खोड़ गाँव के कुँवर बलराम सिंह ठाकुर मानसिंह
खोड़ गाँव के कुँवर बलराम सिंह ठाकुर मानसिंह
( बल्लू-मान )
इतिहास साक्षी है कि जब-जब मच्छेलों ने जब्र और आतंक का सहारा लिया तब-तब क्षत्रियों ने मच्छेलों कहर का सामना किया और धर्म की रक्षा के लिए स्वयं को न्योछावर कर दिया लेकिन जो इलाक़े इसका सामना नहीं कर पाए वहाँ गाँव के गाँव सनातन धर्म को छोड़कर विधर्मी बन गए ऐसे गाँव का नियन्त्रण मूल मच्छेलों के हाथ में ही होता था ऐसी ही भौगोलिक परिस्थितियाँ हरियाणा के राजस्थान से सटे हुए दक्षिणी क्षेत्र नारनौल और उसके समीपवर्ती इलाके में भी थी कुछ गाँव राजपूत क्षत्रियों के और उनके समीप कुछ गाँव मुगलों के।
मुगल-शासन की आड़ में पशुचोरी और लूटपाट की घटनाएँ रोज़मर्रा की कहानी थी रोज़ की टकराहट और उस पर नारनौल में नवाबी का दौरमुगलों की कोशिश होती कि किसी न किसी बहाने से क्षत्रियों को नीचा दिखाया जाए।
पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही किंवदन्तियाँ बताती हैं कि सम्वत 1717 में नारनौल से लगभग 14-15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कारिया गाँव के मुगलों की एक बेटी का निकाह धरसु निवाजनगर (जिसे अब्दुल्ला नगर के नाम से भी जाना जाता है ) के एक मुस्लिम नौजवान से हुआ जो क़द-काठी और सेहत का धनी होने के साथ-साथ लड़ाका और क्रूर भी था निकाह के बाद वह रोज़ अपनी नई-नवेली दुल्हन के नाक की नथ में से तीर की नोक गुज़ारता और कहता है आसपास के गाँवों में कोई मुझ से बड़ा वीर जिसका तूने नाम सुना हो या तुम जानती हो कारिया गाँव की ये बेटी अपने शौहर के इस ज़ुल्म पर दर्द से बिलबिला उठती और डर के मारे कुछ भी न कह पाती बस काँप उठती और सहम जाती ये सिलसिला जारी रहा और धीरे-धीरे वह मानसिक तौर पर अर्धविक्षिप्त और शारीरिक तौर पर दुर्बल हो गई !!
कुछ महीने बाद जब वह अपने पीहर लौटी तो उसकी माँ ने अपनी बेटी से उसकी इस हालत का कारण पूछा रोते-रोते बेटी ने सारी कहानी बयान कर दी कि किस तरह उसका शौहर रोज़ उसकी नथ में से तीर निकालता है दामाद की करतूत और बेटी की दर्द भरी दास्तान सुनकर उसकी माँ भीतर तक हिल गई बेटी के दुख से आहत और परेशान माँ ने बहुत सोच-विचार के बाद बेटी को सलाह दी कि अगली बार उसका शौहर जब यह हरकत करे और ख़ुद से अधिक वीर और बलवान किसी व्यक्ति का नाम पूछे तो वह पड़ोस के गाँव खोड़ के पिता-पुत्र ठाकुर मान सिंह और बल्लू ( कुँवर बलराम सिंह ) का नाम लेकर यह कह देना कि यदि वो बल्लू और मान को हराकर उनकी गाय हाँक कर ले आए तो तू उसको ( अपने शौहर को ) सबसे बड़ा वीर मान लेगी!!
खोड़ गाँव कारिया से दो-अढाई कोस की दूरी पर स्थित था चौहान गोत्र के ठाकुर मान सिंह जिनके सम्बन्ध में कहा गया है उनका नाम इलाक़े में बहुत आदर से लिया जाता था किसी भी विकट संकट के समय असहाय व्यक्तियों के लिए उनके घर का दरवाज़ा खुला रहता था गायों की एक बड़ी लंगारी रखने वाले ठाकुर मान सिंह गाँव के अन्य ठाकुरों की भाँति यूँ तो किसानी ही करते थे पर तलवार चलाने का हुनर उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला था क़द-काठी भी साढ़े सात फ़ुट से कुछ उपर ही थी आसपास के गाँव में लोग उनकी शूरवीरता के क़ायल थे उनका युवा पुत्र कुँवर बलराम सिंह जिसको लोग प्यार से बल्लू कहकर पुकारते थे शारीरिक बल और बहादुरी की दृष्टि से पिता की ही प्रतिमूर्ति था !!
