“हाथीगढ़ - जहाँ मैंने नेतृत्व पहनना सीखा” (21 माउंटेन डिवीजन की डायरी से)
“हाथीगढ़ - जहाँ मैंने नेतृत्व पहनना सीखा” (21 माउंटेन डिवीजन की डायरी से)
जयहिंद:StorryMirrorप्रस्तुति: दैनिकविषय :संस्मरणविधा: गद्यघोषणा: मौलिक
विश्लेषण: यह संस्मरण एक सैन्य चिकित्सक के पहले स्वतंत्र प्रभार की कथा है, जहाँ प्रशासन और चिकित्सा एक ही कर्तव्य में घुल जाते हैं। हाथीगढ़ केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि वह पाठशाला है जहाँ आपने सीखा कि नेतृत्व हुक्म नहीं, भरोसा और सबसे आगे खड़े रहने का दूसरा नाम है।
दिनाँक 2 अगस्त 2026
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“हाथीगढ़ - जहाँ मैंने नेतृत्व पहनना सीखा”(21 माउंटेन डिवीजन की डायरी से)डॉ. लक्ष्मण झा परिमल===================सेना में मेरे दस पड़ाव रहे। दस सैन्य अस्पताल, दस नए स्टेशन, दस नई छावनियाँ। पर स्मृतियों के मानचित्र पर एक नाम आज भी हरे रंग से चमकता है - हाथीगढ़।बात 1984 की है। मेरी पहली नियुक्ति - 321 फील्ड एम्बुलेंस। 21 माउंटेन डिवीजन की यह फील्ड एम्बुलेंस किसी अस्पताल जैसी नहीं लगती थी। असम की छोटी-छोटी पहाड़ियों की गोद में, गुवाहाटी और रंगिया के बीच बसा गाँव चाँगसारी, और राजमार्ग के किनारे टेंटों और बैरकों की एक अनुशासित बस्ती। सुबह-सुबह जब ब्रह्मपुत्र की ओर से कुहासा उठता, तो लगता जैसे पहाड़ियाँ चादर ओढ़े सो रही हों। मैं वहाँ 1987 तक रहा, फिर बरेली, जम्मू, कलकत्ता, जालंधर होता हुआ 2002 में सेवानिवृत्त हुआ। पर जो संस्कार चाँगसारी ने दिया, वह आज तक मेरे भीतर वर्दी की तरह कसा हुआ है।उसी चाँगसारी में एक दिन, हमारे 2IC लेफ्टिनेंट कर्नल एस. के. भंड साहब ने अपने कार्यालय में बुलाया। लकड़ी की मेज, पीछे डिवीजन का लाल गेंडे वाला निशान - रेड हॉर्न, और उनकी छोटी-छोटी, कटी-छँटी आवाज -"झा! ऑन शॉर्ट नोटिस, तुम्हें हाथीगढ़ जाकर ADS - एडवांस्ड ड्रेसिंग स्टेशन का चार्ज लेना है। वहाँ का ऑफिसर दो महीने की छुट्टी पर जा रहा है। डू यू हैव एनी प्रॉब्लम?""नॉट एट ऑल, सर!" - फौज में यही उत्तर सबसे पहले सिखाया जाता है।"फर्दर इंस्ट्रक्शन सूबेदार मेजर एस. के. सिंह से ले लो। यू मे गो नाउ।"मैंने सैल्यूट किया, दायें घूमा और बाहर निकल आया।सूबेदार मेजर साहब पुराने सिपाही थे। उन्होंने मानचित्र पर निशान लगाते हुए कहा, "डॉक्टर साहब, हाथीगढ़ में हमारी एक माउंटेन ब्रिगेड है। पीस हो या वॉर, मेडिकल सपोर्ट हमारी जिम्मेदारी। जगह चाय बागान है, और सच कहें तो हाथियों का राजमहल। गुवाहाटी से तेजपुर रोड पर तांगला स्टेशन उतरना, वहाँ से 31 किलोमीटर अंदर। थ्री-टन से जा सकते हैं, नहीं तो हमारी एम्बुलेंस जो पेशेंट लाने जाती है, उससे।"हाथीगढ़ - नाम में ही एक आह्वान था।