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Vijay Erry

Inspirational Others

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Vijay Erry

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पुस्तकों का मूल्य

पुस्तकों का मूल्य

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पुस्तकों का मूल्य 

लेखक: विजय शर्मा एरी

गाँव के किनारे, जहाँ पुरानी नीम की छाँव में धूल भरी सड़क मुड़ती थी, एक छोटा-सा मकान खड़ा था। दीवारें ईंट की थीं, छप्पर फूस का, और दरवाज़ा लकड़ी का पुराना। लोग उसे “किताबों का घर” कहते थे। अंदर कोई शानदार फर्नीचर नहीं था, न कोई टीवी, न फ्रिज। सिर्फ दीवार से दीवार तक लकड़ी की अलमारियाँ थीं, और उनमें हजारों किताबें।

मालिक थे रामस्वरूप दादा। उम्र पैंसठ के पार, बाल सफेद, आँखें तेज़। उन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा था, लेकिन किताबों से उनका रिश्ता ऐसा था जैसे कोई पुराना दोस्त हो।

रामस्वरूप की कहानी गाँव के हर बच्चे को पता थी। तीस साल पहले वे शहर में मजदूरी करते थे। एक दिन एक अमीर आदमी की लाइब्रेरी साफ कर रहे थे। किताबें देखकर उनका दिल बैठ गया। एक किताब उठाई—“गोदान”। पढ़ने की कोशिश की, अक्षर समझ नहीं आए। रात को चोर बाज़ार से एक वर्णमाला की किताब चुराई। रोज़ रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ते रहे। छह महीने में पढ़ना सीख लिया। फिर किताबें इकट्ठा करने का सिलसिला शुरू हो गया।

वे गाँव लौटे। पैतृक ज़मीन बेचकर एक छोटा मकान बनाया और सारी बचत किताबों पर खर्च कर दी। गाँव वाले हँसते थे—“पागल हो गया है रामस्वरूप। ज़मीन बेचकर कागज़ खरीद रहा है!”

लेकिन रामस्वरूप मुस्कुराते रहते। वे कहते—“ज़मीन तो मरने के बाद किसी और की हो जाएगी। किताबें आत्मा के साथ चलती हैं।”

गाँव में स्कूल था, लेकिन लाइब्रेरी नहीं। बच्चे पढ़ाई से ऊब जाते। एक दिन बारह साल का लड़का अमन स्कूल से लौटते हुए किताबों के घर के पास रुका। दरवाज़ा खुला था। अंदर रामस्वरूप दादा बैठे किताब पढ़ रहे थे।

“दादा, ये सब किताबें किसकी हैं?” अमन ने पूछा।

“सबकी। जो पढ़ना चाहे, उसकी।”

अमन ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा। अलमारियों में रंग-बिरंगी किताबें थीं—कहानियाँ, विज्ञान, इतिहास, कविताएँ। उसने एक पतली सी किताब उठाई—“पंचतंत्र की कहानियाँ”।

रामस्वरूप ने मुस्कुराते हुए कहा—“ले जा। पढ़कर लौटा देना।”

अमन ने किताब घर ले जाकर रात भर पढ़ी। अगले दिन लौटाने आया तो दूसरी किताब माँग ली। फिर तीसरी। धीरे-धीरे गाँव के दूसरे बच्चे भी आने लगे।

रामस्वरूप ने कोई नियम नहीं बनाया। सिर्फ एक शर्त थी—“किताब साफ रखना, और पढ़कर लौटाना।”

कुछ महीने में किताबों का घर गाँव का सबसे व्यस्त स्थान बन गया। शाम को बच्चे इकट्ठा होते। कोई कहानी पढ़ता, कोई कविता सुनाता। रामस्वरूप बीच-बीच में समझाते—“किताब सिर्फ अक्षर नहीं सिखाती। वह सोच सिखाती है।”

एक दिन गाँव में नया सरपंच आया—मोहनलाल। वह आधुनिक विचारों का था। उसने कहा—“ये पुरानी किताबें किस काम की? इंटरनेट का ज़माना है। बच्चों को मोबाइल दो।”

उसने किताबों के घर को बंद करने का प्रस्ताव रखा। “ये जगह स्कूल के सामने है। यहाँ बच्चों का समय बर्बाद हो रहा है।”

गाँव वाले दो खेमों में बँट गए। कुछ बोले—“दादा सही कह रहे हैं। किताबें ज़रूरी हैं।” कुछ बोले—“सरपंच सही हैं। अब नया ज़माना है।”

एक शाम सरपंच खुद किताबों के घर पहुँचा। “रामस्वरूप, ये घर खाली करो। यहाँ पंचायत का दफ़्तर बनेगा।”

रामस्वरूप शांत रहे। “सरपंच जी, ये घर मेरा नहीं। ये गाँव के बच्चों का है। अगर बंद करना है तो खुद आकर किताबें उठा लो।”

सरपंच गुस्से में चला गया। अगले दिन पंचायत में प्रस्ताव पास हो गया। किताबों का घर तीन दिन में खाली करना होगा।

अमन और उसके दोस्त रो पड़े। उन्होंने रात भर किताबें छिपाईं—अपने-अपने घरों में। रामस्वरूप ने कहा—“चिंता मत करो। किताबें कभी मरती नहीं।”

तीसरे दिन जब पंचायत वाले आए, घर लगभग खाली था। सिर्फ कुछ पुरानी किताबें बची थीं। रामस्वरूप दरवाज़े पर खड़े थे।

