रंगों का काला सच
रंगों का काला सच
पिछले एक हफ्ते से माँ से लड़ाई चल रही है, सब होली पर कितनी मस्ती करते है, मुझे भी करनी हैं पर वो हमेशा पैसे कि तंगी कि बात कर मना कर देती है, कभी बोलती रंग आँखों में चला गया तो, तुझे चोट लगी तो बहुत हुआ इस बार मैं होली खेलूंगा सोच लिया। तभी बगल के कमरे से माँ की आवाज़ सुनाई दी, क्या करूँ दीदी कैसे समझाऊँ कि इसी होली के रंग ने हमारे जीवन के सब रंग छीने। जब रंगों का फायदा उठा उसके पिता का कत्ल कर दिया..और हम इस हाल में आ गए गुस्से ने आंसूओं कि जगह ले ली थी अब।
