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फुलवतीया

फुलवतीया

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चार साल बाद लौटा था वह-दिल्ली से.... प्लेटफार्म पे उतरते ही किशन ने बैग खोला...अपनी वही सफेद गमछी निकाल गल्ले डाली (जो कभी उसके हर लिबास की शान होती थी)...एक रूपये की एक दातुन खरीद दाँतों दबाई और फिर से बन गया वही देहाती भुजिया जो शहर में पिछले चार सालों से पैकजिग होते-होते फ्रेंच-फ्राई बन चुका था...

"अरे फुलवतीया तू ".... किशन अपने इकलौते प्यार को देख सकपका गया

" तोहसे मिलन को ही आई हूँ...गया तो ऐसे गया की कोई सुध ही न...न कोई पाती, न खबर, न फून ....न घरवालों की चिन्ता ...न ही फुलवतीया की "

" अरे...तेरे खातिर ही तो घर छोड़ा था...तेरी डोली उठने वाली थी...हम क्या तेरे बारात में नाचने के लिए रूके होते...छोड़ दिए घर , मोहल्ला , गाँव"...आँखें तर हो चुकी थी किशन की...जिसे छिपाते हुए फिर से बोल पड़ा - " यहाँ की धूल भी न"....यह कहते हुए गमछी से आँसूओं को बड़ी शातिर अंदाज़ में पोंछ लिया..

"का करते तू ही बता...तेरी भी तो हिम्मत न हुई थी हमारी बाबूजी से बात करने की...जब देखो उनसे भागते फिरते "

"तू भी तो समझा सकती थी ??"

"लईकियों को तो बस समझने का हक होत है...समझाने का हक कहाँ...?? सो खुद को ही समझा लिए..."

किशन से कुछ बोलते न बना...माहौल को बदलते हुए पूछ बैठा -"अच्छा ...यह बता ...तूझे मेरी आने की खबर किसने दी ? तेरे मरद -बच्चे कहाँ है ?

"सब बताती हूँ आकर"...कहकर फुलवतीया प्लेटफार्म से पटरीयों पर उतर दूजे प्लेटफार्म पर जाने लगी...शायद वहीं उसके मरद-बच्चे खड़े हों ...

बिल्कुल ही नहीं बदली थी फुलवतीया... न ही सूरत से ...न ही स्वभाव से...न जाने क्या सोचकर दिल में एक अजब आह्ह ऊठी ...और वह मसककर रह गया...कितनी गलत सोच थी उसकी...प्यार के बारे में,फुलवतीया के बारे में....मन बना लिया अब वह गाँव छोड़ कभी न जायेगा...न पाकर भी उसने फुलवतीया को पा लिया था...

एक गजब का उत्साह भर आया बदन में...दातुन से चिरा कर जैसे ही कुल्ला करने के लिए नलके की ओर बढ़ा उसे अपने बचपन का दोस्त माखन दिख गया...

" अरे किशन..तू कब आया...साले, गया तो ऐसे गया कि आते-आते चार साल लगा दी..."

"सब ही तो जानता है माखन...छोड़ न"...

" हम्म...चल तूझे घर छोड़ दूँ ...तेरे रिक्शे का किराया बच जाएगा...नई बाईक खरीदी है हमने...सुपर इसपेलेन्डर...चल ...घर चलकर एक बात भी बतानी है तुझे..."

"हम्म...चल ...पर थोड़ी देर रूक कर...फुलवतीया से मिल लें ...आती ही होगी..."

"बौरा गया है क्या...उस दौरे से तू, इन चार सालों में भी बाहर नहीं निकला...फुलवतीया को मरे ...चार साल हो गये है किशन...चार साल..."

किशन सुन्न हो गया...सब खामोश हो गये..बस फुलवतीया की बात कानों में तैरने लगी..."लईकियों को तो बस समझने का हक होत है...समझाने का हक कहाँ...?? सो खुद को ही समझा लिए..."


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