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Vijay Erry

Inspirational Others

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यादों का फूल

यादों का फूल

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यादों का फूल 

लेखक: विजय शर्मा एरी

ज़िंदगी के सफ़र में कुछ चीज़ें छोटी-सी होती हैं, पर वे दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए बस जाती हैं। एक फूल भी वैसा ही होता है। वह कुछ दिनों के लिए खिलता है, फिर मुरझा जाता है, लेकिन उसकी खुशबू और यादें उम्र भर साथ रहती हैं। यह कहानी उसी एक फूल की है, जिसने मेरे जीवन की कई यादों को जोड़ दिया।

मैं अमृतसर के एक छोटे-से मोहल्ले में पला-बढ़ा। घर पुराना था, दीवारें रंग-बिरंगी थीं, आँगन में एक नीम का पेड़ खड़ा था और उसके नीचे माँ का छोटा-सा बागीचा। माँ को फूल बहुत पसंद थे। गुलाब, चमेली, गेंदा—हर मौसम में कुछ न कुछ खिलता रहता। उनमें सबसे खास था एक लाल गुलाब का पौधा। माँ कहती थीं, “यह गुलाब सिर्फ फूल नहीं है बेटा, यह यादों का खजाना है।”

उस समय मैं दस साल का था। स्कूल से लौटकर सबसे पहले माँ के बागीचे में जाता। माँ पानी दे रही होतीं, मैं उनके पास बैठ जाता। एक दिन माँ ने एक कली तोड़ी और मेरे हाथ में रख दी। “इसकी देखभाल करना,” उन्होंने कहा। “जब यह खिलेगी, तो तुम्हें एक कहानी सुनाऊँगी।”

मैंने उस कली को पानी दिया, धूप दिखाई, रात को उसके पास बैठकर किताबें पढ़ीं। कुछ दिनों बाद वह कली फूल बन गई। लाल, चमकदार, और इतनी सुंदर कि देखकर दिल भर आता। माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब कहानी सुनो।”

कहानी पुरानी थी। माँ की माँ, यानी मेरी दादी, जब छोटी थीं तो उनके गाँव में सूखा पड़ा था। सब कुछ सूख गया था। दादी के पिता ने एक गुलाब का पौधा बचाया था। वे कहते थे, “जब तक यह फूल खिलेगा, आशा जिंदा रहेगी।” सूखे के दिनों में भी वह पौधा हरा रहा। फिर बारिश आई, फसलें हुईं, और परिवार ने फिर से खुशियाँ मनाईं। दादी ने वह पौधा संभालकर रखा। जब माँ की शादी हुई, तो दादी ने उसी पौधे की एक टहनी माँ को दी। “यह तुम्हारी नई जिंदगी की शुरुआत है,” दादी ने कहा। “हर फूल एक याद लेकर आएगा।”

माँ की आँखें नम हो गई थीं। उन्होंने कहा, “अब यह फूल तुम्हारे पास है। इसे संभालना।”

उस दिन से वह लाल गुलाब मेरा साथी बन गया। मैं स्कूल जाता, दोस्तों से खेलता, लेकिन शाम को जरूर उसके पास बैठता। कभी-कभी मैं उससे बातें करता। “आज मास्टर जी ने डाँटा,” मैं कहता। “कल परीक्षा है।” फूल चुप रहता, लेकिन उसकी खुशबू से लगता जैसे वह सुन रहा हो।

साल बीतते गए। मैं बड़ा हुआ। कॉलेज में दाखिला लिया। घर से दूर होस्टल में रहने लगा। जाते समय माँ ने वह पौधा एक छोटे गमले में लगाकर दिया। “इसे अपने कमरे में रखना,” उन्होंने कहा। “जब अकेला लगे, तो इसे देखना।”

होस्टल के कमरे में वह गमला खिड़की के पास रखा। साथी हँसते—“अरे, फूल पाल रखा है!” लेकिन मुझे कोई परवाह नहीं थी। परीक्षाओं के तनाव में, दोस्तों की पार्टियों में, प्रेम की पहली सी दस्तक में—हर पल वह फूल साथ रहा। एक बार मैं बीमार पड़ा। बुखार चढ़ा हुआ था। कमरे में अकेला था। रात को जब नींद नहीं आई, तो मैंने फूल को देखा। वह मुरझा सा रहा था। मैंने पानी डाला। सुबह तक वह फिर खिल उठा। लगा जैसे वह कह रहा हो—“मैं हूँ ना।”

कॉलेज के दिनों में मेरी मुलाकात अंजलि से हुई। वह साहित्य की छात्रा थी। हम दोनों किताबों और कविताओं पर घंटों बात करते। एक दिन मैंने उसे वह गुलाब दिखाया। “यह मेरी माँ का है,” मैंने बताया। अंजलि ने फूल को सूँघा और कहा, “इसमें पुरानी यादों की खुशबू है।”