“लो, घर तुम्हारा। लेकिन याद रखना—किताबें दिमाग से निकाली जा सकती हैं, दिल से नहीं।”

घर खाली कर दिया गया। पंचायत का बोर्ड लग गया। बच्चे उदास हो गए। स्कूल में भी कोई किताब नहीं पढ़ता था। मोबाइल पर गेम खेलते, वीडियो देखते।

एक महीने बाद अमन बीमार पड़ गया। बुखार चढ़ा। डॉक्टर ने कहा—“दिमाग पर ज़्यादा जोर पड़ा है। आराम करो।” लेकिन असली बात यह थी कि अमन किताबों की कमी से परेशान था।

रात को उसने सपना देखा। रामस्वरूप दादा किताब हाथ में लिए खड़े थे। “अमन, किताबें घर में नहीं होतीं। वे दिल में होती हैं। तुम फिर से शुरू करो।”

अमन जागा। अगली सुबह उसने अपने दोस्तों को बुलाया। “हम फिर से किताबों का घर बनाएंगे।”

उन्होंने स्कूल के पीछे एक पुराना कमरा साफ किया। जो किताबें छिपाई थीं, वे लाए। गाँव की कुछ माताओं ने पुरानी पत्रिकाएँ दीं। एक दुकानदार ने कुछ नई किताबें दान कीं।

रामस्वरूप को खबर पहुँची। वे आए। आँखों में आँसू थे। “अब ये घर तुम्हारा है। मैं सिर्फ रखवाला था।”

नया किताबों का घर और भी अच्छा बना। बच्चे खुद व्यवस्था देखते। हर शनिवार कहानी सुनाने का कार्यक्रम होता। रामस्वरूप आते और पुरानी यादें सुनाते।

एक दिन सरपंच का बेटा भी आने लगा। पहले छिपकर, फिर खुलेआम। उसने पिता से कहा—“पापा, किताबें पढ़ने से दिमाग तेज़ होता है। गेम से नहीं।”

सरपंच पहले नाराज़ हुए, फिर खुद एक दिन पहुँचे। उन्होंने देखा—बच्चे शांत बैठे किताबें पढ़ रहे हैं। कोई झगड़ा नहीं, कोई शोर नहीं।

उन्होंने रामस्वरूप से माफी माँगी। “मैंने गलती की। किताबों का घर फिर से बनना चाहिए।”

पंचायत ने पुराना घर वापस दे दिया। अब वह और बड़ा हो गया। दीवारों पर नई अलमारियाँ बनीं। शहर से किताबें मँगवाई गईं।

पाँच साल बीत गए। अमन कॉलेज जाने लगा। वह गाँव का पहला लड़का था जो इंजीनियरिंग पढ़ने शहर गया। जाते समय उसने रामस्वरूप के पैर छुए। “दादा, आपने मुझे किताबें दीं। अब मैं दुनिया देखूँगा।”

रामस्वरूप मुस्कुराए। “बेटा, दुनिया किताबों में छिपी है। तुम सिर्फ उसे खोलोगे।”

अमन शहर में सफल हुआ। नौकरी लगी। पहली सैलरी से उसने गाँव के किताबों के घर के लिए सौ नई किताबें भेजीं। साथ में एक पत्र—“दादा, ये किताबें मेरे जैसे और बच्चों के लिए।”

रामस्वरूप अब और बूढ़े हो गए थे। चलने-फिरने में तकलीफ होती। लेकिन हर शाम किताबों के घर आते। बच्चों को कहानियाँ सुनाते।

एक दिन वे नहीं आए। गाँव वाले दौड़े। घर में वे बिस्तर पर लेटे थे। हाथ में एक किताब थी—“गोदान”। आँखें बंद थीं, चेहरे पर शांति।

अंतिम संस्कार के बाद बच्चे रोए। लेकिन किताबों का घर नहीं रुका। अमन छुट्टी लेकर आया। उसने कहा—“दादा चले गए, लेकिन उनकी किताबें रह गईं। हम उनका सपना आगे बढ़ाएँगे।”

आज भी गाँव में किताबों का घर चल रहा है। दीवार पर रामस्वरूप की तस्वीर लगी है। नीचे लिखा है—“जिस घर में किताबें मुस्कुराती हैं, वहाँ अज्ञान हार जाता है।”

अमन अब शहर में इंजीनियर है, लेकिन हर साल गाँव आता है। नई किताबें लाता है। बच्चों को बताता है—“एक बार एक बूढ़े व्यक्ति ने सिर्फ किताबों से गाँव बदल दिया था।”

गाँव के लोग अब समझते हैं। मोबाइल हैं, इंटरनेट है, लेकिन किताबों का घर अभी भी सबसे ज्यादा बच्चों से भरा रहता है।

कभी-कभी शाम को जब सूरज ढलता है, नीम की छाँव में हवा चलती है। लगता है जैसे रामस्वरूप दादा अभी भी वहीं बैठे हों, कोई किताब खोलकर पढ़ रहे हों।

और बच्चे फुसफुसाते हैं—“दादा, हम पढ़ रहे हैं। आप देख रहे हैं ना?”

किताबों का घर सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं था। वह दिलों का घर था। जहाँ ज्ञान की रोशनी कभी बुझती नहीं।

(शब्द संख्या: लगभग 2000)

— विजय शर्मा एरी


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