Arti Shrivastava

Drama


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Arti Shrivastava

Drama


मज़ेदार

मज़ेदार

1 min 105 1 min 105

रागिनी रोज की तरह शाम को छत पर जाकर बस एक टक चन्द्रमा को देखकर वही सवाल कर रही थी, जो वह हर रोज करती थी.'' क्या करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा है।

ऐसा लगता है कि जैसे नदी के बीच में हूं, किनारा तो दिख रहा है पर किनारे पर पहुंचने के बाद क्या होगा, पता नहीं, इसलिए मैं अपने लिए कुछ भी नहीं कर पा रही हूं।"


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