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सपने

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हाथों में पेंसिल पकड़कर लगातार मैडम का कहा लिखने की कोशिश कर रहा था | कॉपी में लिखे शब्द न जाने कब कीड़ों की तरह बनते गए और मुझे नींद आ गई । टीचर की चॉक शन आकर मेरे माथे पर लगी और मेरी आँँखे खुल गई। आँखे खुली तो मेने पाया की मैडम मेरे टेबल पास कड़ी थी और शांतिपूर्वक तरीके से उन्होंने बाहर जाने का इशारा किया।

मैं चुप चाप जा कर दरवाजे के बाहर जाकर खड़ा हो गया। यह जगह मेरे लिए नई नहीं थी मैं आए दिन कभी होमवर्क न करने के लिए तो कभी किसी और शरारत के कारण मुझे यहाँ खड़ा कराया जाता था। यहाँ खड़े होकर ,पेड़ों को निखारते हुए अपने सपनो की दुनिया में खोने का मज़ा हे कुझ और था। उस दिन मैं खाने की कल्पना कर रहा था। मैने सोचा की यदि आज माता जी ने टमाटर की चटनी बनायीं हो तो मज़ा ही आ जाये। यह सोहते हे मेरे मुँह में टमाटर की चटनी का स्वाद आ गया और मेरी भूख और भी बढ़ गई। मैं अपनी कल्पनाओं में डूबा हुआ हे था कि आखरी घंटी बजी और कॉरिडोर उछलते कूदते बच्चो से भर गया।

मैं घर अपनी जुड़वा बहन प्रिया और उसकी दिखावटी सहेलियों के साथ जाता था। तीनों मेरी क्लास में थी पर मैं उनको बेहद बेवकूफ मानता था। दूसरों के लिए वो पक्की सहेलियाँ थी पर असल में तीनो की ज़िन्दगी का एकमात्र लक्ष्य अपने आप को बेहतर, ज़्यादा अच्छा दिखाना था।

उस दिन रेखा दिल्ली आई अपनी चचेरी बहन के बारे में बता रही थी। उसने कहा "सचाल के बाद वो डांस क्लास क्लास जाती है और उसके बाद टूशन। " मैने हैरानी में पुछा ,"तो वो आराम कब करती है। " उसने मुँह बनाते हुए जवाब दिया शहर के लोगों के जीवन में आराम की कोई जगह नहीं होती। " इसके बाद वो बोलती गई प्रिया और जाया उसकी बातों में डूबती गयी और में ऊबता। उसने बताया की अगली छुट्टियों में वो भी दिल्ली जायेगी। मैं जानता था यह सुन कर प्रिया जल के रख हो गयी होगी।

घर पहुँचते ही मैं रसोई में घुस गया। माता जी ने आज करेले की सब्ज़ी बनायी थी। मेरा टमाटर की चटनी का सपना टूट गया पर इस से भी दुःख की बात भी यह आज पिता जी घर पर थे। पिता जी सख्त स्वभाव के थे। उनके लिए उनका अनुशासन ही सब कुछ था। इसलिए हम दोनों ने चुप चाप करेला खा लिया।खाने के बाद पिता जी ने फरमान सुना दिया जिस के मुताबिक हम दोनों को गायों को चराने के लिए ले जाना था। तो हम चल दिए।

प्रिया इस हालत में अपने दोस्तों से नहीं मिलना चाहती थी क्युकी उसके मुताबिक उसकी साडी इज़्ज़त मिटटी में मिल जाती। तो एक तरफ प्रिया झाड़ियों में चिपकर बैठी थी और दूसरी ओर मैं। बीच में काली ,सुंदरू और बिंदु अपने खाने का मज़ा ले रहे थे। उन्हें देखते हुए मैं सोचने लगा की गायों के भी मज़े है। जो खान है जितना खाना है सब उनकी मर्ज़ी। ना पिता जी का कोई डर ना होमवर्क ख़तम करने की कोई चिंता। बस खाना न सोना। वाह ! काश मैं भी गाय होता।

अभी मैं अपने दुखों में डूबा हुआ ही था कि मैने ध्यान दिया कि काली गाय तो वहाँ थी ही नहीं। तुरन्त बिना समय गवाए में इधर उधर भागता उसे ढूंढ़ने लगा। मैं जंगल के एक कोने पर खड़ा था की मेरा ध्यान एक आवाज़ ने खींचा। जैसे ही मैं पीछे मुड़ा मैंने पाया कि एक खतरनाक ,भयानक ,कला कुत्ता मेरी ओर दौड़ रहा है। मैं बुरी तरह घबरा गया। डर के कारण मेरी साँस ,मेरा दिमाग यहाँ तक की मेरे पाऊँ भी थम गए। मैने तो अपनी मौत क़ुबूल हे कर ली थी कि एक आवाज आयी ,"नो लियो स्टॉप आई साइड "और वो खतरनाक कुत्ता एक दम रुक गया। मैं हक्का बक्का रह गया। मैने देखा की वो आवाज़ तो एक छोटी सी लड़की की थी ,छोटी से मेरा मतलब हमारे जयंती हे लड़की की। उसके पीछे फैक्ट्री वालों का माली आया जिसने झट से कुटी के गले में पटटा बाँध दिया। उस लड़की ने बहुत शर्मिंदगी के साथ मुझसे माफ़ी मांगी। मैं हिचकिचाते हुए और शरमाते हुए हँसा। तब तक प्रिया ने कली को धुंद लिया और हम घर चले गए।

