STORYMIRROR

Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

4  

Dr Lakshman Jha "Parimal"Author of the Year 2021

Comedy

"मेरे स्थायी अवकाश प्राप्त टिप्पणीकार"

"मेरे स्थायी अवकाश प्राप्त टिप्पणीकार"

3 mins
6

प्रणाम:StoryMirror
प्रस्तुति: दैनिक 
विषय : व्यंग्यात्मक संस्मरण 
विधा :गद्य 
शीर्षक: "मेरे स्थायी अवकाश प्राप्त टिप्पणीकार"
घोषणा : मौलिक स्वरचित 


संदर्भ:यह संस्मरण किसी व्यक्ति पर नहीं, उस जड़ प्रवृत्ति पर चोट है जहाँ लेखक लिखता है यह जताने को कि वह जीवित है और टिप्पणीकार चिपकाता है यह जताने को कि वह भी जीवित है।भाव बदले, विषय बदले, उदासी भी आई, पर टिप्पणी हिमालय-सी अडिग रही - यही 'स्थायी अवकाश प्राप्त' निष्ठा ही इस युग का सबसे बड़ा साहित्य है।
दिनाँक:29 जुलाई 2026 
------------------------


"मेरे स्थायी अवकाश प्राप्त टिप्पणीकार" 
(एक संस्मरण व्यंग्यात्मक )
डॉ लक्ष्मण झा 'परिमल,
==============
संस्मरण लिखना मेरे लिए सदैव कठिन रहा है, क्योंकि स्मृति में जो रहते हैं, वे मित्र कम, चरित्र अधिक बन जाते हैं। ऐसा ही एक चरित्र है मेरे मित्र - मेरे स्थायी अवकाश प्राप्त टिप्पणीकार।

उनसे मेरी मित्रता कब हुई, यह तो अब फेसबुक को भी याद नहीं होगा। पर इतना याद है कि जब मैंने पहली बार कुछ लिखा था, तब सबसे पहली टिप्पणी उन्हीं की आई थी - "बहुत ही सुंदर रचना बेहतरीन सार्थक अभिव्यक्ति"

मैं गदगद हो गया। उस समय मैं नया-नया लिख रहा था। लगा, कोई तो है जो मेरी 'सार्थक अभिव्यक्ति' को समझता है। मैंने धन्यवाद दिया, प्रणाम लिखा।

फिर दूसरी रचना आई, फिर वही टिप्पणी। अक्षरशः वही। मात्रा भी इधर-उधर नहीं।

मैंने सोचा, मित्र का स्नेह है, कॉपी-पेस्ट में समय बचाते हैं। तीसरी, चौथी, दसवीं, पचासवीं रचना पर वही टिप्पणी देखकर मुझे लगा, यह स्नेह नहीं, साधना है।

पिछले पाँच-सात वर्षों में मैंने ऋतुएँ बदलीं, विषय बदले, विधाएँ बदलीं। मैंने श्रृंगार लिखा, वैराग्य लिखा, मैंने अपने गाँव के शिवाला पर लिखा, मैंने अपनी पत्नी की डाँट पर भी कविता लिख दी। पर उनकी टिप्पणी हिमालय की तरह अडिग रही।

एक बार तो मैंने जानबूझकर परीक्षा ली। मैंने लिखा - "आज मन बहुत उदास है, कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा।"

नीचे तत्क्षण टिप्पणी हाजिर - "बहुत ही सुंदर रचना बेहतरीन सार्थक अभिव्यक्ति"

मैंने मन ही मन उन्हें दंडवत किया। उदासी पर भी ऐसी सार्थक अभिव्यक्ति बताने का साहस सिर्फ सिद्ध पुरुष ही कर सकते हैं।

तब मुझे समझ में आया, ये मित्र पाठक नहीं, मेरे लेखन के प्रूफ-रीडर से भी ऊपर हैं। ये मेरे उत्साह के संरक्षक हैं। ये साहित्य के उस विभाग के अध्यक्ष हैं जहाँ फाइल कभी नहीं खुलती, सिर्फ उस पर "अति सुन्दर" की मुहर लगती है।

फेसबुक पर दो तरह के मित्र होते हैं। एक जो सब कुछ पढ़कर भी कुछ नहीं कहते—मौनी बाबा। दूसरे जो कुछ भी पढ़े बिना सब कुछ कह देते हैं—मेरे मित्र जैसे। मौनी बाबा से तो ये लाख गुने बेहतर हैं। कम से कम इनके कारण मेरी पोस्ट पर '0 कमेंट' का सन्नाटा तो नहीं गूँजता।

अब तो मेरा और उनका एक अघोषित अनुबंध हो गया है। मैं लिखता हूँ—यह जताने के लिए कि मैं जीवित हूँ। वे वही एक टिप्पणी चिपकाते हैं - यह जताने के लिए कि वे भी जीवित हैं। दोनों के अस्तित्व का प्रमाण एक ही धागे से बँधा है।

मैंने अब उन्हें दिल से 'स्थायी अवकाश प्राप्त टिप्पणीकार' मान लिया है। स्थायी इसलिए कि वे कभी रिटायर नहीं होंगे, अवकाश प्राप्त इसलिए कि उन्होंने पढ़ने के श्रम से स्वयं को मुक्त कर लिया है।

और सच कहूँ तो, अब यदि किसी दिन उनकी वह टिप्पणी न आए, तो मुझे चिंता होने लगती है—मित्र कुशल तो है? मोबाइल ठीक तो है? कहीं अँगूठा दुख तो नहीं गया?

क्योंकि इस आभासी दुनिया में, जहाँ लोग पल-पल में बदल जाते हैं, एक व्यक्ति का वर्षों तक एक ही बात पर टिके रहना - यह निष्ठा नहीं तो क्या है?

वो निष्ठा ही तो साहित्य है, बाकी सब तो सार्थक अभिव्यक्ति है।
=============
डॉ लक्ष्मण झा परिमल
दुमका ,झारखंड  


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Comedy