Ranjeet Tiwari

Inspirational


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Ranjeet Tiwari

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कर्तव्यम -1

कर्तव्यम -1

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आज शहर के सारे अस्पताल में हड़ताल है। सारे डॉक्टर्स अपने माँगों पर अडिग है। रोगियों की हालत ख़राब है सभी लोग डॉक्टर्स को मानाने में लगे हूँ ये है। पर डॉक्टर्स ग्रुप चीफ डा मंडल का रोगियों की हालत ख़राब है। एक भर्ती रोगी हॉस्पिटल के कर्मचारी से कहता है की भाई मुझे रात से बुखार है। कर्मचारी का जवाब मैं डॉक्टर नहीं हूँ। अखबार वाले इंसानियत की बड़ी बड़ी दलीलें दे रहे है। हर अखबार मसाले लगा कर मामले को प्रदर्शित करने में लगे है। प्रेस रिपोर्टर संजय तो लग रहा है कि जनता के दुःख से द्रवित हो गए है। तभी बिपक्ष के नेता सुखराम जी की गाड़ी आती है। वे प्रेस के सामने जनता के बहूँ त बड़े मसीहा का ज़बरदस्त नाटक करते है। आँसू तो उनके आँखों के रुक ही नहीं रहे है। सांत्वना में एक ज़बरदस्त भाषण। कहना है कि जब तक हमारी मांगे पूरी न होंगी तब तक कोई डॉक्टर क्लिनिक तो दूर रुई तक नहीं छुएगा। फिर अंदर जाते है डॉक्टर्स के प्रतिनिधि से भी बात कर लेते है। प्रति निधि अपने मांगो का ब्योरा बताते है।- वेतन बढ़ाई जाये इत्यादि। सूखा राम जी यहां तो डॉक्टरों के सबसे बड़े हितैषी बन गए है। आश्वासन के साथ डटे रहो का भी निर्देश देकर चले गये। इधर सत्तापक्ष अपना राग अलाप रहा है। सभी अपनी अपनी कार्यकलाप में लगे हूँ ए है। इन सबसे दूर कुछ बच्चे जिनकी उम्र १०-१२ वर्ष है क्रिकेट खेल रहे होते हैं उसमे रवि नाम के लड़के को चोट लग जाती है। लहू बहने लगता है। बच्चे घर जा कर उसके माता पिता को बताते है। उसे ले कर हॉस्पिटल भागते है पर कोई खुला नहीं है। खून बहना जारी है। पिता डॉक्टरों से विनती करते है पर कोई उत्तर नहीं। इधर माता का हाल और ख़राब है। रो रही होती है -मोहना के लड़के की वजह से सब हूँ आ है मेरा बीटा को जबरदस्ती खेलने बुला ले गया। तभी पत्रकारों की टीम पहूँ ंच कर समाचार प्रसारित करने लगती है। बच्चे की दयनीय अवस्था पर कोई नहीं था सोचने वाला। इतने देर में एक नौजवान व्यक्ति आता है। बच्चे को देखते हूँ ए कर्मचारी को आवाज़ देता है। नौजवान - भाई कितने देर से ये लोग खड़े है?अंदर क्यो नहीं ले ग़ए ? करमचारी बताता है की डा मण्डल ने मना किया हैं। नौजवान डॉक्टर अपने केबिन में बुला के मरहम पट्टी करके दवा करता है। लड़के को आराम मिलता है। उसके माता पिता डाक्टर को दुआ दे कर चले जाते है। नौजवान डॉक्टर का नाम है डॉ सत्य कीर्ति।

 इंसानियत तो दिखाई मगर विभाग वालो को नाराज कर दिया। सारे डॉक्टर मिल कर उसे बुलाते है। डॉ मंडल -डॉ सत्यकृति आपके असहयोगात्मक रुख से हमारे आंदोलन को कितनी बड़ी छाती पहूँची है। 

 सत्यकृति - मैं माफ़ी चाहता हूँ। मगर बच्चे की जान का मामला था। 

मंडल- क्या होता एक बच्चा मर भी जाता सरकार को हमारी कीमत का पता चलता तो। लेकिन आपको क्या?

