Sharad Kokas

Fantasy


2.7  

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काउंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा

काउंटर के पीछे मुस्कुराता चेहरा

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महानगर की चकाचौंध, दुकानों में सजी खूबसूरत और कीमती वस्तुएँ, काँच के शो केसों से झाँकती काली-गोरी पुतलियाँ, सड़कों पर फर्राटे से दौड़ती नई नई डिज़ाइनों की मोटरगाड़ियाँ और रंगबिरंगें परिधानों में तितलियों की तरह इठलाती कॉलेज जाती लड़कियाँ, सब कुछ नज़र अंदाज करता हुआ वह बैंक की उस इमारत में घुस गया। इमारत के भीतर पढ़े-लिखे लोगों की भीड़ थी, सुन्दर फर्श पर बने काँच के चमचमाते हुए काउंटर थे, काउंटर के पीछे मुस्कराते हुए कुछ  चेहरे थे।

 यह एक ऐसी हसीन दुनिया थी जिसे देखकर अन्दाज़ ही नहीं लगाया जा सकता था कि इन ऊँची ऊँची इमारतों के पीछे बदहाली से भरी कोई दुनिया भी हो सकती है। फिर इन शहरों  से दूर गाँवों की ज़िन्दगी की कल्पना करना तो और भी मुश्किल। वैसे भी शहरवाले गाँवों की ज़िन्दगी फिल्मों में देखते थे और यह सोचकर खुश होते थे कि कभी समय मिला तो पिकनिक मनाने गाँव जाएंगें। हाँ इन लोगों से इतर कुछ लोग और थे शहरों में जिन्हे रोज़ी-रोटी की ज़रूरत शहर ले आई थी। उनकी जड़ें अब भी गाँवों में थीं और वे अपने तीज-त्योहारों में बार बार जड़ों की ओर लौटते थे।

 'मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूँ' लिखे हुए काउंटर के सामने जा कर वह खड़ा हो गया। उसने अपने हाथों का पसीना काउंटर के सफेद सनमाइका से पोछा फिर आसपास देखकर झेंपते  हुए अपनी हथेली को अपनी पैंट पर रगड़ा और काउंटर पर काम कर रही लड़की से कहा ..'जी सुनिए।'

 लड़की कुछ लिखने में मशगूल थी। लड़के की आवाज़ सुनकर उसने अपनी नज़रें उठाई और जैसा कि उसे प्रशिक्षण दिया गया था अपने होठों पर मोनालिसा की तस्वीर सी रहस्यमयी मुस्कान लाकर उसने कहा 'जी ..कहिए'

 लड़के ने उसकी ओर देखकर पूछा 'जी ..मेरी एम.टी .आई?' आपकी एम.टी? खाता नंबर बताईये' लड़की ने नपे तुले स्वर में जबाब दिया। उसके चेहरे पर इस बात की कोई शिकन नहीं थी कि लड़के ने पहले अपना खाता नम्बर क्यों नहीं बताया।

 'जी मेरा नंबर ... यह लीजिए ..' इतना कहकर लड़के ने अपनी जेब से एक तुड़ी मुड़ी पासबुक निकाली और लड़की के हाथों मे थमा दी।

 'आफ्फोह! कितने गंदे तरीके से रखते हैं आप पासबुक! पासबुक शर्ट की जेब में रखा कीजिए, पैंट की जेब में मुड़ जाती है, मुड़ी हुई पासबुक हमारा प्रिंटर नहीं लेता है।' लड़की के स्वर में शिकायत थी या नाराज़गी कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था।

  'जी... वो ....... साइकल चलाने में .... मुड़ गई।' लड़के ने सफाई देनी चाही।

  लड़की ने इस बात पर ध्यान न देते हुए कम्प्यूटर के की बोर्ड की बटनों पर उंगलियाँ चलाई और स्क्रीन पर देखकर कहा 'सॉरी..... आपकी तो कोई एम.टी . नही आई।

 'नहीं आई' लड़का हताश स्वर में बोला।

'कहाँ से आने वाली थी?' लड़की ने उसके चेहरे पर उसकी ज़रुरत को पढ़ते हुए पूछा।

'जी गाँव से... मेरा मतलब मेरे गाँव के पास के बैंक से भेजी होगी मेरे पिताजी ने। क्या मालूम क्यों नहीं आई।' लड़के ने जबाब दिया।

लड़की उसकी परेशानी समझ रही थी। लड़के के ठीक से उत्तर न देने के बावजूद वह नाराज़ नहीं हुई। उसने फिर पूछा' आपके गाँव के निकट हमारे बैंक की कौन सी ब्रांच हैं?

