' मिलिटरी ट्रेनिंग : सबके लिए एक पाठशाला "
' मिलिटरी ट्रेनिंग : सबके लिए एक पाठशाला "
नमन
विषय: सैन्य प्रशिक्षणविधा: संस्मरणघोषणा: स्वरचित मौलिक
विश्लेषण: संस्मरण 'मिलिट्री ट्रेनिंग: सबके लिए एक पाठशाला' केवल युद्ध-कौशल नहीं, बल्कि अनुशासन, समयबद्धता और सामूहिकता को जीवन-दर्शन के रूप में स्थापित करता है — आर्म्स हो या सर्विसेज, दोनों की तपस्या का मोल बराबर है। लखनऊ की सीनियर काडर ट्रेनिंग का बीस साल बाद का अनुभव यह सिद्ध करता है कि सैन्य प्रशिक्षण उम्र और पद से परे है, और 'Train right, live right' का संदेश हर नागरिक के लिए एक जीवन-पाठशाला बन जाता है।
दिनाँक: 22 जुलाई 2026
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"मिलिटरी ट्रेनिंग: सबके लिए एक पाठशाला"
(संस्मरण — सीनियर काडर, ऑफिसर ट्रेनिंग कॉलेज, लखनऊ)
डॉ लक्ष्मण झा "परिमल"
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सेना की दो भुजाएँ: आर्म्स और सर्विसेज जब युद्ध का बिगुल बजता है, तब सीमा पर सबसे पहले जिनका सीना तनता है, वे हैं 'आर्म्स' — इन्फैंट्री, सिग्नल्स, आर्मर्ड, आर्टिलरी और इंजीनियर्स। ये हैं लड़ाकू फौज। मगर युद्ध केवल बंदूक से नहीं जीता जाता। उसके पीछे एक पूरा संसार होता है — 'सर्विसेज'। आर्मी सर्विस कॉर्प्स जो रसद पहुँचाती है, ईएमई जो टूटे हुए वाहन में फिर से जान फूँक देती है, आर्मी पोस्टल कॉर्प्स जो माँ की चिट्ठी बेटे तक पहुँचाती है, एजुकेशन कॉर्प्स जो बंदूक के साथ कलम भी थमाती है, वेटनरी कॉर्प्स, मेडिकल कॉर्प्स... ये तमाम सहायक कॉर्प्स भारतीय सेना की रीढ़ हैं।लोग कहते हैं कि लड़ाकू फौज की मिलिट्री ट्रेनिंग बारह महीने चलती रहती है। मगर ये भ्रम है कि सर्विसेज के सैनिक उस तपस्या से वंचित रहते हैं। हम लोगों को भी अपने स्तर पर, अपनी विधा में, आग में तपाया जाता है। फर्क बस इतना है कि कोई दुश्मन के सीने पर गोली चलाता है, तो कोई घायल जवान के सीने पर पट्टी बाँधता है। दोनों की ट्रेनिंग का मोल बराबर है।लखनऊ: स्मृतियों का द्वार आर्मी मेडिकल कॉर्प्स के सिपाही की पहली पाठशाला लखनऊ है। छह महीने की बेसिक ट्रेनिंग, फिर ट्रेड ट्रेनिंग, फिर मिलिट्री अस्पताल की प्रायोगिक ट्रेनिंग। हर प्रमोशन के साथ एक नई ट्रेनिंग, एक नई परीक्षा। और जब जूनियर कमिशन ऑफिसर बनने की बारी आती है, तब पूरे भारत से फिर लखनऊ का बुलावा आता है। डग डग पर प्रशिक्षण — सेना की यही रीत है।बीस बरस बीत चुके थे। जम्मू के सतवारी मिलिट्री अस्पताल में कान, नाक, गला विभाग में मैं अपनी ड्यूटी कर रहा था। तभी आदेश आया: "सीनियर काडर, एएमसी सेंटर एंड कॉलेज, लखनऊ। 12 सितंबर से 21 नवंबर 1992 तक।"10 सितंबर को बैग उठाया। लखनऊ की धरती पर पैर रखते ही बीस बरस पुरानी हवा नाक में भर गई। 11 तारीख। भारत के कोने कोने से लोग जुटने लगे — कोई मिलिट्री अस्पताल से, कोई फील्ड एंबुलेंस से, कोई छोटी मेडिकल यूनिट से। बीस बरस के बिछड़े मित्र आँखों के सामने। उम्र बढ़ गई थी, बालों में चाँदी उतर आई थी, मगर हँसी अब भी जवान थी। उस दिन लगा जैसे समय उल्टा घूम गया हो।