अगले दिन स्कूल में बच्चों से पता चल की फैक्ट्री वालों की बेटी शहर से आयी है। मैं समाझ गया कियह कल वाली लड़की ही है। और पता चला की उसका नाम तारिणी ,वो शहर में बहुत बड़े स्कूल में पड़ती थी,उसके पास अपनी गाड़ी भी थी जिस के लिए एक ड्राइवर था।

गर्मी वाला दिन जैसे तैसे ख़तम हुआ। घर पहुंच के खाना खाया ही था की पिता जी ने फिर गायों को चराने का आदेश सुना दिया। उस दिन मैं घासनी में बिलकुल नहीं सोया। यह मेरा गायों के लिए प्यार नहीं पर शायद तारिणी का इंतज़ार था। पर इंतज़ार बेकार रहा और गायों को लेकर हम जाने लगे। फैक्ट्री के सामने से जाते हुए आवाज़ आयी,"कम लियो लियो कम".यह तारिणी की आवाज़ थी। गेट के अंदर वो माली के साथ कुत्ते को घुमा रही थी। हमें देखते ही वो गेट पर आ कर बोली "हेलो दोस्तों कैसे हो.".यह सुन कर में ख़ुशी का ठिकाना न रहा। इतने बड़े घर की लड़किन जिस के पास अपनी गाड़ी भी है वोह हमें अपना दोस्त मानती है। कुछ देर बातें करने के बाद अँधेरा होने के कारन मेने और प्रिय ने जाने का फैसला किया पर हम तीनो ने फिर मिलने का वादा भी किया। अभी तक मैं दुनिया की साडी लड़कियों को प्रिया एयर उसकी सहेलियों के तरह बेवकूफ हे मानता था। पर तारिणी ने मेरी सोच बदल कर रख दी। मुझे यकीन हो गया की दुनिया में समघदार सुन्दर लड़कियां भी है। तारिणी भी उन में से एक थी लिस के सुनहरे बाल और सेब जैसे लाल गाल थे।

अगले दिन प्रिया ने अपनी नयी दोस्त के बारे में जाया और रेखा को बताया। दोनों के चेहरे पर जलन साफ थी। और यह देख कर मुघे और प्रिय को बहुत ख़ुशी हुई क्युकी हम जानते थे कि तारिणी से दोस्ती कोई आम बात नहीं। उस दिन हम गायों को चराने के लिए बहुत उत्सुक थे और पिता जी के कहते ही भाग गए। मेने प्रिया की एक नयी आदत देखी वो गायों को उनके नाम से नहीं बल्कि ऐसे बुला रही थी "कम लियो कम" यह उसकी नयी दोस्त का ही प्रभाव था। हमें तारिणी नही मिली। गेट पर इंतज़ार करने का भी कोई फायदा न हुआ।

अगले दिन मेने तारिणी से मिलने का दृढ़ संकल्प ले लिया। स्कूल से आते ही मैं गायों को लेकर निकल गया। प्रिया ने आने से इंकार कर दिया क्युकी आज पिता जी का दर न था वो घर ुर नहीं थे। इन सब के बावजूत मैं अकेला निकल गया। वापस आते समय गेट पर खड़ा हो इन्तिज़ार करने लगा। अपनी बेचैनी के कारन मेने अंदर जाने का फैसला किया। गेट से अंदर घुसते ही मैं डर और झिझक मैं इधर से उदार घूमने लगा। गलती से मुझ से एक गमला गिर गया। एकदम माली आया। गुसी से लाल बबूला हो मुँह पर चिल्लाने लगा फिर भी अपनी पूरी होम्मात इकठी कर मेने उनसे तारिणी के बारे में पुछा। उसने गुस्से से जवाब दिया "बेबी जी चली गयी है अब तु भी यहाँ से निकल "जवाब सुनकर मेरे दिल के हज़ारो टुकड़े हो गए। . अगले दिन भी मन में दुःख हे छाया था। स्कूल से घर पोहोच कर मेने देखा के माता जी टमाटर की चटनी बनायीं थी। मेरी ख़ुशी की कोई सीमा न रही और स्वाद स्वाद में मैं पाँच फुल्के खा गया। अभी तक में तारिणी वाली बात भूल भी गया था। पिता जी घर पर नहीं थे मतलब अब मेरी आराम वाली ज़िन्दगी वापस आ गयी थी। बचपन से हे हम कितने सपने देखते है। कभी कुछ बनने का सपना , कभी कुछ खाने का सपना ,कभी कही जाने का सपना तोह कभी किसी से मिलने का सपना। इन में से बहुत काम सपनों को हे हम वर्त्तमान में जी पते है। किसी विद्वान ने कहा है यदि किसी इंसान के सारे सपने सच हो जाये तो आधी दुनिया बरबाद हो जाएगी। जीवन यही है सपनो की दुनिया जिस में से कुछ सपने पूरे होते है कुछ नहीं। जीवन जीने के लिए सपनो का होना भी ज़रूरी है। यदि कुछ सपने सच न भी हुए तो दुखी होना बेकार है क्योंकि इस जीत - हार का नाम ही तो ज़िन्दगी है...!


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