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Manjula Prasad

Inspirational

4.4  

Manjula Prasad

Inspirational

नया सवेरा नया हौसला

नया सवेरा नया हौसला

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6

मैं एक सामान्य गृहणी हूँ . मेरी अब तक की ज़िन्दगी घर की चारदीवारी, रसोई के धूंयेऔर बच्चो की  परवरिश में ही बीती

लेकिन समय का पहिया घूमा  और देखते ही देखते मेरे सारे दायित्व पूरे हो गए। बच्चे पढ़ लिख कर अपनी अपनी ज़िन्दगी में 

व्यस्त  और  व्यवस्थित हो गए .अचानक एक दिन मैंने  देखा  अब मेरे पास समय ही समय है . साथ ही एक ऐसा खालीपन है

जिसकी मुझे आदत नहीं थी . मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं ऐसा क्या करूं  कि मेरा समय भली भांति  व्यतीत हो जाये

और मेरे जीवन में आया हुआ ये अकेलापन भी दूर हो जाये .

उन्ही दिनों मेरी छोटी बेटी मुझसे मिलने आई  . उसने मेरे जीवन के सूनेपन को भांप लिया और जाते समय  एक प्यारा सा

लैपटॉप  मुझे उपहार में दे गई .जाते जाते भावुक  होकर  बोली ," माँ  तुमने अबतक  सिर्फ हमलोगो के लिए जिया है . अब 

तुम अपने अनुभव, अपनी यादे इसमें  लिखा करो ,तुम्हे बहुत अच्छा लगेगा ."वह जितने दिन मेरे पास रही ,मेरी उँगलियाँ

पकड़कर इस नई दुनिया का रास्ता मुझे दिखाती रही 

बस, फिर क्या था! मेरे खाली दिनों को जैसे एक नई   राह  मिल गई । मैं सुबह जल्दी-जल्दी घर के सारे काम निपटाती और

किसी उत्सुक बच्ची की तरह लैपटॉप खोलकर बैठ जाती। उँगलियाँ कीबोर्ड पर थिरकने लगतीं और समय कैसे पंख लगाकर

उड़ जाता, मुझे पता ही नहीं चलता। सच कहूँ तो, उस निर्जीव लैपटॉप के रूप में मुझे एक ऐसी प्यारी 'सहेली' मिल गई थी,

जिससे मैं दिल खोलकर अपने मन की हर बात साझा कर सकती थी। अब एकाकीपन का वो भारी दर्द भी गायब हो चुका था।

       कुछ दिन इसी तरह बीते, तो मन के कोने से एक नई ख्वाहिश ने सिर उठाया

"क्यों मैं भी अपनी कोई रचना दुनिया के सामने भेजकर देखूँ?" विचार आते ही मेरे भीतर एक नया उत्साह जाग उठा।

मैंने ११-१२ मई के आस-पास  StoryMirror पर अपना एक अकाउंट बनाया और अपनी एक पसंदीदा कविता वहाँ पोस्ट

करने का प्रयास करने लगी।पर मैं इस तकनीकी दुनिया में बिल्कुल नई थी, इसलिए तीन-चार बार की असफल कोशिशों के

बाद आखिरकार मुझे थोड़ी सफलता मिली। मेरी कविता स्क्रीन पर सज चुकी थी। मैं अपनी इस छोटी सी जीत पर बेहद प्रसन्न

थी, लेकिन तभी... न जाने अनजाने में मुझसे कौन सा बटन दब गया और पलक झपकते ही मेरी पूरी कविता स्क्रीन से गायब हो गई!

