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Raj jha

Inspirational

4  

Raj jha

Inspirational

जड़ी -बूटी

जड़ी -बूटी

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वैद्य जी के घर पंद्रह वर्ष बाद एक पुत्री का जन्म हुआ, एक दम देवी स्वरूप, वैद्य जी ने बहुत स्नेह और प्रेम से नाम रखा "कल्याणी', कल्याणी का तेज से युक्त मुख देखकर कहते, सबका कल्याण करने आई है। दोनों पति-पत्नी बहुत प्रेम पूर्वक उसे पालने लगे...!

कल्याणी दस वर्ष की हो गई है, बहुत चंचल स्वभाव, हरदम पिता के साथ रहती, जड़ी बूटियों के विषय में समझती, कई बार तो जड़ी बूटियों का ऐसा असरदार मिश्रण बना डालती की उसके पिता भी चौंक जाते, कल्याणी में वो सभी संकेत दिख रहे हैं जो उसे अपने पिता की विरासत को भविष्य में आगे बढ़ाने में मददगार होंगे, दोनों बहुत खुले वातावरण में बेटी को पाल रहे हैं, जो जमाना था उसमें बेटी को इस तरह पालने का कोई सोच भी नहीं सकता, आसपास थोड़ी बहुत निंदा भी चलती किन्तु वैद्य जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण बातें दबी ही रहती, इस खुलेपन और पिता के विश्वास की शक्ति के कारण कल्याणी अलग ही मिट्टी की बनती जा रही है, पिता कल्याणी को कुछ दिन के लिए अपने गुरु आचार्य नरेन्द्र देव के आश्रम हरिद्वार में आयुर्वेद की विधिवत शिक्षा के लिए भेजना चाहते हैं, उन्होंने सब तैयारी कर ली है, 'अगले सोम तक कल्याणी की मां बेटी को जितना लाड करना है कर लो.. फिर एक साल तक न मिलेगी...!

तभी बाहर से किसी के पुकारने की आवाज आई... बगल के गांव से वैद्य जी को बुलावा आया, चलिए आपकी बहुत आवश्यकता है, आप चलें तो शायद उसके प्राण बच जाएं, वैद्य जी कर्तव्य परायण व्यक्ति, चल पड़े, सही समय पर पहुंचकर उसकी जान बचा ली, सब करते कराते रात घिर आई, बोले चलते हैं, कुछ समस्या हो तो बुलवा लीजिएगा, बीमार के परिजनों पूछा किस प्रकार आपकी सेवा कि जाए, मैं मांगता नहीं आपकी खुशी है, मवेशियों वाला घर था, एक सेर ताजा रबड़ी मिट्टी के भगोने में डालकर वैध जी को थमा दिया.... वैद्य ये ले जाइए बिटिया को हमारी तरफ से खिला दीजिएगा, प्रसन्न होकर उन्होंने भगोना पकड़ लिया, कल्याणी को रबड़ी बहुत पसंद है, आज वो बहुत खुश हो जाएगी, सबने पूछा वैद्य जी जाएंगे कैसे, इस समय कोई गाड़ी घोड़ा तो मिलने से रहा, वैद्य जी बोले हां यह समस्या तो है, एक नवयुवक खड़ा हुआ, हम अपनी साइकल से छोड़ आते हैं, पाचें कोस तो है, वैद्य जी साइकल के पीछे कैरियर पर बैठ गए, कंधे में जड़ी बूटी वाला झोला, दोनों हाथों से रबड़ी का भगोना पकड़े हुए, कद में लंबे थे तो पैर बार सड़क से टकरा जाता, अजीब परिस्थितियों में बैठे हुए किसी तरह पांच कोस कट जाए यही सोच रहे थे, अपने आपको व्यवस्थित करने को हिलते डुलते तो, साइकल लड़खड़ा जाती,तब नवयुवक तपाक से पूछता, वैद्य जी आप ठीक तो हैं?, हां ठीक हूं तुम चलाते रहो, उनके पास पंख होते तो उड़ कर कल्याणी के पास पहुंच जाते, रबड़ी देखकर उसके मुख पर कितनी सुन्दर मुस्कान तैर जाएगी, एक तरफ झुकती रबड़ी के भगोने को सम्हालते हैं, हल्की चांदनी वाली गर्म रात, काली तारकोल वाली सड़क से गर्मी का भभका उठ रहा है, बैठने में असहजता महसूस कर एक बार और हिले, साइकल लड़खड़ायी, लड़खड़ाते हुए सड़क के किनारे तक चली गई, सड़क की गर्मी को सोखते काले विशाल नागराज पर पिछला पहिया चढ़ बैठा, क्रुद्ध नागराज ने अपने स्वभाव के अनुरूप सारा ज़हर वैद्य जी के दाहिने पैर में उड़ेल दिया... वैद्य जी चीत्कार कर उठे, डस लिया-डस लिया, साइकल एक तरफ गिरी स्वयं दूसरी तरफ गिरे, रबड़ी का बर्तन सड़क पर गिरकर तार तार हो गया, काली सड़क सफेद हो गई, वैद्य जी युवक से कहते हैं, बेटा जल्दी मेरे घर जा और मेरी बेटी कल्याणी से सांप काटे की दवाई ले कर जल्दी से आजा....!