 लड़का अपनी गलती समझ गया था, तपाक से बोला ..जी आपकी खैरी ब्रांच से भेजते हैं पिताजी।

'अच्छा अच्छा' लड़की ने उससे कहा' ऐसा कीजिए आप कल और आकर पता लगा लीजिए .. शायद कल तक आ जाए।

 अपने कदमों को लाश की तरह घसीटते हुए वह बाहर निकल आया। भूख के कारण उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। उसने सोचा होटल पहुँचकर पहले खाना खा लिया जाए लेकिन रोटियों के साथ होटल के मालिक द्वारा परोसे जाने वाले उधार के तकाज़े से वह खौफ खाने लगा था। इस खौफ के साथ वह वैसे भी ठीक से खाना नहीं खा पाता था। पिंजरे में बंद तोते में बसी राक्षस की जान की तरह उसकी जान भी होटल मालिक के हाथ में थी। वह जब चाहता तब उसे भूखों मरने पर मजबूर कर सकता था। 'चलो खाने के बारे में शाम को सोचेंगे' उसने सोचा और कॉलेज जाकर क्लासेस अटेंड करने के बारे में विचार किया।

           'होटल न सही कॉलेज तो जाया ही जा सकता है शायद कॉलेज की कैंटीन में कोई मित्र मिल जाए और कुछ दया कर दे' उसने सोचा। वैसे भी अपने एक करीबी मित्र से कुछ पैसे लेकर काँलेज की फीस तो जमा कर दी थी हालाँकि उसके मित्र ने खुद को दानवीर कर्ण घोषित करते हुए इस बात को जगजाहिर करने मे कोई कसर बाकी नहीं रखी थी कि उसने आड़े वक़्त में उसकी मदद की है। फलस्वरुप कॉलेज परिसर में एकाध बार उसे' बेचारा ग़रीब देहाती' जैसे जुमले भी सुनने को मिल चुके थे।

           यह तीन शब्द उसे तीन गालियों की तरह लगे थे। कहने वाले भी इस बात को नहीं जानते थे कि ये तीनो शब्द दरअसल एक दूसरे के पर्यायवाची ही तो हैं, इन्हे अलग अलग कहने की ज़रूरत क्या है।  

            लेकिन यह शब्द सुनकर उसे अपने उस तथाकथित मित्र पर बहुत क्रोध आया था और उसने सोच लिया था कि जैसे ही बैंक में उसके पिता द्वारा भेजा हुआ पैसा आएगा वह उसे मित्र के मुँह पर दे मारेगा और उससे कहेगा लो रखो अपना पैसा और उन नोटों से देश के गरीब बेचारे देहातियों के लिये बहनेवाले अपने आँसुओं को पोछ लो।

              बैंक से निकलने और यह सब सोचने में इतनी देर हो चुकी थी कि कॉलेज जाने का खयाल भी अब तक उसके दिमाग से उड़ चुका था। वह कमरे पर पहुँचकर कुछ  पढ़ने-लिखने के बारे में विचार करने लगा लेकिन वहाँ भी कहाँ चैन था। दो माह से कमरे का किराया नहीं दे पाया था वह। मकान मालिक जो एक सरकारी दफ्तर में बाबू था रोज शाम शराब के नशे में उसे गालियाँ देता, निकाल बाहर करने की धमकी देता और सुबह होते ही उसका चरित्र प्रमाण पत्र उसे थमा देता।

           'वह तो यह कि तुम अच्छे भले घर के लड़के हो और तुम्हारे पिताजी से मेरे ससुरजी की पहचान है वरना कोई और होता तो मैं कबका उसे सामान सहित घर से बाहर सड़क पर फेंक देता।

            उसे डर था यदि किसी दिन सुबह तक मकान मालिक का नशा नहीं उतरा तो वह सचमुच भले घर के लड़के की बजाय' कोई और' हो जाएगा। इस परेशानी से बचने के लिये वह अक्सर देर रात कमरे पर पहुँचने लगा था। शाम तक वह लायब्रेरी में बैठा रहता फिर होटेल से खाना खाकर ही कमरे पर पहुँचता।   

