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Om Prakash Gupta

Inspirational Others

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Om Prakash Gupta

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क्या खोया, क्या पाया?

क्या खोया, क्या पाया?

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-समय परिवर्तनशील है। इसके हर बदलते क्षण में मानव जीवन, अलग अलग विधाओं से अपने को जीवंतता में ढालता रहता है। कभी ऊंचाइयों की बुलंदियों में, गहराइयों की गंम्भीरताओं में, रोमांच की अंधे और तीखे मोड़ में वह नियति की तुला पर बैठ अपने भाग्य को आजमाता है और साथ साथ संतुलन का पाठ सीखना चाहता है यों कहें वह इस दशा में भी नया कीर्तिमान गढ़ना चाहता है। इस सफर में कुछ भावुक पल पीछे छूट जाते है और वह भूत के गर्भ में चले जाते है ।दूसरी तरफ उपलब्धियों को पाने कीर्तिमानों को तेजी से हासिल करने हेतु आगे बढ़ने की होड़ में भविष्य के गर्भ में पल रहे हर कंपकंपा देने वाले आयामों को अपने पक्ष में करना चाहता है । विश्रांत काल पर थोड़ा ठहर वह अंतर्द्वंद्व की स्थिति में "क्या खोया, क्या पाया?" की टीस लिए आत्ममंथन करता है। इस यात्रा में यह जीवन निश्चित रूप से कुछ खोता है और कभी अकल्पनीय वस्तु को पा जाता है। स्वभावत: यह वर्तमान में लुप्त हो रहे उन प्रजातीय गुणों और नित नये असंभाव्य विचारों के विकास के बीच अपने को न ढाल पाने की स्थिति में सोचने पर विवश होता है कि "वे पल कितने मनोहर थे" और "क्या ये जमाना आ गया है?" इत्यादि। 

      हमें लगता है कि इन बातों में एक तरफ अतीतकाल की वंचनाओ, प्रवंचनाओं, वर्जनाओं, मर्यादाओं, सीमाओं और प्रकृति से भावभरी संलग्नता के माध्यम से मिल रहे आनन्द की अव्यक्त अनुभूति, अपनापन और गहरी सहानुभूति का आकर्षण है और दूसरी तरफ वर्तमान में समान मानव अधिकार , स्वतंत्र जीवन शैली वैचारिक स्वतंत्रता, पारदर्शिता, खुलापन, वैश्वीकरण की आड़ में कहीं न कहीं नम्रता, धीरता, सहनशीलता, उदारता, संयमता, भावशून्यता, निष्कपट और निःस्वार्थ सहयोग और सहभागिता के अभाव के कारण मानव समाज में अज्ञात भय, चिंता,अनिश्चितता का भाव।

      समय ने अतीत के कतिपय अतिवादिता को देखा है , अतः उसके प्रवाह के साथ लोगों के खुले आसमां में स्वतंत्र सोच के साथ क्रांतिकारी विचार ने सर उठाया और यहां तक आ पहुंचा। अपेक्षा से अधिक विकास और जागरूकता आई, पर इसका अर्थ यह नहीं सब कुछ हासिल हो गया। वास्तविकता यह है कि हमने बहुत कुछ खोया भी। उदाहरण स्वरूप हमने लक्ष्य पाने के चक्कर में मानवीय संवेदना, वैभव के चमक में भ्रातृभावना, विलासिता में प्रकृति प्रेम, चंद निजी स्वार्थ के लिए सीमा, धनलिप्सा में अपने कर्तव्यों और कुटुम्बीय भावनाएं, अपने जीवन के आधार और भावनाओं की शीतलता से निर्मित पगडंडियों पर अतिक्रमण किया जिस पर चलकर आधुनिकता का राजमार्ग खोला गया। यह बात अच्छी है कि हम उस युग में पहुंच गये हैं कि संचार के क्षेत्र में दुनिया को मुट्ठी में कर लिया है तथा आन लाइन, ज़ूम, वेबिनार, ह्वाट्सएप मैसेज और वीडियो कालिंग के जरिये बड़ी से बड़ी दूरियों को निकटता से अनुभव करने लगे हैं। उन क्षेत्रों से साक्षात्कार करने लगे हैं जिसे कभी स्वप्न में भी न सोचा गया था।पर दूसरी तरफ देखें तो एक घर में रहने वाले लोगों में संवादहीनता,भावशून्यता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। लोग नये स्टाइल से जीवन को जीना शुरू करना चाहते हैं। विस्तारवाद की सोच ने तरह तरह के हथकंडे अपनाना शुरू कर दिया है रसायन युद्ध जैविक युद्ध के माध्यम से आंख दिखाना शुरू किया है, करोना महामारी लगभग इसी का एक उदाहरण कहा जा सकता है ।कोई कहे या न कहे, पर ये सभी कहीं न कहीं मानव समाज के एक बड़े वर्ग की आत्मा को कचोटता है।