सत्य कीर्ति अवाक्, एक वरिस्ट डाक्टर की यह सोच। उसने बोला मेरा काम मरीज को ठीक करना है। हम डॉक्टर्स है पोल्टीसियन नहीं जो जिंदगीयों से सौदा करे अपना फायदा घटा देखे। रोगियों को बचाना हमारा फर्ज है। दोनों के बीच में काफी देर तक बहस चलता है। अंत में कुछ अधिकारियों के बीच बचाव से झगड़ा खत्म हो जाता है। सब कुछ सामान्य हो जाता है। इधर सत्यकीर्ति की शादी उर्मिला जो की एक आईटी इंजीनियर है तय हो जाती है। दोनों मिलते है ,प्यार के अंकुर फूटते है। दोनों का एक दूसरे के प्रीति प्रगाड़ प्रेम रहता है। शहर से दूर शेखपुर नमक गांव जो जंगल के बीच में बसा है एक खतरनाक बीमारी से ग्रसित है। इधर इलेक्शन का समय स्वस्थ मंत्री डॉक्टर भेजने का वायदा कर आते है। चुकी बड़ा वोट बैंक डॉक्टर भेजना है इसलिए।कोई भी बड़ा डॉक्टर नहीं जाना चाहता है। डॉ मंदा पहले से ही सत्यकीर्ति से चिढ़े हुए थे। उसका ही नाम दे देते है। सत्यकीर्ति जिसकी शादी २ महीने बाद होने वाली है। उर्मिला के साथ हसीं ख्वाब में डूबा हुआ है इस बात से अनजान की उसके साथ क्या होने वाला है। उसे बताया जाता है तो वो पहले चिढ़ जाता है पर बाद में जाने को बड़ी मुश्किल से तैयार होता है। उर्मिला भी उसे शेखपुरा जाने नहीं देना चाहतीं। पर वह उसे समझा कर चला जाता है। जब शेखपुरा टूटे फूटे रास्तों से पहुँचता है तो उसे सारी व्यवस्था पर नाराज़गी होती है। कहाँ शहर के आरामदायक जीवन और कहा गांव की टूटी फूटी जर्जर 

अपने कर्मचारीयों के साथ मिलकर हॉस्पिटल और कमरे की सफाई करना शुरू करता है तभी गाँव के कुछ लोग अपने सरपंच के साथ आते है और मन करने के बावजूद भी सफाई में साथ देते हैं। 

सत्यकृति -धन्यवाद। आप लोगो ने मदद की हमारी। 

सरपंच -धन्यवाद तो हमें आपका करना चाहिए कि आप हमारे लिए शहर की सुविधाओं को छोड़ कर हमारे लिए आये है। 

रात में खाने के लिए होटल इत्यादि नहीं है गांव में। हॉस्पिटल कर्मचारी बताते है। हॉस्पिटल मे कोई व्यवस्था नहीं है। सत्य कृति हॉस्पिटल छोड़कर चला जाने का सोच रहा होता है कि एक बच्चे की आवाज़ से ध्यान टूटता है। चौकीदार क्या है ? बच्चा -डाक्टर बाबु के लिए खाना है। डाक्टर बाबु तुम लोगो का खाना नहीं खाएंगे चौकीदार बोलता हैं। पर बच्चा ज़िद नहीं छोड़ता। अंततः सत्यकृति को हस्तक्षेप करना पड़ता हैं। बच्चे खाना खाने लगता है। खाते समय पूछता है तुम्हारा नाम क्या है? बच्चा -मोहन। तुम मेरे लिये खाना क्यों लाये। डॉक्टर पूछ बैठता है।

बच्चा - आप हमारे लिए उतनी दूर से आये हो हमें बीमारी से बचने के लिये ऐसा मेरी माँ ने कहा है। तो क्या हम आपको खाना नहीं खिला सकते। मैं रोज खाना लाऊंगा। 

