कढ़ी चावल
कढ़ी चावल
फरीदाबाद के सैक्टर 37 में खाने की कोई अच्छी जगह ढूंढ़ रहा था, दोपहर के तीन बज चुके हैं भूख से बुरा हाल है, तिराहे पर मदर डेयरी के सामने एक बहुत साफ सा दिखने वाला ई-रिक्शा टाइप खाने का स्टाॅल दिखाई दिया,शर्मा जी के राजमा चावल- कढ़ी चावल ...!
आह,60 रुपए का एक प्लेट कढ़ी चावल पूरी आत्मा को तृप्त कर गया, पेट भर गया तो शर्मा अंकल से बात करने की सूझी, अंकल पहली बार देख रहा हूं यहां, हां बेटा अभी दो दिन ही हुए हैं , ये बोलकर वो अपने काम में व्यस्त हो गए, लांच टाईम था, लोगों की भीड़ थी, मैंने भी सोचा काम करने दूं बेचारे अंकल को, जरूरत मंद है तभी इस उमर में ठेला लगाने आए हैं,
वैसे दिख अच्छे रहे हैं,गोरे चिट्टे, शरीर से फिट, खीचड़ी बाल, करीने से कंघी किए हुए, 70 के आसपास की उम्र होगी, हाथों में ग्लव्स, साफ सफाई का पूरा ख्याल, अच्छे परिवार से होंगे, किसी वजह से गरीब हो गए होंगे, इसलिए ठेला लगाने की नौबत आ गई, मैं उनके बारे में यह सब आंकड़ा वहां खड़े - खड़े लगा रहा था....!
अब तो हफ्ते में दो तीन दिन लंच वही जा कर करने लगा, दिन के हिसाब से अलग-अलग मेन्यू था, साफ सफाई भी और टेस्टी भी, इसलिए मन भी करता वहां जा कर खाने का, गौर कर रहा हूं, अंकल गरीबों से सिर्फ 10 रूपए लेते हैं, मेरी अब आते- जाते उनसे थोड़ी बहुत बात - चीत बढ़ गई थी, अंकल इतने कम पैसे लोगे तो ठेला बंद करना पड़ जाएगा, अरे बेटा तेरे जैसे लोग आते रहे खाते रहे तो कभी बंद नहीं होगा, तुम लोगों से जो कमाता हूं थोड़ा बहुत इन गरीबों पर खर्च कर लेता हूं, बाकी थोड़ा सा मेरे लिए भी बच ही जाता है, उतना काफी है मेरे लिए, ये बोलकर वो मुस्कुराने लगे, इस तरह उनके मुस्कुराने की वजह मुझे उस दिन समझ नहीं आई थी, बल्कि मैं तो कुछ और ही सोच रहा था, बड़ा दानवीर बन रहा है ये अंकल, खुद दिक्कत है तभी इस उमर में ठेला लगाया है,और बड़ी - बड़ी बाते कर रहे हैं..!
कई बार मुझ जैसे लोग जो दिखाई देता है उसी हिसाब से लोगों को तोलने लगते हैं, ये है तभी तो ऐसा कर रहा है या वैसा कर रहा है, जबकि हकीकत कई बार कुछ और ही निकलती है..!
जून का महीना आ गया था, शर्मा अंकल आज गर्मी से बहुत बेहाल है, मैंने कहा अंकल अभी गर्मी बहुत हो गई है, कुछ दिन न आओ, ना बेटा, मेरी उम्र हो गई है ये हांफना हुफना तो होता ही रहता है, लेकिन ये जो बेचारे गरीब, जितने भी थोड़े बहुत लोग मेरे भरोसे बैठे रहते हैं, उनको कैसे निराश करूं.. ।
मेरा कुटील दिमाग फिर सोचता है, अपनी जरूरत है, और जरूरत ग़रीबों की बता रहे हैं, सारी दुनिया 40 रुपए प्लेट खिला रही है और ये 60 लेते हैं ऊपर से तुर्रा ये कि मैं गरीबों को खिलाने आता हूं, हम जैसों की जेब काट कर अपनी वाह वाही करना बहुत आसान हैं, बहुत चतुर हैं शर्मा अंकल, पता नहीं क्यूं मैं उन्हें भला आदमी मानने को तैयार ही नहीं था।
आज मंगलवार है कढ़ी चावल का दिन, ऑफिस से निकलने में देर हो गई, तीन बजने वाले हैं अब तो खत्म भी हो गया होगा, पहुंचा फटाफट, मुझे देखते ही बोले, हां- हां रखा है तेरे लिए ये देख तेरा कढ़ी चावल अलग कर दिया था मैंने घबरा मत, बाकी तो सब खत्म हो गया, अब लोग ज्यादा आने लगे हैं जल्दी खत्म हो जाता है। ये बोलते-बोलते गर्मी से सांस फूल गई उनकी, अंकल आप थोड़ा बैठ जाओ, मैंने कहा और अपना खाने लगा, वो बैठे नहीं अपने बर्तन समेटने लगे....!
