तालाब का शव
तालाब का शव
तालाब का शव
लेखक: विजय शर्मा एरी
गाँव का नाम था रामनगर। छोटे-छोटे कच्चे मकान, हरे-भरे खेत और बीच में एक पुराना तालाब। तालाब गाँव की जान था। सुबह-शाम औरतें वहाँ पानी भरने आतीं, बच्चे नहाते, बुजुर्ग बैठकर बातें करते। पर पिछले कुछ महीनों से तालाब के आसपास एक अजीब-सी खामोशी छाई हुई थी। लोग कहते थे कि रात को वहाँ से अजीब आवाजें आती हैं। कोई हँसी, कोई रोना, कोई आह।
रविवार की सुबह थी। सूरज अभी निकल रहा था। गाँव का चौकीदार रामू तालाब की तरफ अपनी रोज की गश्त पर निकला। उसने दूर से पानी में कुछ सफेद-सा देखा। पास जाकर देखा तो उसके हाथ-पाँव काँप गए। पानी में एक लाश तैर रही थी। चेहरा नीचे की तरफ था, कपड़े फटे हुए, बाल बिखरे। रामू चिल्लाया, “लाश… तालाब में लाश!”
थोड़ी देर में पूरा गाँव जमा हो गया। पुलिस आई। थानेदार सुरेश कुमार ने शव को बाहर निकलवाया। लाश एक युवक की थी। उम्र करीब पच्चीस-छब्बीस साल। पहचान हुई—अर्जुन, गाँव के स्कूल मास्टर का बेटा। अर्जुन शहर में कॉलेज पढ़ता था। पिछले हफ्ते घर आया था।
परिवार रो-रोकर बेहाल हो गया। माँ सुशीला फूट-फूटकर रोई, “मेरा बेटा… मेरा इकलौता बेटा!” पिता हरिशंकर चुपचाप खड़े रहे। आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर कोई भाव नहीं।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई। मौत डूबने से हुई थी, पर गर्दन पर हल्के निशान थे। पुलिस ने केस दर्ज किया—संदिग्ध मौत। जाँच शुरू हुई।
अर्जुन का दोस्त राकेश पुलिस के पास आया। उसने बताया, “अर्जुन पिछले कुछ दिनों से बहुत परेशान था। वह कहता था कि कोई उसे परेशान कर रहा है। रात को फोन आते थे, कोई साँसें लेता था और कट जाता था। एक दिन उसने मुझसे कहा—‘राकेश, अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो याद रखना, तालाब के पास वाले पुराने मंदिर में कुछ छिपा है।’”
थानेदार ने मंदिर की तलाशी ली। मंदिर खंडहर हो चुका था। अंदर एक टूटी मूर्ति के नीचे एक पुरानी डायरी मिली। डायरी अर्जुन की थी।
डायरी के पन्ने पलटते हुए थानेदार के चेहरे के भाव बदलते गए। अर्जुन ने लिखा था:
“मैं शहर से घर आया हूँ। माँ-बाप खुश हैं। पर गाँव में कुछ गड़बड़ है। रात को तालाब के पास से आवाजें आती हैं। कल रात मैं गया। वहाँ एक लड़की खड़ी थी। सफेद साड़ी में। चेहरा नहीं दिखा। उसने कहा—‘मदद करो… मुझे छुड़ाओ…’ फिर गायब हो गई।
मैंने गाँव वालों से पूछा। बुजुर्ग रामप्रसाद ने बताया कि बीस साल पहले यहाँ एक लड़की डूबी थी। नाम था सीमा। वह गाँव के जमींदार के बेटे से प्यार करती थी। जमींदार ने विरोध किया। एक रात सीमा गायब हो गई। लोग कहते हैं उसे तालाब में धकेल दिया गया।
अब मुझे लगता है सीमा की आत्मा अशांत है। वह कुछ कहना चाहती है।
कल रात फिर गया। इस बार उसने अपना चेहरा दिखाया। आँखों में खून था। उसने कहा—‘मेरी मौत हत्या थी। जमींदार के बेटे ने मुझे मारा। सबने छिपाया। सबूत तालाब के नीचे है।’”
डायरी यहीं खत्म हो गई।
थानेदार ने गोताखोर बुलाए। तालाब की सफाई शुरू हुई। गाद में से एक पुरानी हड्डी निकली, फिर एक सोने की चेन, जिस पर ‘सीमा’ लिखा था। और सबसे महत्वपूर्ण—एक लोहे का डिब्बा। डिब्बे में पुराने पत्र और एक फोटो थी। फोटो में सीमा और जमींदार का बेटा राजवीर साथ खड़े थे। पत्रों में राजवीर ने लिखा था कि वह सीमा से शादी नहीं कर सकता, परिवार मना कर रहा है। आखिरी पत्र में धमकी थी।