युवक और कल्याणी कुछ देर बाद लौटे, कल्याणी दौड़ कर पिता के समीप पहुंची, नाड़ी चल रही है, दिल की धड़कन सौ गुने वेग से चल रही है, बाबा - बाबा, वो उनको जोर से हिलाती है.. बाबा मुंह खोलो, ये खा लो... वैद्य जी हल्की सी आंख खोलते हैं, मद्धम चांदनी में आखिरी बार अपनी प्राणों से भी प्रिय कल्याणी को देखते हैं, टूटती सांसों को सम्भालकर कहते हैं.... तुम्हारे लिए रबड़ी............!

सांसों ने सभी बंधनों को तोड़ दिया....बेटी का पिता के लिए भयंकर रूदन सुन किसी का भी कलेजा फट जाए...युवक तो मानो काठ का हो गया.....!

पिताजी के साथ-साथ कल्याणी के अच्छे दिन भी चले गए, सोलह पार कर चुकी है, घर पुश्तैनी जायदाद से ठीक ठाक चल जाता है, लेकिन अब बड़ी समस्या उसके ब्याह की है, मां के सीने पर उसका बिन ब्याह का जीवन, हर एक बढ़ते दिन के साथ मनो भारी होता जा रहा है, कौन इस से ब्याह करेगा यह चिंता उन्हें गलाए जा रही है, कल्याणी के विवाह न होने का कारण उसका रुप सौंदर्य न था, उसमें तो कोई खोट निकाल ही नहीं सकता, कारण है उसके दामन पर लगा वो दाग जो दो वर्ष पूर्व उसके हम उम्र महेश के साथ उसके देखे जाने पर लगा था...!

महेश जो कि वैद्य जी को गुरु मान जड़ी बूटी का ज्ञान लेने कल्याणी के घर आता जाता रहता, उनके स्वर्गवासी होने के उपरांत भी महेश परिवार की मदद करने आता रहता, दोनों बच्चे भी आपस में हिल - मिल ग‌ए थे, साथ-साथ मिलकर जड़ी बूटियों के लिए जंगल झाड़ में खोज में लगे रहते, दोनों यह नहीं समझ पाए कब बचपन छूट गया, और अब ऐसी उमर में पहुंच ग‌ए हैं कि साथ देखने पर लोग कुछ भी बात उड़ा सकते हैं, एक बार चरित्र पर उंगली उठ जाए तो स्त्री पृथ्वी में समा कर भी स्वयं को निर्दोष साबित नहीं कर पाती... मां तो दुनिया समझती हैं, वो एक अनजाने डर से डर कर कल्याणी को महेश से दूर रहने को कहती, मन में पाप हो तब ना पाप से बचा जाए....!