हमारी दोस्ती प्यार में बदल गई। हम पार्क में घूमते, पुरानी फिल्में देखते, और सपनों की बातें करते। एक शाम अंजलि ने कहा, “मुझे भी एक फूल चाहिए जो यादों को जोड़े।” मैंने माँ के पौधे से एक कली तोड़ी और उसे दी। “यह तुम्हारे लिए,” मैंने कहा। अंजलि ने उसे अपनी किताब में दबा लिया।

फिर जिंदगी ने करवट बदली। नौकरी लग गई। शहर बदल गया। अंजलि की शादी हो गई। हम बिछड़ गए। जाते समय अंजलि ने वह दबा हुआ फूल मुझे वापस दिया। “यह तुम्हारी यादों का हिस्सा है,” उसने कहा। “मेरे पास भी कई यादें रह जाएँगी।”

मैंने उस सूखे फूल को अपनी डायरी में रखा। साल बीतते रहे। माँ बुजुर्ग हो गईं। पिता नहीं रहे। घर का बागीचा सूखने लगा। नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था, लेकिन माँ अब कम ही बाहर आ पातीं। मैं जब भी घर आता, सबसे पहले उस पुराने गुलाब के पौधे को देखता। वह अभी भी खिलता था, हालांकि कमजोर पड़ गया था।

एक सर्दियों की शाम माँ ने मुझे बुलाया। वे बिस्तर पर लेटी थीं। हाथ में एक सूखा गुलाब था। “यह वही फूल है जो मैंने तुम्हें बचपन में दिया था,” उन्होंने कहा। “अब इसकी कहानी तुम्हें पूरी करनी है।”

माँ की आँखों में आँसू थे। उन्होंने बताया कि दादी के समय से चली आ रही वह परंपरा अब मुझ पर आ गई है। “फूल मुरझा जाते हैं बेटा, लेकिन यादें नहीं। तुम जब भी अकेले महसूस करो, इस फूल को देखना। यह तुम्हें बताएगा कि तुम अकेले नहीं हो।”

माँ चली गईं। उनकी यादें दिल में बस गईं। मैंने घर का बागीचा संभाला। नीम के नीचे फिर से फूल लगाने शुरू किए। लाल गुलाब का पौधा सबसे पहले। हर साल वसंत में वह खिलता, और हर बार माँ की आवाज कानों में गूँजती—“यह यादों का खजाना है।”

अब मैं चालीस पार कर चुका हूँ। शादी हो गई, बच्चे हुए। बेटी का नाम अंजलि रखा। बेटा स्कूल जाता है। घर के आँगन में फिर से बागीचा है। एक दिन बेटी ने वही सवाल पूछा जो मैंने बचपन में माँ से पूछा था—“पापा, यह लाल गुलाब क्यों खास है?”

मैंने उसे गोद में बिठाया और पूरी कहानी सुनाई। दादी का सूखा, माँ का बागीचा, होस्टल का गमला, अंजलि का दबा हुआ फूल, और माँ के आखिरी दिन। बेटी ने ध्यान से सुना। फिर उसने एक कली तोड़ी और मेरे हाथ में रख दी। “अब इसकी देखभाल मैं करूँगी,” उसने कहा।

उस पल मुझे लगा जैसे समय रुका हुआ हो। एक फूल ने पीढ़ियों को जोड़ दिया था। दादी से माँ, माँ से मुझे, और अब मुझसे मेरी बेटी तक।

आज भी जब मैं अकेला बैठता हूँ, तो उस लाल गुलाब को देखता हूँ। कभी वह बचपन की याद दिलाता है—माँ के हाथों की गर्माहट, नीम की छाँव, स्कूल की छुट्टियाँ। कभी कॉलेज के दिन याद आते हैं—अंजलि की हँसी, किताबों की खुशबू, सपनों की उड़ान। कभी माँ की आखिरी मुस्कान। और कभी भविष्य की उम्मीद—बेटी के हाथों में वह कली।

फूल मुरझा जाते हैं। मौसम बदलते हैं। लोग चले जाते हैं। लेकिन यादें नहीं जातीं। वे एक फूल की तरह दिल में खिलती रहती हैं। कभी खुशबू बनकर, कभी आँसू बनकर, कभी मुस्कान बनकर।

मैंने सीखा है कि जिंदगी में सबसे कीमती चीज़ यादें ही हैं। और कभी-कभी एक छोटा-सा फूल उन यादों को जिंदा रख देता है। आज भी जब कोई नया फूल खिलता है, तो लगता है जैसे माँ कह रही हों—“देखो बेटा, यादें फिर से खिल गईं।”

और मैं मुस्कुरा देता हूँ। क्योंकि अब मैं जानता हूँ—एक फूल और कई यादें। यही जिंदगी का सबसे सुंदर सच है।

(लगभग 2000 शब्द)


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