राजवीर अब शहर में रहता था। अमीर आदमी बन चुका था। पुलिस ने उसे बुलाया। पूछताछ में वह घबरा गया। आखिर कबूल किया, “हाँ… मैंने उसे धकेला था। गुस्से में। वह जिद कर रही थी। मैंने सोचा पानी में गिर जाएगी, बच जाएगी। पर वह डूब गई। सबने छिपाया। पैसे दिए, धमकियाँ दीं।”
केस सुलझ गया। राजवीर गिरफ्तार हो गया। बीस साल पुरानी हत्या का पर्दाफाश हो गया।
पर अर्जुन की मौत का राज अभी बाकी था।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दोबारा जाँची गई। गर्दन के निशान संदिग्ध थे। थानेदार ने सोचा—अर्जुन ने सच जान लिया था। किसी ने उसे चुप कराने के लिए मारा।
गाँव में अफवाहें फैलने लगीं। लोग कहने लगे कि सीमा की आत्मा अब शांत हो गई है, क्योंकि उसके हत्यारे को सजा मिल गई। पर अर्जुन की आत्मा अभी भी भटक रही है।
रात को तालाब के पास फिर आवाजें आने लगीं। इस बार अर्जुन की आवाज। “मुझे मारा गया… मुझे मारा गया…”
थानेदार ने पूरी रात गश्त की। सुबह उसे तालाब के किनारे अर्जुन की डायरी का एक और पन्ना मिला। उस पर लिखा था:
“जो व्यक्ति मेरे घर पर रात को आया था, वही मेरा हत्यारा है। वह राजवीर का भाई है। उसने मुझे डराया, फिर तालाब में धकेल दिया।”
पुलिस ने राजवीर के भाई को गिरफ्तार कर लिया। कबूलनामा हो गया।
गाँव फिर से शांत हो गया। तालाब साफ हो गया। लोग फिर से वहाँ आने लगे। पर बुजुर्ग अब भी कहते हैं कि कभी-कभी रात को अगर कान लगाकर सुनो तो हल्की-हल्की आहें सुनाई देती हैं।
अर्जुन की माँ अब रोज तालाब के किनारे बैठती है। वह फूल चढ़ाती है और कहती है, “बेटा, तुम्हारी वजह से एक अनजान लड़की को न्याय मिला। तुमने अपनी जान दे दी, पर सच सामने आ गया।”
एक साल बाद गाँव में एक छोटी-सी मूर्ति स्थापित की गई। सीमा और अर्जुन दोनों की। लोग कहते हैं कि अब तालाब शांत है। कोई आवाज नहीं आती।
पर कभी-कभी जब चाँदनी रात होती है, तालाब का पानी हल्के-हल्के हिलता है। जैसे कोई कह रहा हो—धन्यवाद।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
अर्जुन के दोस्त राकेश ने एक दिन थानेदार से कहा, “सर, अर्जुन ने मरने से पहले मुझसे एक बात कही थी। उसने कहा था कि तालाब सिर्फ एक जगह नहीं है। यह गाँव के सभी छिपे हुए पापों का गवाह है। अगर कोई और अन्याय हुआ तो फिर से आवाजें आएंगी।”
थानेदार मुस्कुराया, “शायद। प्रकृति कभी अन्याय सहन नहीं करती।”
गाँव अब पहले जैसा नहीं रहा। लोग एक-दूसरे से ज्यादा सतर्क हो गए। बच्चों को रात को अकेले बाहर नहीं जाने देते। औरतें पानी भरते समय एक-दूसरे के साथ जाती हैं।
एक दिन एक नया व्यक्ति गाँव आया। वह लेखक था। उसने तालाब की कहानी सुनी। उसने कहा, “मैं इस कहानी को लिखूँगा। ताकि लोग याद रखें कि सच कभी दबता नहीं। चाहे बीस साल लग जाएँ, चाहे कोई जान दे दे, सच एक दिन सामने आता है।”
उस लेखक का नाम था… विजय शर्मा एरी।
और यही कहानी आज आपके सामने है।
तालाब में मिली लाश सिर्फ एक घटना नहीं थी। वह एक चेतावनी थी। अन्याय के खिलाफ। छिपे हुए पापों के खिलाफ। और उन आत्माओं के लिए जो न्याय माँगती हैं।
रामू चौकीदार अब भी रोज सुबह तालाब की तरफ जाता है। वह पानी में देखता है। कभी-कभी उसे लगता है कि पानी के नीचे दो चेहरे मुस्कुरा रहे हैं—एक सीमा का, एक अर्जुन का।
वह हाथ जोड़कर कहता है, “शांति से रहो। न्याय हो गया।”
और तालाब शांत रहता है।