कल्याणी तो केवल महेश की सहायता से अपने पिता का नाम रौशन करना चाहती है, एक बड़ा वैद्य बनना चाहती है, इसके सिवा और कोई धुन न था उसके मन मस्तिष्क में, इसके लिए वो दिन रात मेहनत करके अपनी दवाइयों का कोष बढ़ा रही थी, लेकिन दुर्भाग्य शोर मचाते हुए तो नहीं आता...., एक दिन कांटेदार झाड़ी के पास से गुजरते हुए कल्याणी की चुन्नी उन झंडियों में फंस गई वो उसे निकालने को और अंदर घुसी तो शरीर के ऊपरी वस्त्र यहां वहां से खिच फट ग‌ए, महेश ने देखा तो भाग कर उसके पास आया और कल्याणी की मदद करने लगा...तभी वहां लखना आ गया, जंगल में आया था लकड़ी काटने.... स्वभाव से दुष्ट... तो ये खेल हो रहा है... महेश चौंककर देखता है, और पुछता है, कैसा खेल.... यही वैद्य की लौंडिया को झाड़ी में ले जाकर जो खेल खेला जा रहा है...लखना ज़बान संभाल कर बोल.. अभी तेरी कुल्हाड़ी से तेरा दिमाग ठीक कर दूंगा....मेरा दिमाग तो तब ठीक होगा जब हमें भी इस प्यार मोहब्बत में शामिल करो, वैसे भी वैद्य की लौंडिया पर बहुत दिनों से नजरें टिकाए हूं, आज जाकर मौका मिला है..अब तक कल्याणी अपनी चुन्नी निकाल चुकी थी... दहाड़ उठी..भागता है कि नहीं यहां से.. गांव भर में बदनाम है और मुझपर कीचड़ उछाल रहा है... लेकिन वो ढीठ अवसर समझ महेश से उलझता रहा, क्रोध के अतिरेक में बात हाथा पाई तक जा पहुंची...लखना जब जीत न सका तो गांव की ओर हल्ला करते हुए भागा.....सुनो भाइयों जंगल झाड़ मौज की जगह हो गई है, वैद्य की बेटी महेश के संग जंगल में मुंह काला कर रही है, हम रोकें तो हम से ही लड़ पड़े, ऐसी बातें आग की तरह फैलती है, सब अपनी-अपनी तरह से इसमें सहयोग देने लगे... अरे उस दिन दोनों को उस पेड़ के नीचे देखा, अरे एक दिन नदी किनारे बड़े पत्थर के पीछे देखा ... हां एक दिन तो मैंने दोनों को एक-दूसरे संग लिपटे देखा था....घोर कलयुग है घोर कलयुग...!

रात खिड़की के पास कुछ आहट सी हुई, कल्याणी चौंक जाती है, बाहर से मद्धम सी आवाज आती है.. कल्याणी - कल्याणी.. खिड़की खोलो...कककौन है....? मैं हूँ महेश... कल्याणी खिड़की का पल्ला खोल देती है.. तुम यहां क्या कर रहे हो....सुनो कल्याणी मैं गुरूजी के आश्रम हरिद्वार जा रहा हूं, तुम भी चलोगी....? मैं भी चलूं?(अपने आप से पूछती है) लेकिन मैं गई तो मां मर ही जाएगी, सबका लगाया लांक्षन सही हो जाएगा, तुम जाओ महेश, एक पुरुष और एक स्त्री की दुनिया में बहुत अंतर होता है, तुम जा सकते हो जाओ...मेरा नसीब इतना अच्छा नहीं... महेश चला गया..... कल्याणी को लगा, मानो जीवन का बहुत सुंदर अध्याय समाप्त हो गया हो...पल्ले की ओट से महेश को जाते देखती रही, जब तक वो दिखाई देता रहा...!

