संतरे का बाग
संतरे का बाग
एक बार रामपुर नामक गांव में मोहन नामक किसान अपने परिवार के साथ रहता था। वह बहुत मेहनती था। उसका पुत्र बहुत आलसी और कामचोर था। वह अपने पिता के साथ काम में हाथ नहीं बटांता था। उसके पिता उसे रोज़ समझाते, कि जल्दी उठकर मेरे साथ काम किया करो, परन्तु उसके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
कुछ समय बाद उसके पिता जी की मृत्यु एक हादसे में हो गई। फिर भी उसका पुत्र आलसी ही रहा। एक दिन उसकी मां ने अपने पुत्र से कहा," तुम मेरा खेती में हाथ क्यों नही बंटाते हो?" वह बोला मुझे काम करना अच्छा नहीं लगता है। उसकी मां बहुत चिंतित थी तथा उन्होंने अपने ससुर जी को इस विषय में पत्र लिखा और उनसे मदद मांगी।
पत्र का उत्तर आने के बाद मां ने अपने पुत्र से कहा कि, तुम कुछ समय अपने दादा जी के साथ रहने के लिए जाओ। यह सुनकर लड़का बहुत उत्साहित होता है, तथा अगले ही दिन अपने दादा जी पास पहुंच जाता है। अगले दिन दादा जी उसे अपने संतरे के बाग़ में सैर के लिए ले जाते है तथा संतरे खाने के लिए देते हैं। संतरा खाने बाद दादा जी उसे खाली जगह पर बीजों को मिट्टी में डालने के लिए कहते हैं।
अब वह रोज यही काम करने लगा। कुछ दिनों बाद उसने देखा कि उन बीजों में से छोटे-छोटे पौधों निकल रहें हैं। वह उन्हें देखकर बहुत उत्साहित और खुश हुआ। अब वह उनकी देखभाल करने लगा, पानी देना, खाद डालना आदि। उसे अब समझ आने लगा कि उसकी मां कितना काम करती है और बहुत पछतावा हुआ। उसने अपने दादा जी को धन्यवाद दिया और वापस जाने की अनुमति मांगी।
उस दिन के बाद से ही उसने अपनी मां के साथ काम करना शुरू कर दिया ।