"अरे रेयह क्या हो गया? अब क्या करूँ?" मेरे मुँह से बेबस चीख निकल गई।

 मैंने आधे घंटे तक पागलों की तरह हर बटन दबाया, पेज को बंद करके दोबारा खोला, पर सब बेकार।

 मेरी मेहनत का एक अंश भी वहाँ नहीं था। मैं थककर बैठ गई। काश कोई होता जो बस इतना बता देता किमैंने क्या गलती

की है और उसे सुधारना कैसे है।

तभी मेरे भीतर से एक कड़वी, थकी हुई आवाज़ आई, "रहने दे... रहने देये सब तेरे बस का नहीं है। उम्र गुज़र गई चूल्हा-

चौका करतेअब इस उम्र में कंप्यूटर इंजीनियर बनेगी क्या"

"मगर क्यों?  मैं    क्यों नहीं ?" मैंने अपने ही अंतर्मन से पूछा।

"क्यों क्या? तू इस काबिल ही नहीं है।  इतना  प्रयास करके तो देख लिया  क्या फायदा हुआ ? और फिर  तूने 

तो अपनी कविता का कोई बैकअप भी नहीं रखा था।अब क्या होगा ?  अब रोने से क्या फायदा?" अंदर की उस आवाज़ ने मुझे रुआंसा कर

दिया।मैंने सच में उस कविता का कोई बैक अ प नहीं रखा था उस कविता का एक एक शब्द मेरे दिल से निकला था   उस को

फिर से याद करके लिखना पहाड़ जैसा लगा। हताश होकर मैंने लैपटॉप बंद कर दिया और खुद को घर केदूसरे कामों में

झोंक दिया ताकि उस असफलता को भूल सकूं। कुछ दिन बीते .

पर मन की ज़मीन पर जो बीज पड़ चुका था, वह इतनी आसानी से कैसे मरता? ३१ मई को कविता भेजने की वह छटपटाहट 

फिर से जाग उठी। दिल ने कहा—एक आख़िरी बार और सही।

मैंने फिर से हिम्मत जुटाई, लैपटॉप निकाला और स्टोरीमिरर का पेज खोला। इस बार बहुत संभलकर एक-

एक शब्द टाइप किया। दो घंटे की कड़ी मशक़्क़त के बाद जब सब तैयार था, तो जाने कैसे फिर वही अनहोनी हो गई।

 माउस का कर्सर हिला और कविता फिर से ग़ायब!

इस बार मेरी आँखें छलछला आईं। दो घंटे की वो एकाग्रता, वो मेहनत फिर से शून्य हो चुकी थी।

 "ओह गॉडनॉट अगेन!" मेरा हृदय चीत्कार कर उठा।

क्या सच में मैं किसी लायक नहीं हूँ? क्या मुझे सपने देखने का भी अधिकार नहीं है? क्या सफलता सिर्फ कुछ खास

बुद्धिजीवियों के लिए होती है ? तभी अंतर्मन की उस थकी हुई, कड़वी आवाज़ ने फिर ताना मारा

"जब तुझे कुछ आता ही नहीं है, हर मोड़ पर तेरी गाड़ी अटक जाती है, तो इतने बड़े सपने देखती ही क्यों है? और मुझे पूरा 

यकीन है कि तू इस बार भी बैकअप लेना भूल गई होगी!"

"हे रामहाँ... मैं सच में बैकअप लेना फिर भूल गई थी।" हताश होकर मैंने अपना सिर पकड़ लिया। आँखों में छिपे आंसू अब

गालों से होते हुए फर्श पर बह रहे थे। मैंने घुटनों में सिर छुपाया और किसी हारे हुए सिपाही की तरह रोने लगी। मुझे याद

आया पिछली बार भी मैंने यही गलती की थी और खुद से वादा किया था कि आगे से कुछ भी लिखने से पहले बैकअप ज़रूर

रखूंगी।पर आज फिर वही नादानी कर बैठी .क्या सच में मेरे भीतर कोई योग्यता नहीं है? अगर ऐसा है, तो ईश्वर मेरे दिल में ये

ख्वाहिशें जगाता ही क्यों है? क्यों? क्यों? क्यों? और अगर जगाता ही है तो उसको पूरा करने की योग्यता क्यों नहीं देता ?

योग्यता भी देनी चाहिए न .

तभी, उस गहरे अंधेरे के बीच मेरे भीतर से एक और आवाज़ आई—एक बेहद शांत, ममतामयी और सुदृढ़ आवाज़

"योग्यता है, तभी तो इतनी अड़चनों के बावजूद भी तू आज भी मैदान में डटी हुई है!"