कल्याणी की मां आत्मग्लानि में धस सी गई हैं, सब उनके पालन पोषण पर उंगली उठाते हैं, पूरे गांव को एक ऐसा विषय मिल गया है जो कि कोई भूलना ही नहीं चाहता, कल्याणी का घर से बाहर आना जाना सब बंद है, लेकिन मां कहीं न कहीं अपनी बेटी को जानती है, वो उसे बाहर जाने से इसलिए रोकती है कि बेटी को व्यर्थ के ताने न सुनने पड़े.....!

बगल में रहने वाले रामदीन का दस वर्षीय बेटा श्यामू महिने भर से एक न छूटने वाले ज्वर से पीड़ित है, देशी विदेशी सब तरह का इलाज करवा लिया, किन्तु सुधार का कोई लक्षण नहीं, परिवार मृत्यु को अटल सत्य मान कर श्यामू के जाने का इंतजार करने लगे, कल्याणी को यह बात पता थी, पर मां जरा भी घर से बाहर जाने देने को तैयार न होती, बहुत मान मनौव्वल और यह कहने पर की मैं उस बच्चे की जान बचा सकती हूं, मां जाने दो.... मां ने बेमन से कहा ठीक है... कल्याणी ने अपने पिता के थैले में से एक पोटली निकाली और रामदीन के घर की ओर चल पड़ी.... उसने न दाएं देखा न बाएं.. श्यामू की मां से कहा एक गिलास पानी दो, बूटियों को उसमें मिलाया और कहा... ये घोल रात भर थोड़ा-थोड़ा इसे पिलाओ, अगले पंद्रह दिन तक यही करना है ठीक हो जाएगा, पंद्रह दिन की दवाई सुबह आकर ले लेना... जैसे गई थी वैसे ही बिना दाएं बांए देखे वापिस आ गई...!

श्यामू की जान बच ग‌ई, इस बीच बहुत मुश्किल से एक वर मिला है कल्याणी के लिए...लड़का विधुर है लेकिन कोई संतान नहीं है..चार भाइयों में सबसे छोटा, सब साथ ही हैं, घर परिवार खाता पिता है, किसी तरह की कोई कमी नहीं है, मां ने सोचा अभागी का इस से अच्छा और क्या भाग होगा.. ब्याह हो गया..!

चरित्र पर लगे लांछन के कुछ छींटे ससुराल तक भी पहुंचे हुए थे, जब तब गाहे बगाहे ताने के रूप में उसको याद दिला दिया जाता, पति शेखर अपने भाइयों में इतना ढुला था कि पत्नी के कष्टों पर उसका कभी ध्यान ही नहीं गया, पांच वर्ष हो गए अब तक कोई संतान नहीं, बांझ होने का बोझ भी सिर पर आ गया, परिवार में यह सुगबुगाहट होने लगी कि शेखर को एक और शादी कर लेनी चाहिए, संतान सुख बहुत बड़ा सुख है, शेखर इस सुख से क्यूं वंचित रहे, विवाह के लिए गरीब कन्या ढूंढा जाने लगा....!

कल्याणी सब देख सुन रही है, वो भी शेखर के प्रति खुद में कोई मोह न ढूंढ पाती, व्यर्थ के सांसारिक मोह में फंसी हुई है, अन्तर‌आत्मा ने कहा, मन के कहीं किसी कोने में आज भी वैद्य बनने की अभिलाषा टिमटिमा रही है, क्यों न इस अभिलाषा को मूर्त रूप दिया जाए, सब सोच लिया उसने, क्या केवल सिद्धार्थ ही अपनी पत्नी बच्चे को छोड़कर महात्मा बुद्ध बनने जा सकते हैं, क्या वैराग्य पुरुषों का ही आभूषण है, घर छोड़ने पर पुरुष महात्मा कहलाए और स्त्री चरित्रहीन, कुलटा और न जाने क्या-क्या, कोई कुछ भी बोले सोचे..अब और नहीं...!

