पश्चाताप
पश्चाताप
एक छोटा सा गांव था रामपुर वहां पर रौनक अपनी मां सविता के साथ रहता था। रौनक जब छोटा था तभी उसके पिताजी चल बसे। रौनक के पिताजी के जाने के बाद सविता ने रौनक और घर की जिम्मेदारी संभाली। वह घर-घर जाकर काम कर के अपना और रौनक का गुजारा किया करती। रौनक को उसकी मां जरा भी पसंद नहीं थी। उसने ना कभी अपनी मां के काम में उसका हाथ बटाया और ना कभी उससे अच्छे से बात की। वह हमेशा अपनी मां पे गुस्सा किया करता। वह अपनी मां को स्कूल में भी नहीं बुलाया करता, क्योंकि सविता का आधा चेहरा जला हुआ था। रौनक को अपने दोस्तों की सुंदर और सुशिक्षित मां के सामने अपनी मां बदसूरत और अनपढ़ लगती थी। यही कारण था कि वह अपनी मां से नफरत किया करता। सविता रौनक के लिए सब कुछ किया करती, वह जो चाहे उसे लाकर देती, पर रोनक को इसकी जरा भी कीमत नहीं था।
धीरे-धीरे समय बीतता गया रौनक ने अच्छे नंबरों से अपनी पढ़ाई पूरी की। बड़ी कंपनी में उसे नौकरी मिल गई थी। अब रौनक और उसकी मां के दिन बदल गए। धीरे-धीरे रौनक की तरक्की हो गई। अब उनके पास एक बहुत बड़ा बंगला था गाड़ी थी और सुख सुविधा के सारे साधन थे, लेकिन अभी भी रौनक को अपनी मां से नफरत थी। जब रौनक की शादी हो गई , रौनक ने अपनी मां को वृद्धाश्रम छोड़ा। अब रौनक अपनी पत्नी के साथ आराम से रहने लगा और उधर उसकी मां वृद्धाश्रम मैं रौनक की एक झलक पाने के लिए रोती रहती थी। एक दिन अचानक वृद्धाश्रम से रौनक को फोन आया और रौनक तेजी से वृद्धाश्रम चला गया। पर पहुंचते ही ,वहां के व्यवस्थापक ने उसे एक थैली दी जो उसकी मां ने उसके लिए रखी थी। व्यवस्थापक ने रौनक को बताया "तुम्हारी मां रोज तुम्हारी याद करके रोया करती थी और जब वह अपनी आखिरी सांसे ले रही थी, तब उन्होंने मुझे यह थैली तुम्हें देने के लिए कहा था।
रौनक को अब अपनी मां की याद आने लगी, कैसे उसकी मां ने दिन-रात कष्ट करके उसे इस काबिल बनाया, यह सारा दृश्य उसके आंखों के सामने आने लगा और वह रोते हुए अपनी मां की दी हुई थैली लेकर घर आया और जब उसने थैली खोली तो उसमें से उसकी मां की कुछ चीजें थी और एक बंद लिफाफा था। जब रौनक ने लिफाफा खोला तो उसमें उससे अपने मां के हाथों से लिखी हुई एक चिट्ठी मिली। वह पढ़ते ही वह जोर जोर से रोने लगा। उसमें लिखा था :-
बेटा रौनक,
मुझे पता है तुम मेरी शक्ल नहीं देखना चाहते, क्योंकि मेरा आधा चेहरा जला हुआ है। पर तुमने यह जानने की कोशिश की, कि मेरा चेहरा ऐसा कैसे हो गया। जब तुम छोटे थे ,दिवाली के समय एक फटाका तुमने जलाया था ,पर वह चला नहीं तो तुम उसके पास गए, तभी मैंने देखा वह अभी भी जल रहा है तो मैंने उसे उठाकर फेंक ना चाहा, पर मैं उसके पास पहुंची तो वह फट गया और मेरा चेहरा झूलस गया।अगर उस दिन में नहीं पहुंचती तो न जाने तुम्हारे साथ क्या हादसा हो जाता ।तुम्हारा चेहरा जल जाता शायद आंखें भी निकल जाती ।
यह पढ़ते ही रौनक को अपने आप से घृणा हो गई। जिस बदसूरती के कारण वह अपनी मां को पसंद नहीं किया करता था वही उसका कारण था ।अब रौनक के पास सिर्फ अपने किए गए कर्मों का पछतावा था पर उसका कोई मोल नहीं था, क्योंकि अब उसे उसकी मां कभी नहीं मिलने वाली थी। शायद सपनों में भी नहीं। रौनक पश्चाताप की अग्नि में जल रहा था..........