      विकास की सम्पूर्णता इससे नहीं होती कि हमारे पास शरीर के सुख और आराम के समस्त और मनचाहे साधन हो बल्कि उससे है जो संवेदनाओं को दे, थोड़ा रुककर उस इंतजार को सोचने और मुड़कर पीछे देखने से है जो लौट न आने तक बेचैन मां के फिक्र की तरह दरवाज़े पर मुंह सटाये चिपका रहता था।

      हमने अधिक से अधिक उत्पादन के मोह में गुणवत्ता में कमी, स्वास्थ्य के जागरूकता ने चिकित्सा प्रणाली पर निर्भरता और स्वच्छता इस कदर बढ़ाई कि हम अपनी मौलिकता यानी प्रकृति से दूर हो गए, परिणाम सामने है कि शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने की तुलना में अनेक नये रोगों का जन्म हुआ। जरा सोचा जाए कि जिस तालाब के कीचड़ युक्त पानी में कमल खिलता है , सुबह के समय उसकी पंखुड़ियां ओस की बूंदों से सजतीं है और उसकी मनोहरता हमारी आंखों की ज्योति बढ़ाती है, क्या फिल्टर या आर० ओ० के डिस्टिल्ड पानी में कमल खिलकर ऐसी शोभा पा सकता है। सवाल मौलिकता का है, यह सच है कि हमको सृजन के अनुसार मौलिक बने रहने में भलाई है।

     यदि हम बचपन के दिनों की ओर लौटें तो वह जीवन कितना सरल लगता था, हम हर गोद में मां पिता की ममता की गर्माहट खोज लेते थे। अब कहने को हम बड़े हुए पर बचपन की वह निश्छलता और भाव बोध कहीं गुम हुआ पाते हैं। सच यह भी है कि अब हम उस तर्ज की मित्रता का बीज बोने का समय, उष्णता और जमीन नहीं तलाश पाते जिसमें पारस्परिक विश्वास और अपनत्व हो।

     हमें यह चिंतन करने की अत्यन्त आवश्यकता है कि इस जीवन काल में क्या क्या मिला, कौन सी उपलब्धि हमको प्राप्त हुई इसको महसूस कर हमारे चेहरे पर खुशियां जब छलकने लगे तब लगेगा ऐसा क्या है जो अपने हिस्से में नहीं आया, अपने आस पास स्वजनों का स्नेह, खूबसूरत कुदरत सुंदर किताबें सब कुछ बिखरा है पर यह दोहराने और सोचने की आवश्यकता है कि हमारे संतुष्टि का स्तर क्या है? हम अपने जीवन को किस अर्थ में तलाश रहे?

      आवश्यकता इस बात की है कि हम सभ्यता की दिशा में ऐसे आगे बढ़े कि व्यक्तित्ववाद में बीतता हुआ हमारा जीवन , समूह की चेतना में फिर से अनंत हो जाए। इसके लिए ऐसे समय की पुनर्रचना की आवश्यकता है, जिसमें बस्तर, दिल्ली और वाशिंगटन के समय में शताब्दियों का अंतर न हो।

      किसी ने सही कहा है-

      जमीनें तंग होती जा रहीं हैं और नस्ल इंसान की,

      मकान मिलते हैं शहरों में, वो आंगन नहीं मिलता।


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