खालीपन
खालीपन
उसे देख था मैंने, अकेली कुछ गुमनाम राहों पर।
शायद कुछ ढूंढ़ रही थी उसकी आँखें, कुछ ऐसा जो उसे कभी मिला नहीं, या यूँ कहूँ कुछ ऐसा जो उसने कभी देखा नहीं।
एक टक लगाए यूँ राहों पर वो सिर्फ देख रही थी, इतनी खामोशी सी थी उस में कि एक पल के लिए मैं उसकी ओर खींची चली गई।
पास जाकर देखा तो पता चला कि खोखली सी रूह थी, आँखों में एक नमी थी और दिल में उठता जज्बातों का एक शांत सैलाब। उसे देख में किया मानों उसके पास जा, उसे गले लगा उसके सारे गमों की खुद में समेट लूँ। अगले पल उसे गले लगाने की ख्वाहिश कुछ इस कदर जगी, कि मैंने अपने कदम बढ़ा ही लिए उसकी ओर, और पास जा कर एहसास हुआ कि उस आईने की परछाई को गले से लगाना मुमकिन ही नहीं।
