श्मशान के सपने
श्मशान के सपने
श्मशान के सपने
लेखक: विजय शर्मा एरी
रात का अँधेरा गाँव के ऊपर इतना घना था कि चाँद भी शरमाकर बादलों के पीछे छिप गया था। हवा में सूखी पत्तियों की सरसराहट और दूर से आती कुत्तों की भौंक के अलावा कुछ सुनाई नहीं देता था। नदी के किनारे बसे उस पुराने श्मशान घाट पर सिर्फ एक लालटेन जल रही थी। लालटेन के इर्द-गिर्द खड़ा था रामू डोम। साठ साल का बूढ़ा, झुकी कमर, सफेद बाल और आँखों में एक अजीब सी थकान। तीस साल से वह इसी श्मशान का रखवाला था। दिन में लाशें जलतीं, रात में सन्नाटा।
उस रात भी एक चिता जल रही थी। लकड़ियाँ चटक रही थीं। आग की लपटें कभी ऊपर उठतीं तो कभी नीचे बैठ जातीं। रामू ने लकड़ी ठोककर आग को और भड़काया। तभी अचानक एक तीखी सीटी बजी।
सी-ई-ई-ई……
रामू का शरीर काँप गया। सीटी श्मशान के अंदर से आई थी। न कोई पुलिसवाला, न कोई बच्चा। मध्य रात। श्मशान में सीटी?
वह चारों ओर देखा। सिर्फ अँधेरा। फिर से सीटी बजी। इस बार और नजदीक से।
रामू ने लालटेन उठाई और धीरे-धीरे चिता की तरफ बढ़ा। “कौन है वहाँ?” उसकी आवाज काँप रही थी। कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ हवा में सीटी की गूँज।
अगली सुबह गाँव में खबर फैल गई। रात को श्मशान से सीटी सुनाई दी। कुछ लोग हँसे, कुछ ने कहा अघोरी बाबा खेल रहे होंगे। लेकिन रामू चुप रहा। उसने किसी को नहीं बताया कि सीटी के साथ एक अजीब सी हंसी भी सुनाई दी थी।
तीन दिन बाद फिर वही हुआ। इस बार सीटी के साथ एक धीमी आवाज भी आई—“रामू…… मुझे निकाल।”
रामू की रूह काँप गई। उसने लालटेन की रोशनी में देखा। चिता के पास की जमीन पर एक छोटी सी हड्डी पड़ी थी। हड्डी के आसपास काली मिट्टी। जैसे कोई हाल ही में खोदी गई हो।
वह हड्डी उठाकर घर ले आया। रात भर नींद नहीं आई। सुबह वह गाँव के पंडित जी के पास गया। पंडित जी ने हड्डी देखकर मुँह बनाया। “यह बच्चे की हड्डी है। और…… यह साधारण नहीं लगती। शायद कोई अधूरी क्रिया।”
रामू ने सब कुछ बता दिया। पंडित जी ने कहा, “श्मशान में कभी-कभी अधूरी आत्माएँ रह जाती हैं। सीटी उनकी पुकार होती है। अगर कोई जवाब दे दे तो……।”
रामू डर गया। लेकिन रात को फिर सीटी बजी। इस बार और तेज। और आवाज साफ थी—“रामू…… तुमने मेरी हड्डी उठा ली। अब मुझे मुक्त करो।”
रामू ने हिम्मत करके पूछा, “तुम कौन हो?”
आवाज आई, “मैं रुकमणी हूँ। दस साल पहले…… मेरे बाप ने मुझे यहीं दबा दिया था। जिंदा।”
रामू का खून सूख गया। उसने याद किया। दस साल पहले गाँव में एक लड़की गायब हो गई थी। लोग कहते थे वह शहर भाग गई। लेकिन सच कुछ और था।
रुकमणी की आत्मा ने बताया। उसके पिता ने उसे एक तांत्रिक के हाथों बेच दिया था। तांत्रिक ने श्मशान में उसे जिंदा दबा दिया था, क्योंकि “कच्ची कन्या की हड्डी” से बड़ा तंत्र होता है। लेकिन क्रिया अधूरी रह गई। आत्मा बंध गई। और हर साल उसी रात सीटी बजती है।
रामू ने पूछा, “अब क्या करूँ?”