ज्यादा ख्याल भी कोई रखे तो शक होने लगता है, खासकर उस पर जिसे आप गरीब समझते हो, कहीं पैसे वैसे तो मांगने की मंशा नहीं रखते, हो भी सकता है, तभी आज कढ़ी चावल बचा के रखा है इस शर्मा अंकल ने, जल्दी-जल्दी खा के निकल लेता हूं, मैं यही सब दिमाग में पका रहा था कि धड़ाम से गिरने की आवाज़ आई, बर्तन टन- टन करके लुढ़क रहे हैं, देखा तो शर्मा अंकल ज़मीन पर पड़े हुए, बहुत से लोग दौड़े उन्हें उठाने, मैं भी दौड़ा , गर्मी से बेहोश हो गए हैं किसी ने कहा, पानी के छींटें मारे तो होश में आए, उनकी भलाई का असर चारों तरफ़ था, उनके लिए चितिंत लोगों के रूप में, सूर्य की चमकती किरणों की तरह फैला हुआ चारों और....!
अंकल मेरी तरफ देख बोले, बेटा दम नहीं लग रहा अपनी गाड़ी से घर छोड़ देगा, हां हां क्यों नहीं ये भी कोई पूछने वाली बात है अंकल चलो.. मैंने कहा, सामान हम ले आते हैं आप इनके साथ चले जाओ, पीछे से कई लोग बोले, लगता है, सिर्फ मुझे छोड़कर यहां खड़े लगभग सभी लोग इनके घर का पता जानते हैं, बड़ी धाक बना ली है शर्मा जी ने...! मेरी दिमागी खिचड़ी अभी भी पक रही है.!
अरे ये तो बड़ी सी कोठी में ले जा रहे हैं, देखभाल करते होंगे इस कोठी की, मैंने अंदाजा लगाया, मैं भागकर उनकी तरफ पहुंचा उन्हें उतरने में मदद करने को, मुझे पकड़ वो कार से उतरते हैं, अंदर पहुंचे, आवाज देते हैं, ज्योत्स्ना जी ज्योतस्ना जी, हां जी शर्मा जी इतनी जल्दी आ गए.. शोर क्यूं मचा रहे है आ रही हूं, अंदर से आवाज आई, अंकल मेरी तरफ देख मुस्कुराएं, मानो कह रहे हो अवस्था कोई भी हो पत्नी का एक सा ही बरताव रहता हैं
..!
आंटी आयीं, एक शांत सौम्य रूप, दूध की तरह सफ़ेद बाल, बड़ी-बड़ी आंखें, अपने जमाने में बहुत सुंदर रही होंगी, क्या हुआ... आज जल्दी आ गए ?, वो पुछतीं हैं, अंकल ने सारा हाल बता दिया कि आज गर्मी की चपेट मैं आ गया था, ये बच्चा मुझे छोड़ने आया है, सामान ले लोग आते ही होंगे..!
आंटी ने बहुत स्नेह से मेरे सर पर हाथ फेरा और बोली, बेटा यही खड़े सोचते रहोगे या अन्दर भी चलोगे, इतने प्यार से बोला गया था कि मैं ना नहीं कह सका जबकि मुझे ऑफिस के लिए लेट हो रहा था ।
जैसे ही सोफे पर बैठा दिमाग में फिर खिचड़ी पकनी शुरू, मालिक के घर को ये लोग कितना अपना समझ बैठे हैं, ऐश है दोनों की.... जिनको भी पता चला शर्मा जी बेहोश हो गए सभी हाल चाल लेने आने लगे, भीड़ लग गई, बहुत धाक जमा रखी है बुड्ढे ने, मैं मुंह - मुंह में बुदबुदाया....!
शर्मा अंकल एक सरकारी बैंक में शाखा प्रबंधक रहे हैं , 55 की उम्र में रिटायरमेंट ले लिया था, वजह पत्नी का घर पे अकेलापन, बेटी शादी कर मुंबई में रहती है, बेटा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय लंदन में प्रोफेसर है।
कमाने की कोई जरूरत नहीं बच्चे भी उन लोगों का अच्छे से ख्याल रखते हैं साथ ही अपना पेंशन तो है ही, अंकल ने बताया, तेरी आंटी को फिर से शौक हुआ, अपने किरायेदारों और पड़ोस में देखकर की मेरे पति भी काम पर जाएं, मैं सुबह उठकर सारी तैयारियां करूं, लंच बना कर दूं और उनके आने का इंतजार करूं, मैं देखता था, शर्मा अंकल अपना अलग से खाने का डब्बा निकाल कर खाते थे, मुझे सोचता ये अपने ही स्टाॅल का खाना खाने से बचते हैं पता नहीं कैसे बनाते हो, मैंने अंकल पर अभी तक शक के सिवा कुछ और नहीं किया था..!
शर्मा अंकल इतनी मेहनत क्यों कर रहे थे, मैं ये नहीं समझ पाया था, इस उम्र में उनको इतना कुछ करने की कोई जरूरत नहीं है फिर भी क्यूं इतनी मेहनत, वज़ह थी ज्योत्सना आंटी और उनकी खुशी, शर्मा अंकल उनकी खुशी के लिए कुछ भी करेंगे कुछ भी...!
अब आंटी ने शर्मा अंकल का स्टाॅल लगाना बंद करवा दिया है, वो घर से ही गरीबों को रोज दोपहर में खाना खिलाती हैं, मुझे अनुमति है मैं जब मर्जी उनके हाथ का बना कढ़ी चावल घर आ कर खा सकता हूं..!
मेरी दिमागी खिचड़ी सत्य और प्रेम की तपिश में जलकर खाक हो गई और साथ ही एक सीख मिली, जो दिखाई देता है उसी से लोगों को मत तोलो, बहुत सारी वजह होती है बहुत कुछ होने की।
समाप्त