सुबह तीन बजे से रात नौ बजे तक: एक नया जन्म दूसरे दिन से लखनऊ ने फिर से हमें सैनिक बना दिया।सुबह तीन बजे। अलार्म नहीं, सीटी बजती थी। नींद और आँख के बीच रोज युद्ध होता है। चाय का घूँट, उस्तरे की धार, ब्रश की रगड़, और टॉयलेट के लिए लाइन। यह लाइन अनुशासन का पहला पाठ पढ़ाती थी। फिर अपने सराउंडिंग में झाड़ू लगाओ, बिस्तर की एक एक सलवट सीधी करो, चारपाई को दूसरी चारपाई से सूत बराबर सटाओ। ढाई सौ चारपाई, एक सीधी रेखा में — नई दिल्ली के राजपथ पर परेड जैसा दृश्य।एक लॉकर मिला था। उसमें जिंदगी का सारा सामान, और वो भी फूला हुआ। कभी भी निरीक्षण हो सकता था। फौज सिखाती है कि व्यवस्था बाहरी नहीं, भीतरी अनुशासन है।फिर 'फॉल इन' का हुक्म। ड्रेस का निरीक्षण, रोल कॉल। अँधेरे में ही मार्च करते हुए कोत से राइफल लाना। ग्राउंड में राइफल को ऐसे सजाना जैसे वो जिंदा सिपाही हो। पीटी, डब्ल्यूटी, परेड, हथियार का अभ्यास — सब दौड़-चाल में। ग्राउंड में ही क्लास। मिट्टी के चबूतरों पर बैठते थे। शरीर इतना थका होता कि चबूतरे पर बैठते ही आँख लग जाती। और फिर सजा — कभी एक पैर पर खड़े रहो, कभी एक्स्ट्रा परेड। नींद को भी अनुशासन चाहिए, ये वहीं समझ आया।दिन के बारह बजे। फिर एक टोली मार्च करती हुई कोत में राइफल जमा करने जाती। भोजन करते करते दो बज जाते। मगर साँस कहाँ? 2:30 पर फिर 'फॉल इन'।सेंटर को सुंदर बनाने की जिम्मेदारी हम पर थी। शाम पाँच बजे तक बगीचे, सड़क, बिल्डिंग को सँवारते थे। फिर दो घंटे की मोहलत। उसी में मेस में भोजन करो और रात के रोल कॉल के लिए तैयार हो जाओ।और रात? रात आठ से नौ — 'इंडिविजुअल प्रैक्टिस'। दिन में जो सीखा, उसे रात में अपनी आवाज़ में, अपने हुक्म में, खाली ग्राउंड में गरजना। अपनी परछाईं को सिपाही बनाकर कमांड देना। वह एकांत अभ्यास आत्मा को सैनिक बनाता था।विदाई: आधा शरीर, पूरा सैनिक दो महीने बीत गए। आईने में देखा तो पहचान ही नहीं पाए। वजन आधा हो गया था, मगर सीना दोगुना चौड़ा। हम सब फिर से 'स्मार्ट सैनिक' बन गए थे। बीस बरस के डॉक्टर को लखनऊ ने दो महीने में जवान बना दिया।आखिरी दिन। पासिंग आउट परेड। फिर सब साथी एक साथ पंगत में बैठकर भोजन किया। थाली में दाल-भात सादा, मगर स्वाद में बीस बरस की मित्रता घुली थी।विदा ली। कोई जम्मू लौटा, कोई नागालैंड, कोई सियाचिन। स्टेशन पर हाथ हिलाते हुए समझ आया कि फौज सिर्फ वर्दी नहीं देती, परिवार देती है।ट्रेन लखनऊ से छूटी, मगर लखनऊ का अनुशासन, वो तीन बजे की सीटी, वो मिट्टी के चबूतरे की नींद — ये सब जिंदगी भर साथ चल आए।कहना ये है...मिलिट्री ट्रेनिंग सिर्फ लड़ने के लिए नहीं होती। वो जीने के लिए होती है। समय पर उठना, अपना काम अपने हाथ से करना, साथी के साथ एक लय में चलना, और हर परिस्थिति में अपना कर्तव्य निभाना — ये पाठ सबके लिए है। डॉक्टर हो या इंजीनियर, शिक्षक हो या किसान।सेना में कहावत है: "Train hard, fight easy."मैं कहता हूँ: "Train right, live right."
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डॉ लक्ष्मण झा "परिमल"
दुमका
झारखण्ड, भारत