कल्याणी एक जोड़ी साड़ी लेकर रात के अंधेरे में ससुराल से निकल पड़ी, अपने लिए बोधिवृक्ष की खोज में...!

पहले मां से मिलेगी, पिता का वो झोला लेगी... और चली जाएगी आचार्य जी के यहां... महेश भी तो वहीं है? आसमान में टिमटिमाते तारे कल्याणी के निर्णय का टिमटिमा कर स्वागत कर रहे हैं और चंदा मामा तो उसके साथ ही चल रहे हैं....!

मां ने सब समझा जाना और अपना पूर्ण समर्थन दिया, बेटी ने बहुत सह लिया, अब और नहीं.... जाकर श्यामू को उठाती हैं, जा बेटा कल्याणी दीदी को स्टेशन छोड़ आ... दीदी आई है... श्यामू ने खुश होकर कहा.. हां बेटा दीदी आई है जा स्टेशन छोड़ आ.....।

श्यामू हो सके तो मां का ख्याल रखना... चिंता मत करो दीदी, मेरा जीवन आपकी ही दी हुई है, आपके कुछ काम आ पाऊं, इस से अच्छा क्या होगा.... कल्याणी स्नेह से उसके सिर को छूती है...!

ट्रेन आ गई, अब तू जा गाड़ी भी आ गई है...! कब का अच्छा किया कब फल के रूप में मिलता है, खिड़की के पास वाली सीट मिल गई, ठंडी हवा के झोंके ने सुखद निंद्रा का उपहार दिया... कल्याणी ने एक रात में सब बदल दिया, लोक लाज के बंधनों को तोड़ दिया, बांझ होने की बेड़ियां को काट डाला, अब तक वो भटक रही थी सांसारिक जीवन उसके लिए नहीं था, काश उस रात महेश के साथ जाने की हिम्मत जुटा पाती....!

आश्रम में कल्याणी का बहुत जोरदार स्वागत हुआ...! आचार्य जी स्वयं उस से मिलने आए, कल्याणी ने उन्हें प्रणाम किया..... उन्होंने आशीर्वाद दिया..जग का कल्याण करो.. आगे कहते हैं, कल्याणी अब तक तुम कहां खोई हुई थी, हम कबसे तुम्हारी प्रतीक्षा में थे, तुम्हारे पिता जब जीवित थे तो अक्सर पत्रों में तुम्हारे विषय में लिखते, आयुर्वेद के तुम्हारे विलक्षण ज्ञान के विषय में बताते, मैं भी चकित रह जाता... उनके आकस्मिक निधन ने बहुत क्षति की तुम्हारी भी, हमारी भी और इस समाज की भी, वो होते तो तुम यहां तक पहुंचने में इतने वर्ष न लगातीं, चलो अब तो आ ग‌ई हो, आज आराम करो कल से तुम्हारी विधिवत शिक्षा प्रारंभ होगी.... आचार्य एक सुर में इतना सब बोल कर.. कल्याणी को आशीर्वाद देते हुए, बहुत प्रसन्न भाव में वहां से चले गए...... थोड़ी देर बाद महेश भी मिलने आया दोनों ने पुराने दिनों को याद किया खुब हंसे खिलखिलाए..!

बाबा आए हैं, बहुत प्रसन्न हैं, उनके हाथ में एक मिट्टी का बर्तन है, कल्याणी देखो क्या लाया हूं। क्या लाए हैं बाबा ? उठो तो देखो न रबड़ी लाया हूं अपनी बिटिया के लिए..... रबड़ी.......!

कल्याणी की नींद खुल जाती है, इतने सालों में पहली बार बाबा स्वप्न में आए, शायद बाबा मेरे लिए निर्णय से प्रसन्न हैं....।


एक सुकून मिलता है कल्याणी को, अब उसके जीवन में एक सही उद्देश्य है ।

समाप्त



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