जब वो मुगल लड़की दोबारा अपने पीहर से ससुराल गई तो उसी रात वह सब फिर हुआ जो अब तक होता आया था उसके शौहर ने आज ज्यूँही उसकी नथ में से अपना तीर निकालकर वही सवाल पूछा तो उसने बल्लू और मानसिंह की तारीफ़ करते हुए कहा कि यदि तुम उनकी गाय हाँक लाओ तो मैं तुम्हें इलाक़े का सबसे बहादुर मर्द मान लूँगी अपनी बीवी के मुँह से निकली तानाकशी की यह बात शौहर को लग गई और वह ठाकुर मान सिंह की गायों की लंगारी को लाने की योजना बनाने में जुट गया!!
वह ठाकुर को आमने-सामने ललकार कर उसकी गाय छीनने का साहस नहीं जुटा पाया और अगले दिवस की रात्रि को उसने अपने हथियारबन्द साथियों के साथ ठाकुर मान सिंह के पशुओं के बाड़े में घुसकर गायों की लंगारी को खोला और धरसु निवाजनगर की ओर चल दिया गाँव के किसी व्यक्ति ने जब ठाकुर मानसिंह को नींद से जगाकर पूरी कहानी बयान की तो पिता और पुत्र अपनी-अपनी तलवारें लेकर घोड़ों पर सवार होकर अपनी गऊएँ छुड़ाने के लिए निकल पड़े!!
चोरों का पीछा करते-करते नारनौल के समीप पहुँचकर पिता और पुत्र का मुगलों के साथ सामना हुआ कहते हैं कि पिता और पुत्र की जोड़ी ने अनेक मुगलों को ठिकाने लगा दिया एक-एक कर जब सब मुगल पिता-पुत्र की तलवारों से कटकर गिरने लगे तो हरसू निवाजनगर से मुगलों के और जत्थे उनका मुक़ाबला करने के लिए आ पहुँचे भीषण लड़ाई हुई पर पिता और पुत्र इतने द्रुत वेग से तलवार चला रहे थे कि मुगल उनको परास्त नहीं कर पा रहे थे तब मुगलों ने छल का सहारा लिया वे जानते थे कि क्षत्रिय गऊओं पर तलवार नहीं चलाएँगे इसलिए उन्होंने गऊओं की ओट लेकर आगे-पीछेचारों तरफ़ से हमला किया गऊओं को ढाल बनाकर उन्होंने तलवारों के वार से पिता और पुत्र का सर धड़ से अलग कर दिया !!
पौ फट चुकी थी धरती पर हो रहे करिश्मे से स्वयं सूरज की आँखें चुँधिया रही थी सर कट गए थे मगर धड़ दोनों हाथों से तलवारें चला रहे थे और मुगल सैंकड़ों की संख्या में होने के बावजूद भी अब पिता और पुत्र के धड़ों के समीप आने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे जो समीप आया वो काट दिया गया भोर यह अजूबा देखती रही और दुश्मन को काटते-काटते पिता-पुत्र के धड़ अपने गाँव खोड़ की सीमा में आ पहुँचे कहा जाता है कि पिता और पुत्र के धड़ इतनी तेज़ी से तलवार चला रहे थे कि देखते ही देखते चार हाथों ने तलवारों से बारह बीघों के बीच खड़ी फ़सल और पौधे काट गिराए।
पिता और पुत्र की इस दिव्य एवम् अद्भुत जोडी के धड़ किस प्रकार शान्त हुए इस बारे में हालाँकि भिन्न-भिन्न बातें प्रचलित हैं पर एक बात निश्चित है
जब्र कै आगै झुक्या नहीं राखी क्षत्री की आन ।
सर कट्या पर धड़ लड्या वो थे बल्लू-मान ॥
दोनों के धड़ जहाँ शान्त हुए वहाँ चबूतरे बने हुए हैं आज भी खोड़ और आसपास के गाँवों के लोग इन जुझाँरों के स्थान पर आते हैं और धोक देकर आशीर्वाद पाते हैं गाँव में नवविवाहितों की प्रथम धोक भी इसी स्थान पर लगती है।

