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हरि शंकर गोयल

Inspirational


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हरि शंकर गोयल

Inspirational


परीक्षा

परीक्षा

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आज सुबह से ही कौमुदी बहुत व्यस्त थी । एक तो करवा चौथ और उस पर पटवारी भर्ती परीक्षा में ड्यूटी । पता नहीं बोर्ड में कैसे कैसे अधिकारी बैठे हैं जिन्होंने आज भी यानि करवा चौथ के दिन परीक्षा रखवा दी थी । आज के दिन तो लगभग सभी सुहागिनें करवा का व्रत रखती हैं । कुछ तो कुंवारी लड़कियां भी यह व्रत रखती हैं । जब परीक्षा की तिथि तय की जा रही थी तब इस बात पर क्यों नहीं ध्यान दिया गया ? मगर ध्यान कैसे जाएगा । बोर्ड में तो सब पुरुष ही सदस्य होंगे ना । उनको क्या मतलब होता है करवा चौथ से ? कोई महिला होती तो ध्यान दिला देती और तारीख बदलवा देती । इसीलिए तो महिलाएं होनी चाहिए सब जगह जिससे महिलाओं की समस्याओं पर ध्यान दिया जा सके । वह मन ही मन भुनभुना भी रही थी ।

कौमुदी सीनियर स्कूल में जीव विज्ञान विषय की व्याख्याता थी । दो साल पहले ही उसकी इस पद पर नियुक्ति हुई थी । जब पटवारी परीक्षा की ड्यूटी आई थी तब वह जिला शिक्षा अधिकारी से लड़कर आई थी कि करवा चौथ के दिन वह कैसे ड्यूटी दे सकती है ? मगर जब जिला शिक्षा अधिकारी ने तर्क दिया कि "स्कूलों में कम से कम 30% महिलाएं हैं । चूंकि सभी महिलाएं यह व्रत करती हैं । अब यदि सब महिलाओं की ड्यूटी काट दी जाये तो यह परीक्षा कौन करवायेगा ? इसके अतिरिक्त जो महिलाएं परीक्षा दे रहीं हैं उनका भी तो करवा का व्रत होगा ? जब वे व्रत में परीक्षा दे सकती हैं तो फिर आप परीक्षा ले भी सकती हैं" । इस तर्क से वह निरुत्तर हो गई । 


एक बात और कही थी जिला शिक्षा अधिकारी ने । "जब कोई महिला यह कहती है कि वह पुरुषों से अधिक सक्षम है तब वही महिला स्कूल की जिम्मेदारियों से पीछे क्यों हटना चाहती हैं" ? 

इसका कोई जवाब कौमुदी के पास नहीं था । वह मानती है कि जब भी स्कूल में देर तक रुकने या कोई एक्स्ट्रा काम की बात आती है तब सब महिला अध्यापिकाएं पीछे हट जाती हैं और वह एक्सट्रा काम पुरुष अध्यापकों को ही दिया जाता है । तब महिला पुरुष बराबरी का सिद्धांत उड़न छू हो जाता है । यह तो वही बात हुई कि "मीठा मीठा गप गप कड़वा कड़वा थू थू" । 


वह अपने ही विचारों में खोई हुई थी कि सुधाकर की आवाज ने उसके विचारों के संसार में व्यवधान उत्पन्न कर दिया । 


"अरे कहाँ हो भाई ? मेरे मोजे मिल ही नहीं रहे हैं" । सुधाकर की झुंझलाहट भरी आवाज से वह चौंक गई । 


महिलाओं के लिए यह भी एक समस्या है कि अपने पतिदेव और बच्चों के कपड़े निकाल कर उनके हाथ में दो तब जाकर वे कुछ कर पाते हैं । उन्हें कितना भी बता दो कि मोजे वहां आलमारी में रखे हैं फिर भी उन्हें वहां पर दिखाई नहीं देते । 


कौमुदी अपनी मांग में सिंदूर डाल रही थी उस समय । वह बीच में रोककर सुधाकर को पहले मोजे देकर आई और वह फिर से मांग में सिंदूर भरने लगी । 


"मेरा पैन देखा था क्या कहीं ? और पेन्सिल की नॉब भी नुकीली करनी थी , वह भी नहीं की है अब तक" ? सुधाकर झल्ला कर बोला । "पता नहीं क्या करती रहती हो दिन भर ? एक छोटा सा काम बताया था वह भी नहीं हुआ । आज परीक्षा कैसे दे पाऊँगा मैं " ? उसके शब्दों में हताशा साफ झलक रही थी । 

