"सूखा पेड़ .... फिर हरा-भरा हो गया "
"सूखा पेड़ .... फिर हरा-भरा हो गया "
नमन"StoryMirror"
विधा: एक लघु संस्मरण
शीर्षक:"सूखा पेड़.. फिर हरा-भरा हो गया"
विश्लेषण :"सूखा पेड़.. फिर हरा-भरा हो गया" — यह केवल प्रकृति का चक्र नहीं, 75 बसंत पार कर चुके मन की पुनर्जागृति है, जहाँ तकनीक ने ठूँठ में जल डालकर यत्न, साधना और अपनों के स्नेह से वसंत लौटा दिया। यह कथा बताती है कि उम्र देह की होती है, जिज्ञासा की नहीं — जब सीखने की चाह हो तो हर सूखा पेड़ बीज बन जाता है, जिसमें सौ वसंत छिपे होते हैं।
दिनाँक:19 जुलाई 2026
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"सूखा पेड़.. फिर हरा-भरा हो गया"
(संस्मरण )
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
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सूखा पेड़। जिसकी शाखाएँ समय के थपेड़ों से चटक चुकी थीं, जिसकी छाल दरक कर झर रही थी, जिसके पत्ते न जाने कब हवा में बिखर कर धूल हो गए थे। जीवन के पतझड़ में खड़ा वह वृक्ष केवल अपनी स्मृतियों की छाया में साँस ले रहा था। लोग उसे देखते और कह उठते — "अब इसमें बचा ही क्या है?"
परन्तु प्रकृति का विधान बड़ा विचित्र है। जहाँ सब समाप्त दिखता है, वहीं से आरम्भ की एक कोमल कोंपल फूटती है।
एक विस्मृत युग का ठूँठ
मैं भी वही सूखा पेड़ था। आयु के सत्तर बसंत पार करते-करते जीवन की गति धीमी पड़ गई थी। दुनिया बदल रही थी, दौड़ रही थी, उड़ रही थी। और मैं? मैं अपनी कुर्सी पर बैठा, अख़बार की सुर्खियों और दूरदर्शन के समाचारों तक सिमटा हुआ था।
घर के नन्हे-मुन्ने बच्चे एक अद्भुत यंत्र को कलेजे से सटाए रहते थे। उनकी उँगलियाँ उस चमकदार पटल पर नाचतीं, और वे खिलखिला उठतीं। वह यंत्र उनके लिए खिड़की था — पूरी दुनिया की खिड़की।
मैं अनभिज्ञ था। मेरे लिए तो यंत्र का अर्थ रेडियो, टेलीफोन और अधिक से अधिक टेलीविजन तक था। यह नया यंत्र — मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट — मेरे लिए किसी दूसरे लोक की भाषा थी। मैं ठगा-सा, ओझराया हुआ सा देखता रहता हूँ। मन में कहीं एक कसक उठती — क्या सचमुच मेरा समय बीत गया? क्या अब मैं इस दौड़ती दुनिया का मात्र दर्शक रह गया हूँ?
अर्जुन को मिला कृष्ण।तभी मेरे बउआ ने मेरा हाथ थामा। कहा —
"बाबा, आप भी सीख लीजिए। बड़े काम की चीज़ है! आप सम्पूर्ण विश्व से जुड़ जाएँगे। नए-नए मित्र आपके बन जाएँगे। इंटरनेट हम लोगों को मिला एक वरदान है!"
उस दिन मैं गांडीवधारी अर्जुन बन गया और मेरा पुत्र मेरा सारथी कृष्ण बन गया। उसने मुझे गीता का सार समझाया — कर्म करो, सीखो, रुको मत। आयु देह की होती है, जिज्ञासा की नहीं। उसके शब्दों ने मेरी अंतरात्मा को झकझोर दिया। लगा जैसे किसी ने सूखे पेड़ की जड़ों में जल डाल दिया हो।
कहीं भीतर एक ध्वनि गूँजी — ठूँठ हो गया तो क्या हुआ… यत्न और साधना से फिर वसंत की हल्की-सी बयार भी लौट सकती है! सूखी डाल पर भी वसंत लौट सकता है, यदि साधना हो, यदि चाह हो।
वसंत की पहली हिलोर
मेरा उत्साह देखकर मेरे बेटे ने मेरे लिए "डेस्कटॉप" ला दिया। स्वयं गुरु बनकर एक-एक अक्षर सिखाया — माउस पकड़ना, की-बोर्ड पर उँगली रखना। मेरी बेटी ने जन्मदिन पर "लैपटॉप" भेंट किया, कहा — "बाबूजी, अब आप अपनी कविताएँ खुद टाइप कीजिए।" पुत्र ने मेरी लगन देखी तो एक सुंदर मोबाइल थमा दिया — "इससे आप दुनिया से बात कर सकेंगे।"
वे तीनों मेरे द्रोणाचार्य बन गए, और मैं अस्त्र-सज्जित अर्जुन। जिस यंत्र से मैं अनभिज्ञ था, वही अब मेरी सारथी बन गया।
हरा-भरा हो गया सूखा पेड़
आज वही सूखा पेड़ हरा-भरा हो गया है। जिस उँगली में कभी कलम कांपती थी, अब वही उँगली कीबोर्ड पर कविता रचती है। जिस आँख को छोटे अक्षर पढ़ने में कष्ट होता था, वही आँख अब वीडियो कॉल पर सात समंदर पार बैठे नाती-पोते का चेहरा देखकर तृप्त होती है।
इंटरनेट ने मुझे सचमुच विश्व से जोड़ दिया। पुराने मित्र मिल गए, नए पाठक जुड़ गए। मेरी रचनाएँ अब कागज़ की कैद से निकलकर आकाश में उड़ने लगीं। मैं फिर से लिखता हूँ, पढ़ता हूँ, सीखता हूँ।
यह यंत्र वस्तुतः नव स्फूर्ति का मंत्र बन गया। इसने सिद्ध कर दिया कि उम्र केवल गिनती है। मनुष्य जब तक सीखने को तत्पर है, तब तक वह ठूँठ नहीं, बल्कि बीज है — जिसमें सौ वसंत छिपे हैं।
सच ही है —
यत्न, साधना और अपनों के स्नेह से सूखा पेड़ भी हरा-भरा हो जाता है।
और मैं? मैं आज लहलहाता हुआ वह वृक्ष हूँ, जिसकी डाल पर नए पत्तों के साथ नए स्वप्न भी झूम रहे हैं।
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डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका, झारखंड