रोज मोहन जाता है डॉक्टर से मिलता है। मोहन बताता है कि उसके पिता जी भी डेनिअ बीमारी से ग्रसित हो कर मर चुके है। माँ किसी तरह से मेहनत मजूरी करके घर चलाती हैं। सरपंच आदि लोगो से पता चलता की इस बीमारी ने गांव में काफी नुकसान किया है सत्यकृति कुछ दिनों की छुट्टी पर घर आता है। माता पिता से मिलने के बाद उर्मिला से मिलने जाता है। उर्मिला को सारी बातें बताता हैं। उर्मिला उसे इस्तीफ़ा दे कर प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए बोलती है। उसका डॉक्टर मन मना कर देता है। दोनों के बीच तन जाती है। दूसरे दिन सत्यकृति के पिता जी बताते है की उर्मिला के पापा का फ़ोन आया था कि शादी कौंसिल हो गया है। सत्यकृति टूटे दिल से गांव जाता है। वहां उसे पता चलता है कि मोहन की भी मौत डेनिअ से हो गई। सत्यकीर्ति की जिंदगी में बहुत से लोग मरे है लेकिन मोहन का हादसा उसे हिला देता हैं। मोहन की माँ को सांत्वना देने जाता है। पर उसकी चीत्कारों से द्रवित हो चुका होता हैं। रिपोर्टरों से मदद की उम्मीद करता हैं। जो रिपोर्टर्स छोटे छोटे मुद्दे को मसाला लगा कर नांचीं कर देते है। उन्हें डेनिअ के डर से गांव में आने में हिचक है। काफी प्रार्थना के बावजूद भी नहीं आते। कोई नेता नहीं आता है। मदद के लिए जूनियर डॉक्टर विशाल को भेजा गया जो बिलकुल नया था। पर एक तरफ सत्यकृति का जुनून डेनिअ ख़त्म करने का। इलाज करते करते सत्यकृति को खुद डेनिअ हो जाता है। एक दिन उर्मिला का फ़ोन २-३ बार आता है पर सत्यकृति व्यस्तता के कारण नहीं उठा पाता। मेहनत का फल बड़ा मीठा होता हैं बीमारी ठीक होने लगी है। गांव में एक के बाद एक मरीज़ ठीक होना सत्यकृति के दिन रात मेहनत का नतीजा है। सरपंच समेत गांव के लोगों के लिए वह डॉक्टर नहीं भगवान बन गया था। बस अब एक ही रोगी बच्चा हुआ था शहर से दवा भी एक ही रोगी है। सत्यकीर्ति खुद बीमार था। विशाल उससे कहता है की आप पहले खुद को देखिये क्यूकी आप ठीक रहोगे तो आने वाले सरे रोगी ठीक हो जायेंगे। सरपंच भी यही कहते है कि आप रहोगे तो जाने बचेंगी हज़ारों। एक दिन प्रातः रोगी ठीक हो चुका था गांव डेनिअ से मुक्त आज गांव एक खुशहाल हो गया था सरपंच ने समय पर समारोह मानाने की सोची। सभी लोग सत्यकृति से मिलने जाते हैं। पर क्या सत्यकृति अब इस दुनिया में नहीं रहा। उसने आपने इलाज न करके दवा रोगी को दिया। विशाल को अपनी डायरी दे दिया था कि आने वाले रोगियों का इलाज करने के लिए पर अब जरुरत नहीं थी। बीमारी ख़त्म हो चुकी थीं। गांव में सत्यकृति की बड़ी प्रतिमा बनती है जिसका अनावरण करने कलेक्टर सहित कई अधिकारी आते है उर्मिला जो की कलेक्टर की पत्नी है आज सत्यकृति की प्रतिमा के सामने नजर नहीं मिला पाती। सभी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। डॉ मण्डल आज लज्जित है आज सत्यकीर्ति को उसके कर्मो ने महान बना दिया है। 


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