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Triveni Mishra

Inspirational


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Triveni Mishra

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सहानुभूति

सहानुभूति

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तन्वी का जीवन संघर्ष की कहानी है। वह बचपन से ही कठिनाइयों को झेलते हुए आगे बढ़ी और दूसरों को भी आगे बढ़ाने में कभी पीछे नहीं हटी। वह शिक्षिका है। तन्वी-- सभी बच्चे फीस लेकर आए हैं, बच्चे-- जी मेम ।

तन्वी--कक्षा में चारों ओर नजर घूमा कर देखी रोज की तरह एक मिनिट में सभी बच्चों को देखना उसकी आदत में था। अगर जरा भी कोई उदास दिखता तो तुरन्त पूछती, आपका चेहरा उतरा हुआ क्यों है? क्या हो गया ? इतने शांत क्यों है? बच्चों को देखते ही वह समझ जाती की उसे कुछ समस्या है। बच्चे भी मैडम से अपनी मां की तरह बात करते भय, डर बिलकुल न रखते ।  

तन्वी-- दो बच्चे चुप बैठे है, फीस जमा करने को जब बोला गया है मुंह लटका कर देखते रहते हैं इस बात को तन्वी समझ रही ।

तन्वी-- फीस लेते हुए सभी ने दे दिया?

बच्चे --जी मैडम ।

तन्वी-- कौन नहीं दिया?

बच्चे-- दो खड़े होकर मेम हम लोगों ने।

तन्वी--क्यों भाई, आप लोगों ने क्यों नहीं दिया?

बच्चे-- एक के बाद एक दोनों ने बताया मेम मम्मी बहुत बीमार हैं पैसे नहीं हैं। इलाज चल रहा है।

पापा बोल रहे थे कि इस वर्ष तुम मत पढ़ो, पैसे रहेंगे तब पढ़ना। दूसरा बच्चा मेम मेरे पापा नहीं हैं मम्मी मजदूरी करती हैं अभी उनको पैसा नहीं मिल पाया है। 

तन्वी--दोनों यहाँ आएँ

बच्चे-- जी मेम पास में आकर खड़े हो जाते हैं। 

तन्वी --पेन बढ़ाते हुए यहाँ हस्ताक्षर करें।

बच्चे -- हस्ताक्षर कर बैठ जाते है।

तन्वी-- बेटा हमने आप दोनों की फीस जमा कर दी है। 

तन्वी --कक्षा के बाहर आती है ये पहली बार नहीं हुआ। वह हमेशा ही दूसरों की मदद करती है वह अपने पड़ोसियों की भी सहायता करती है। तन्वी को जानने वाले सोचते है कि उसके पास बहुत पैसा है जो दूसरों को बाँटती रहती है। उसने कभी अपनी सफाई नहीं दी। पर एक दिन किसी ने कहा कि मैडम आप पैसे वाले है। जो भी समस्या बताया निकाल दे देती हैं।

तन्वी-- देखिए ऐसा नहीं है हम अपने खर्च से बचाकर मदद करते हैं। कटौती करते हैं क्योंकि हमने बचपन में अभाव में देखा है तो सामने वाले की समस्या को सुन सहानुभूति होती है और जब भी कोई हमसे समस्या बताता है तो हम अपने बीते समय में पहुँचते हैं और उसकी जगह खुद को पाते हैं

उसकी तकलीफ हमें होने लगती है। इस कारण सभी की मदद करने को तैयार हो जाते हैं हमारे पास कोई धन दौलत नहीं है सहानुभूति है जिसके अन्दर सहानुभूति नहीं मतलब वह उन कठिनाइयों से नहीं गुजरा है। इसलिए कहते हैं--

"जाके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई।"


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