मैंने कंपनी ऑफिस से मूवमेंट ऑर्डर, नो-ड्यूज, रेलवे फ्री वारंट और LRC - लास्ट राशन सर्टिफिकेट लिया। जवानों और उनके परिवारों के लिए 21 डिवीजन की रेड हॉर्न बस रंगिया स्टेशन तक जाती थी। चाँगसारी भले फील्ड लोकेशन था, पर हमारी सिस्टर यूनिट 421 फील्ड एम्बुलेंस के पास कुछ अस्थायी विवाहित आवासों में जीवन धड़कता था।रंगिया जंक्शन उस दिन एक मेले जैसा था। पश्चिम की ओर जाने वाली गाड़ियों में बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश की छुट्टियों की हँसी थी - घर की गंध, बच्चों की चिट्ठियाँ। पूरब की ओर जाने वाली गाड़ियों में मिसामारी ट्रांजिट कैंप, तेजपुर, अरुणाचल की ओर लौटते सैनिकों का मौन संकल्प। मुझे पूरब जाना था।रंगिया से तांगला केवल 39 किलोमीटर। मिलिट्री कंपार्टमेंट में बैठकर मैं तांगला उतरा। किस्मत से उसी दिन हाथीगढ़ की एम्बुलेंस मिल गई। कच्ची-पक्की सड़क, दोनों ओर अंतहीन चाय के बागान, बीच-बीच में साइकिल पर बागान के मजदूर, और हवा में गीली पत्तियों की महक।और फिर आया हाथीगढ़।दस जवानों का एक छोटा सा ADS। टिन की छत, चारों ओर हरियाली, और प्रभारी कैप्टन (डॉ.) मुरारी। मैं उनसे वरिष्ठ था, इसलिए मैंने चार्ज लिया। चार्ज लेते ही उन्होंने धीरे से कहा, "सर, एक और ड्यूटी है - बगल के घाघरा गाँव के सिविलियंस। पूरे चाय अंचल में सरकारी डिस्पेंसरी नहीं है। वे हमें ही अपना डॉक्टर मानते हैं।"बस, यहीं से मेरी असली नौकरी शुरू हुई।दस जवान, उनकी परेड, उनकी ड्यूटी, उनका राशन-पानी, उनका मनोबल, और उस पार घाघरा गाँव के बुखार से तपते बच्चे, प्रसव पीड़ा से कराहती महिलाएँ और बागान में कटे-फटे हाथ-पैर वाले मजदूर। सुबह-सुबह जब हाथियों का एक झुंड बागान के किनारे से निकलता, तो पूरा ADS अलर्ट हो जाता। शाम को जब घाघरा गाँव से कोई लालटेन लेकर दौड़ता आता - "डॉक्टर बाबू, चलिए न..." - तो लगता कि वर्दी का अर्थ केवल रैंक नहीं, एक भरोसा भी है।मैं हाथीगढ़ में केवल दो महीने रहा। फौजी कैलेंडर में दो महीने कुछ भी नहीं होते। पर जीवन के कैलेंडर में वही दो महीने मील के पत्थर बन गए।वहीं मैंने जाना - किताबों में पढ़ा हुआ 'एडमिनिस्ट्रेशन' और 'प्रोफेशन' दो अलग अध्याय नहीं हैं। जब रात दो बजे कोई जवान बुखार में तप रहा हो, तो वही तुम्हारी प्रोफेशनल परीक्षा भी है और एडमिनिस्ट्रेटिव भी।हाथीगढ़ ने मुझे सिखाया कि नेतृत्व का अर्थ हुक्म देना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है - सबसे अंत में खाना, सबसे पहले जागना, और सबसे आगे खड़े रहना, ताकि तुम्हारे पीछे खड़े दस लोग निडर रह सकें।आज जब मैं दुमका में अपने क्लिनिक में बैठता हूँ, तो कभी-कभी चाय की महक के साथ हाथीगढ़ की वह गीली हवा लौट आती है। और लगता है, मेरी डॉक्टरी की पहली शपथ मैंने मेडिकल कॉलेज में नहीं, हाथीगढ़ के उस टिन-शेड वाले ADS में ली थी।=================डॉ. लक्ष्मण झा परिमलदुमका ,झारखंड