सुधाकर और कौमुदी ने साथ साथ एम. एस.सी किया था । कॉलेज में ही दोनों में प्यार हो गया था । दोनों के घरवाले भी उनकी शादी के लिए तैयार हो गये और शादी हो गयी ।शादी के बाद राजस्थान लोक सेवा आयोग ने व्याख्याता भर्ती परीक्षा आयोजित की । दोनों ने साथ तैयारी की । साथ ही परीक्षा भी दी लेकिन कौमुदी का चयन हो गया और सुधाकर रह गया । दरअसल हुआ यों कि सुधाकर के अंक यद्यपि कौमुदी से अधिक थे मगर वह सामान्य पुरुष था इसलिए उसकी कट ऑफ कौमुदी की कट ऑफ से कहीं ज्यादा गई जबकि कौमुदी के कम अंक होने के बावजूद महिला आरक्षण के कारण उसका चयन हो गया । इस घटना ने सुधाकर को थोड़ा चिड़चिड़ा बना दिया । 


इन दो सालों में सुधाकर ने एक दो प्रतियोगी परीक्षाएं और दी थीं लेकिन आरक्षण के कारण उसका चयन ज्यादा अंक आने पर भी नहीं हुआ । फ्रस्ट्रेशन के कारण वह थोड़ा चिड़चिड़ा हो गया था । अंत में उसने पटवारी परीक्षा देने का निर्णय ले लिया । आज उसकी भी परीक्षा थी । परीक्षा केंद्र भी दोनों का एक ही था । 


हालांकि यह नियम है कि जिस वीक्षक या पर्यवेक्षक का कोई रिश्तेदार परीक्षा दे रहा हो तो उसे बताना पड़ता है जिससे उसकी ड्यूटी किसी अन्य केन्द्र पर लगा दी जाये । कौमुदी ने इसकी सूचना केन्द्र अधीक्षक को इसलिए नहीं दी क्योंकि वह सोच रही थी कि वह सुधाकर के साथ केन्द्र पर पहुंच जायेगी । यदि वह सूचना दे देती तो दोनों को अलग अलग केन्द्र पर जाना पड़ता । इसके अलावा उसे यह भी लोभ था कि वह बीच बीच में उससे मिल कर छोटी मोटी मदद भी कर सकती है । इसलिए उसने यह बात बताई ही नही ।


आज सुधाकर कुछ ज्यादा ही चिड़चिड़ा लग रहा था . कौमुदी ने इसे स्वाभाविक समझा । हर परीक्षार्थी परीक्षा से ठीक पहले थोड़ा घबराया हुआ सा रहता है । परीक्षा का तनाव चेहरे पर दिखाई दे जाता है । कौमुदी भी समझती है इस मनोविज्ञान को । वह सुधाकर को सामान्य रखने का प्रयास करने लगी । 


दोनों पति पत्नी परीक्षा केंद्र पहुंच जाते हैं । सुधाकर अपने कक्ष में चला जाता है और कौमुदी केन्द्र अधीक्षक के कक्ष में । वहां पर वह सामग्री लेकर वह अपने कक्ष में चली जाती है और उपस्थित परीक्षार्थियों को ओ एम आर शीट बांटने लगती है । वहां पर सुधाकर को बैठे देखकर वह एकाएक चौंक जाती है । सुधाकर भी उसे देखकर सकपका जाता है मगर दोनों खामोश ही रहते हैं । कौमुदी अब केन्द्र अधीक्षक को बता भी नहीं सकती है कि सुधाकर उसका पति है , इसलिए वह चुप ही रहती है । घंटी बजते ही वह पेपर बांटने लगती है । सुधाकर को भी पेपर दे देती है और आगे बढ़ जाती है । पेपर मिलते ही सब परीक्षार्थी उस पर भूखे भेडिये की तरह टूट पड़ते हैं । 