"पर ये अड़चनें सिर्फ मेरे ही रास्ते में क्यों आती हैं?" मैंने सिसकते हुए पूछा।

"इसलिए, क्योंकि यह डिजिटल युग है और तू इस भाषा से अनजान है। थोड़ा सीख लेगी, तो ये गलतियाँ नहीं होंगी।"

"पर इस उम्र में मुझे  सिखाएगा   कौन ? सबकी अपनी व्यस्तताएं हैं, अपनी जिंदगियां हैं।"

"आजकल ऑनलाइन का ज़माना है। तुझे कोई कंप्यूटर इंजीनियर तो बनना  नहीं है।

 तेरी जो भी समस्या है, उसका समाधान तू गूगल (Google) से ले सकती है, एआई (AI) से पूछ सकती है

जितनी बार चाहे, उतनी बारपर हार के डर से कोशिश करना छोड़ देना, यह तो सही नहीं है न? याद रख... कोशिश करने वा

लों की कभी हार नहीं होती।"

मेरा मन कुछ शांत हुआ. लगा जैसे  कोई  बेहद करीबी ,अत्यंत प्यारी  सहेली ने  आत्मीयता के साथ मेरे कंधे पर  हाथ रख

दिया  हो , और मुझे हिम्मत बंधा रही हो ,"प्रयास कर सफलता अवश्य मिलेगी .

 आंसू  पोछ कर मैं  लैपटॉप लेकर   दुगने उत्साह और नए संकल्प के साथ दुबारा बैठ गई । लैपटॉप खोला।
 

इस बार मैंने पैनिक होने के बजाय गूगल पर सर्च किया कि 'डिलीट हुआ टेक्स्ट वापस कैसे लाएं'। वहाँ एक छोटा सा मंत्र मिला— Ctrl + Z

मैंने कांपती उँगलियों से वे दोनों बटन दबाए... और चमत्कार हो गया! मेरी खोई हुई कविता स्क्रीन पर वापस मुस्कुरा रही थी। 

मेरी आँखों में फिर आँसू थे, पर इस बार वे राहत के थे।

 मैंने जल्दी से एक सुंदर सी तस्वीर चुनी, बैकअप लिया और धड़कते दिल से 'सेंड' का बटन दबा दिया।

कुछ ही मिनटों में मेरे इ मेल पर एक संदेश चमका: "Thank you for submitting a poem titled 'एक प्यार ऐसा' on May 31,

2026. It will be reviewed within 72  hours."

मैंने एक लंबी और राहत की सांस ली। आखिरकार, मैंने अपना पहला पड़ाव पार कर लिया था।पर वो ७२ घंटे का इंतज़ार भी

किसी इम्तिहान से कम नहीं था। मैं दिन में दस बार अपना ईमेल चेक करती, मन किसी काम में नहीं लगता था। और फिर...

वह शुभ घड़ी आ ही गई। मेरे इनबॉक्स में एक नया मेल था:

"Congratulations! Your poem titled 'Ek Pyar Aisa' written in Hindi on May 31, 2026, has been published with an editorial score of 8."

यह पढ़ते ही मेरी पलकें फिर भीग गईं, लेकिन इस बार ये आंसू बेबसी के नहीं, बल्कि असीम आनंद और गर्व के थेऔर खुद

को पा लेने की ख़ुशी के थे । मेरी मेहनत रंग लाई थी। मैंने वो मुकाम हासिल कर लिया था, जिसके सपने मैंने देखे थे।

तभी मेरे भीतर के उस सच्चे 'मित्र' ने मुस्कुराते हुए कहा—"देखा  मैंने  कहा  था न, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। 

अगर कोई गिरने के डर से चलना ही छोड़ दे, तो वो कभी दौड़ना नहीं सीख पाएगा।"

मेरा सिर अपने इस आंतरिक मित्र और उस सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से झुक गया। सचमुच, यदि हौसला अटूट हो,

तो हर ढलती हुई शाम के बाद एक 'नया सबेरा' ज़रूर आता है। 

मिर्ज़ा  अज़ीम बेग ने  कितने शायराना अंदाज़ में  इसी को लिखा है

" गिरते हैं शहसवार ही , मैदाने जंग में ,

वो  तिफ़्ल क्या गिरे, जो  घुटनो के बल चले ."



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