4.0  

Vivek Sharma

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तालाबंदी ने कईयों के हुनर निकाले बाहर

तालाबंदी ने कईयों के हुनर निकाले बाहर

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अब ज्यादा बताने की जरूरत तो है नहीं कि 23 मार्च के बाद दुनिया के हर इंसान की जीवन शैली में कितना बड़ा बदलाव आया है। यह अलग बात है कि कुछ लोग नहीं मानते कि वे जिंदगी की एक अबूझ परीक्षा से गुजर चुके हैं। चलिए ज्यादा दूर ना जाते हुए व्यक्तिगत अनुभवों का जिक्र करना चाहूंगा।

चूंकि पंजाब की मिट्टी से जुड़ा हुआ हूं, तो लोक नृत्य भांगड़ा करने का हमेशा ही दिल हुआ करता था। जिला पटियाला से संबंधित हूं, थोड़ा बहुत भांगड़ा आता था लेकिन उस आत्मविश्वास के साथ करने में थोड़ा हिचक महसूस होती थी, क्योंकि कभी भी मैंने भांगड़ा नहीं सीखा था, जो थोड़ा बहुत आता था वही मेरे प्रिय एक्शन थे। अब तालाबंदी का पहला हफ्ता था जैसे-तैसे बीत गया ।ऑफ़िस वालों ने कह दिया कि आप घर से ही काम करो ऑफ़िस मत आना। ऑफ़िस जाने आने में लगने वाले 3 घंटे अब मेरे पास अतिरिक्त बच रहे थे। गर्मियों के दिन है, तो आमतौर पर सुबह 6:30 बजे आँख खुल जाती है। पहले जहां ऑफ़िस जाने के लिए भागम-भाग होती थी अब उसकी जगह दो ढाई घंटे घर की छत पर जाने का मौका मिला। 

यहां आस-पास ऊँचे पेड़ हैं, सुबह के समय पेड़ों पर चहकती चिड़िया, ठंडी हवाएँ, दूर पास के मंदिरों-गुरुद्वारों से आरती एवं अरदास की आती मधुर ध्वनि, सूरज की बादलों से आँख मिचोली, ऊँचे आसमान में उड़ते पक्षियों के झुंड, यह सब नज़ारे जो किसी वक्त हमें खेतों पर जाने पर ही नजर आते थे ..अब यह सब घर की छत से ही नजर आने लगे थे। मैं भी खुद को प्रकृति के ज्यादा करीब महसूस करने लगा। चलिए एक हफ्ता ऐसे ही और बीत गया ।

उधर छोटे बच्चों के स्कूलों ने ऑनलाइन कक्षाओं का निर्देश दे दिया। अब घर में छोटे बच्चों ने ज़िद की, कि हमें लैपटॉप पर ऑनलाइन कक्षाएं लगानी है, मैंने उन्हें 2 घंटे के लिए लैपटॉप रोजाना देना शुरू कर दिया। एक दिन अचानक भतीजी मेरे पास आई और बोली चाचू हमें भंगड़ा सिखाओ, हफ्ते में 3 दिन हमारा डांस का पीरियड होता है। अब जो बच्चे अपने टीचर को लैपटॉप के माध्यम से देखकर भांगड़ा सीख रहे थे मेरा उनको कोटि-कोटि नमन। क्योंकि अध्यापक साहिबा बेहद सरल एवं प्रभावशाली ढंग से बच्चों को भांगड़ा और गिद्दा केन स्टेप्स सिखा रही थी। अब यहां से मेरे दिल में भी‌ भांगड़ा सीखने की चिंगारी जो दबी पड़ी थी, अब वो धधक चुकी थी। स्कूल अध्यापक के 3 दिनों के स्टेप्स सीखकर मैं जान चुका था कि मुझ में सीखने की ललक अभी बाकी है। अब दिक्कत यह हुई कि भांगड़ा सीखने के लिए मुझे सप्ताह के आखिरी 3 दिनों का इंतजार करना पड़ता, क्योंकि डांस पीरियड सप्ताह के आखिरी 3 दिनों में हुआ करता था । अब भांगड़ा की ललक पहले से ज्यादा जोर पकड़ गई, क्योंकि अब मुझे लगा कि भांगड़ा एक्सरसाइज करने का भी एक बेहतरीन जरिया है। ऐसे में कहीं मुझे याद आया कि मेरे पास एक भांगड़ा मास्टर का नंबर सेव है, जिसे हम पिछले साल एक शादी के वक्त बुकिंग करके आए थे। मैंने उनसे संपर्क किया और पप्पू ढोली ने बता दिया कि वह भी ऑनलाइन क्लासेस लगा रहे हैं, अब यह तो वह बात हुई अंधा क्या चाहे दो आंखें। खैर वह तीन शेड्यूल में भांगड़ा सिखा रहे थे तो मुझे शाम वाले ग्रुप में जगह मिल गई। और यहीं से सफर शुरू हुआ करीब 20 साल पुराने एक शौक को पूरा करने का। 

भांगड़ा के लिए पहले हल्की-फुल्की एक्सरसाइज और फिर सिलसिलेवार भांगड़ा के पारंपरिक स्टेप्स मैंने 3 हफ्ते में सीख लिए, कुछ यूट्यूब का भी सहारा मिला, वहां से भी कुछ काफी कुछ सीखने को मिला। यकीन मानिए कॉलेज के समय से भांगड़ा सीखने की जो शिद्दत , एक ललक जो दबी पड़ी थी, अब‌ वो असल रूप में , व्यवहारिक तौर से मुझ पर हावी हो चुकी थी। पर अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मुझे चाहे आप ग़ज़ल चला कर दे दीजिए मैं इस पर भी भांगड़ा कर लूंगा ( भांगड़ा में कुछ स्लो स्टेप्स होते हैं, जिन्हें झूमर, कलियों के साथ ताल मिलाकर किया जा सकता है)।


सच पूछिए, तो भांगड़ा आज मेरा रोजाना की एक्सरसाइज वाला हिस्सा बन चुका है, और एक बात और भांगड़ा सीखाने वाले पप्पू ढोली का भी यही मानना है कि मैंने बड़ी तेजी से भांगड़ा के मुश्किल और जटिल स्टेप्स सीखे हैं। मैं तहे दिल से शुक्रगुजार हूं छोटे बच्चों का, उनकी अध्यापक साहिबा का, जिन्होंने मुझे अप्रत्यक्ष रूप से अपने पुराने शौक को पूरा करने का राह दिखाया‌ । धन्यवाद पप्पू ढोली और यूट्यूब के भांगड़ा मास्टर्स का भी, जिन्होंने मुझ में नई उर्जा, नया जोश और नया आत्मविश्वास पैदा कर दिया। 

कहां पिछले 20 साल से कामकाज, ऑफ़िस की आपाधापी और कहां पिछले छह सात हफ्तों मैं मैंने वह कर दिखाया जो मैं बीते दो दशकों में दिल से नहीं कर पाया। यह अनुभव ताउम्र अविस्मरणीय रहेगा। 

चक्क दे !



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