करीब एक घंटा गुजर गया था । चारों ओर शांति छाई हुई थी । अचानक कौमुदी को लगा कि कोई बहुत धीरे धीरे बात कर रहा है । उसने निगाह दौड़ाई तो उसे सुधाकर की गतिविधियां संदिग्ध प्रतीत हुईं । उसके कान खड़े हो गये । वह सुधाकर के पास गयी और प्रश्न वाचक निगाहों से उसे देखा । सुधाकर चुपचाप अपना काम करता रहा । कौमुदी इसे अपने मन का भ्रम समझकर वापस अपनी सीट पर आ गयी । मगर अब उसका ध्यान बार बार सुधाकर पर जाने लगा । 


थोड़ी देर बाद कौमुदी को फिर से अहसास हुआ कि कोई बहुत धीमे धीमे से बात कर रहा है । कौमुदी ने एक बार फिर से निगाहें दौड़ाई मगर निगाहें सुधाकर पर जाकर ही टिक जाती । इस बार कौमुदी सुधाकर के पास जाकर बोली "कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है न" ? 

"गड़बड़ ! कैसी गड़बड़" ? 

"अरे वही नकल वगैरह की और किसकी" ? 

सुधाकर मुस्कुरा कर रह गया । कौमुदी उसे चेतावनी देकर आ गयी । 


अब अंतिम आधा घंटा बचा था । सब परीक्षार्थी तल्लीनता से पेपर करने में लगे थे । कौमुदी को फिर लगा कि कुछ गड़बड़ है । वह सीधा सुधाकर के पास पहुंची और उसे खड़े होने के लिए कहा । 


सुधाकर कौमुदी के इस व्यवहार पर स्तब्ध रह गया । उसे कौमुदी से इस तरह की अपेक्षा नहीं थी । वह भी अड़ गया । खड़ा नहीं हुआ । कौमुदी ने देखा कि उसके कानों में ब्लुटूथ लगा हुआ है । वह सारा माजरा समझ गयी । उसके पैर कांपने लगे । डर के मारे उसके शरीर में कंपकंपी छूट गयी । कौमुदी को सुधाकर से इस तरह नकल करने की उम्मीद नहीं थी । 


हाय रे दैव ! ये क्या किया तूने । आज करवा चौथ के दिन ये कैसी परीक्षा ले रहा है एक सुहागिन की । एक तरफ उसका कर्तव्य है सही ढंग से परीक्षा करवाना । इस काम में जो भी व्यवधान डाले उसके विरुद्ध कार्यवाही करना । दूसरी तरफ उसका पति है । आज करवा चौथ भी है । वह क्या करे ? पति को बचाये या कर्तव्य का पालन करे ? 


इसी उधेड़बुन में उसने सुधाकर को धीरे से कहा "भगवान के लिए नकल मत करो । इस डिवाइस को मुझे दे दो । मैं इसे अपने बैग में रख लूंगी किसी को पता भी नहीं चलेगा । प्लीज , इसे मुझे दे दो" । 


सुधाकर को विश्वास था कि कौमुदी उसकी तरफ से आंखें बंद कर लेगी । इसलिए वह निष्फिक्र होकर अपना काम करता रहा । 


"प्लीज सुधाकर , मुझ पर रहम करो । इस डिवाइस को मुझे दे दो । मुझे आज करवा चौथ के दिन कुछ भी उल्टा सीधा करने के लिए मजबूर मत करो , सुधाकर । सुधाकर प्लीज" । 


सुधाकर तो दंभ में चकनाचूर था । उसे विश्वास था कि कौमुदी उसके खिलाफ कुछ नहीं करेगी । इसलिए वह एक कुटिल मुस्कान उछाल कर अपना काम करता रहा । कौमुदी ने उसके आगे हाथ जोड़ दिये मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ । इतने में गैलरी से केन्द्र अधीक्षक गुजर रहे थे । कौमुदी ने हिम्मत कर उन्हें आवाज दी "सर" 


केन्द्र अधीक्षक तुरंत उस कक्ष में आ गए और कहा "क्या बात है मैडम" ?  


कौमुदी का चेहरा कठोर हो गया था । उसने सुधाकर की ओर इशारा करते हुए कहा "सर, उधर कुछ गड़बड़ है" । 


केन्द्र अधीक्षक के साथ में चल रहे एक पर्यवेक्षक ने सुधाकर को खड़ा कर दिया और तलाशी ली । तलाशी में ब्लूटुथ मिला । सुधाकर अवाक निगाहों से कौमुदी को देखता रह गया । कौमुदी का चेहरा हिमालय सा अटल दिख रहा था । 



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