आत्मा बोली, “मेरी बाकी हड्डियाँ निकालो। उन्हें गंगा में प्रवाहित करो। और जो तांत्रिक है…… उसे यहाँ लाओ।”
रामू ने हिम्मत जुटाई। अगली रात वह अकेले श्मशान गया। उसने जमीन खोदी। कई हड्डियाँ निकलीं। छोटी-छोटी। बच्चों जैसी। और एक काला धागा, कुछ मंत्र लिखे ताबीज।
उसी रात सीटी और तेज बजी। अब सिर्फ रुकमणी नहीं, और भी आवाजें थीं। कई बच्चे, कई युवतियाँ। सब अधूरी। सब जिंदा दबाई गईं।
रामू ने गाँव वालों को इकट्ठा किया। पंडित जी के साथ सबने हड्डियाँ गंगा में प्रवाहित कीं। लेकिन तांत्रिक कौन था?
गाँव के बाहर जंगल में एक अघोरी रहता था। लोग उसे “काला बाबा” कहते थे। रामू ने हिम्मत करके उसके पास गया।
काला बाबा हँसा। “तू भी मरा चाहता है क्या? रुकमणी तो सिर्फ शुरुआत थी। श्मशान मेरा है। सीटी मेरी हुंकार है।”
रामू ने देखा। बाबा के गले में कई काले धागे। और उसके झोपड़ी में बच्चों की हड्डियों से बने ताबीज।
रात को पूरा गाँव श्मशान में इकट्ठा हुआ। पंडित जी ने हवन शुरू किया। मंत्र गूँजने लगे। तभी सीटी बजी। इतनी तेज कि कानों में दर्द हो गया।
अँधेरे से काला बाबा निकला। उसके पीछे कई परछाइयाँ। रुकमणी की आत्मा सबसे आगे।
“तुमने हमें जिंदा दबाया,” आत्माओं ने एक स्वर में कहा। “अब तुम्हारी बारी।”
काला बाबा भागने लगा। लेकिन श्मशान की मिट्टी ने उसे जकड़ लिया। सीटी और तेज हुई। जैसे सैकड़ों सीटियाँ एक साथ बज रही हों।
सुबह जब लोग आए तो काला बाबा की लाश श्मशान के बीचों-बीच पड़ी थी। उसके शरीर पर सीटी जैसी निशान। और उसके मुँह से एक छोटी सी हड्डी निकली हुई थी।
उस दिन के बाद श्मशान में कभी सीटी नहीं बजी। रामू अब भी वहीं रहता है। लेकिन अब उसकी आँखों में डर नहीं, शांति है।
वह अक्सर रात को बैठकर कहता है, “श्मशान सिर्फ मौत की जगह नहीं। कभी-कभी न्याय की जगह भी बन जाता है। और सीटी…… अधूरी आत्माओं की आखिरी पुकार।”
गाँव वाले अब श्मशान से नहीं डरते। लेकिन हर साल उसी रात, जब हवा रुक जाती है, दूर से एक बहुत धीमी सी सीटी सुनाई देती है। जैसे कोई याद दिला रहा हो—अन्याय कभी पूरी तरह नहीं मरता। वह सिर्फ रूप बदल लेता है।
और रामू डोम हर बार उसी सीटी को सुनकर मुस्कुरा देता है। क्योंकि वह जानता है, अब वह सीटी डर की नहीं, मुक्ति की है।
(लगभग 2000 शब्द)
— विजय शर्मा एरी
यह कहानी काल्पनिक है, केवल मनोरंजन के लिए।
