Diwakar Pokhriyal

Comedy Drama

4.5  

Diwakar Pokhriyal

Comedy Drama

नादान लेखक

नादान लेखक

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डी .वी ने एक स्क्रिप्ट तैयार करी और डायरेक्टर जी के घर चल पड़ा सुनाने।

डायरेक्टर - कौन है ,

डी .वी - जनाब , मैं हूँ,

डायरेक्टर - अरे , में में तो बकरी करती है। तुम कौन हो।

डी .वी - जनाब , इस बकरे। मेरा मतलब इंसान को नौकरी की तलाश है।

डायरेक्टर - तो मैं क्या करूँ।

डी,वी -(थोडा जोर देते हुए ) खून !

डायरेक्टर - (चौकते हुए) क्या ?

डी वी - जनाब मेरा मतलब है कि खून पसीना बहा कर आपके पास आया हूँ, केवल एक मौका दे दीजिए। आपको ऐसी स्क्रिप्ट लिखकर दूंगा की आप भी मान जायेंगे।

डायरेक्टर - ठीक है अगले हफ्ते आ जाना। लेकिन अगर नक़ल की तो शकल बिगाड़ दूंगा तेरी।

डी वी - जी सर बिलकुल . धन्यवाद।

फिर एक हफ्ते तक दिवाकर ने बहुत मेहनत की . वो इतनी मेहनत करता की उसको सुबह और दिन एक जैसे लगते थे ( सोता रहता था दिन तक तो एक जैसे ही लगेंगे). लेकिन फिर भी किसी तरह उसने कुछ लिखने की कोशिश की और पहुच गया डायरेक्टर साहब के पास।

डायरेक्टर - लिख ली कहानी।

डी वी - जी सर , बिलकुल ताज़ी है।

डायरेक्टर - तो फिर जल्दी सुनाइये कलाकार साहब।

(कलाकार सुनते ही दिवाकर के होटों पर एक मुस्कान आई )

डी वी - ठीक है सर सुनिए फिर -

शुरुवात में अँधेरा, एक दम घना अँधेरा, और अंधेरे से आवाज़ आई " लाइट जलाओ ". आवाज़ आते ही एक दरवाज़ा खुला !

डायरेक्टर - (थोडा आश्चर्य से बोला) तो क्या यह सब कमरे के अंदर था ?

डी वी - सर, तो क्या सड़क पर दरवाज़ा लगता है ?

हाँ तो फिर आगे सुनिए - एकदम से एक दरवाज़ा खुला और आवाज़ आई "लाइट जलाओ "। फिर कदमो की आहटें, कोई धीरे धीरे आ रहा है। जैसे ही आहट बंद हुई तो एक आवाज़ गूंजी "लाइट जलाओ "

डायरेक्टर - अरे भाई जला दे लाइट।

डी वी - ( जो पूरी तरह कहानी में डूबा हुआ था) अभी रुको सर , पूरा तो सुनो

डायरेक्टर - (बड़ी रूचि के साथ) अच्छा - अच्छा सुना आगे।

डी वी - हाँ सर सुनो

जैसे ही आहट बंद हुई तो एक आवाज़ गूंजी "लाइट जलाओ " उसके बाद पायल की छन छन दरवाज़े के बहार से आती हुई । अंदर आते ही पायल की छन छन बंद और आवाज़ आई "लाइट जलाओ". 

तभी कोई तेज़ी से भागता हुआ अंदर आया और जोर से चीखा।

डायरेक्टर - (चिल्लाया ) लाइट जलाओ?

डी वी - अरे नहीं सर , वोह चिल्लाया "फ्यूज उड़ गया"

डायरेक्टर - क्या बात है, लाइट क्यूं नहीं जलाई?

डी वी - बिल कौन भरेगा। आपको नहीं पता , आजकल बिजली महंगी है। हाँ तो अब आगे सुनिए। उसके बाद एक बच्चे की रोने की आवाज़। बेचारा बहुत देर तक रोया और फिर एक दम से चिल्लाया।

डायरेक्टर - फ्यूज क्यूं उड़ गया ?

डी वी - अरे नहीं सर , वो चिलाया "लाइट आ गयी"

डायरेक्टर - (चैन की सास लेते हुए) चलो शुक्र है लाइट तो आई।

डी वी - और तभी हमारी पिक्चर का टाइटल सामने आता है "लाइट आ गयी"

डायरेक्टर - (मुस्कुराते हुए) क्या बात है। अति सुंदर, आगे बड़ो।

डी वी - फिर दृश्य बदलता है - एक बच्चा हाथ में लाइट लिए भाग रहा है।

डायरेक्टर - (सर पर हाथ मारते हुए) कौन सी लाइट?

डी वी - इमरजेंसी लाइट। और भागते भागते वो 19 साल का हो गया।

डायरेक्टर - (पसीना पोछते हुए) इतना मत भगा यार।

डी वी - ( जो अपनी ही धुन में था) तभी उसको रास्ते में एक आदमी मिला और वो आदमी बोल "लाइट जलाओ"

डायरेक्टर - इमरजेंसी लाइट क्या?

डी वी - (थोडा गुस्से में) अरे, तो क्या डिस्को लाइट जलाएगा?

डायरेक्टर - ओह , फिर क्या हुआ।

डी वी - उसने डर के मारे लाइट नहीं जलाई और वो भागता गया .... भागता गया ... भागता गया .... और खाई में गिर गया।

डायरेक्टर - (आश्चर्य में) अरे , हीरो पहले ही मर गया? पिक्चर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी क्या?

डी वी - सुनो तो आगे। उसके खाई में गिरते ही लाइट हवा में उडने लगी।

डायरेक्टर - हैं ! अबे लाइट है या चुड़ैल का झाडू?

डी वी - अरे नहीं। लाइट हवा में उडने लगी और स्क्रीन में लिखा हुआ आया - "उषा के ट्यूबलाइट एवं बल्ब लगाए तथा अपने घरो को रोशन बनाए"

डायरेक्टर - (सर खुजलाते हुए) अरे यह क्या था !

डी वी - सर यह तो ऐड था, जो पिक्चर के टाइटल के बाद आया था।

डायरेक्टर - (हाथ जोडते हुए) आप धन्य है . आप जा सकते है। जैसे ही पिक्चर बनाने का प्लान होगा, हम आपको याद करेंगे।

एक वो दिन था और एक आज का दिन है। दिवाकर को याद तो बहुत बार किया होगा लेकिन फ़ोन नहीं किया एक बार भी। अब क्या करे जी, किस्मत अपनी अपनी।


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