            उसे अचानक अपने भले घर का लड़का होने पर रंज होने लगा। ग्लानि का ढेर सारा झाग उसके दिमाग में भर गया ..क्यों उसने गाँव के अन्य कृषक-पुत्रों की भांति अपने बाप के साथ खेती–किसानी के काम में हाथ बँटाने का निर्णय नहीं लिया। क्यों वह अपने गाँव की शाला के उस प्रधान अध्यापक के बहकावे में आ गया जो बार बार उससे कहते थे... ये हल बैल तुम्हारे लिये नहीं बने है। तुम बुध्दिमान हो, मेहनती हो, शहर जाकर उच्च  शिक्षा प्राप्त करो, देश के भविष्य बनो, कर्णधार बनो, तुम्हें इतने अच्छे नम्बर मिले हैं तो क्या खेत में हल चलाने के लिये ......वगैरह वगैरह।

 

           'स्साला दो कौड़ी का मास्टर' उसे अपने गाँव के प्रधान अध्यापक पर भी गुस्सा आने लगा।'खुद तो गाँव में मास्टरी कर रहा है और मुझसे कहता कर्णधार बनो। देश का भविष्य लादने के लिये उसे मेरे ही कंधे मिले थे। और बापू को क्या हुआ था? उसके क्रोध की जद में उसका बाप भी आने लगा था'बड़ा आया मेरा बाप। पता नहीं कैसे मास्टर के बहकावे में आ गया। उसके दिमाग में भी लगता है मुझे बड़ा आदमी बनता देखने का कीड़ा कुलबुला रहा था।'

 

            शाम को भी वह डर के मारे होटल नहीं गया। उसने सोचा अबकी बार  पैसे आयेंगे तो कमरे पर ही कुछ पकाने का जुगाड़ कर लेगा।वैसे पिछली बार शौक शौक में घर से वह पकाने के लिये कुछ आवश्यक बर्तन लेता ही आया था।  

            रोटी की जगह शाम को मकान मालिक की गालियाँ खाकर वह रात भर अगले दिन की चिंता में जागता रहा।उसे यकीन था कि अगले दिन तो एम टी आ ही जाएगी।

 

            जैसे ही सुबह हुई वह भीड़ का जंगल पार कर फिर उसी मुस्कराते हुए चेहरे के सामने जा खड़ा हुआ। लड़की ने उसकी ओर देखा और मुस्कराते हुए पूछा ..'आपका खाता नंबर बताइये।'

            उसने जेब से पासबुक निकाली। आज वह यथासंभव ठीक तरह से पासबुक लेकर आया था। पासबुक पर पड़ी सलवटें उसने धीरे से ठीक करते हुए पासबुक लड़की के हाथों में थमा दी।

            लड़की ने उसे पासबुक की सलवटें ठीक करते देखा तो वह मुस्कुराई। फिर उसने पहले दिन वाली प्रक्रिया दोहराई और उसी तरह मुस्कुराते हुए  कहा ...'साँरी आज भी आपकी एम . टी . नही आई।'

           'आज भी नहीं आई' उसने आश्चर्य से लड़की की ओर देखा। उसे समझ में नहीं आ रहा था आखिर ऐसा कहते हुए वह मुस्करा क्यों रही थी। उसने सोचा कहीं वह मजाक तो नहीं कर रही है। उसने संदेह उपस्थित करते हुए पूछा 'एक बार ठीक तरह से तो देखिए।'

            लड़की ने फिर एक बार अपनी नज़र कम्प्यूटर के स्क्रीन  पर डाली और कहा' ठीक से देख चुकी हूँ.. सचमुच आपकी एम.टी. नहीं आई।'

 

            निराश होकर वह वापस लौटने लगा। वह मुड़ा ही था कि अचानक उसने महसूस किया कि लड़की उसे बुला रही है ....'  सुनिए।'

           ' जी कहिए।' वह पलटकर बोला। उसे इस बात का बिलकुल गुमान नहीं था कि उनकी पिछले दिन की बातचीत ठीक इन्ही शब्दों के साथ शुरु हुई थी। फर्क केवल इतना था कि जो शब्द लड़के ने कहे थे वे लड़की ने कहे थे और जो शब्द लड़की ने कहे थे वे लड़के ने कहे थे।

 

           ' आप काँलेज में पढ़ते हैं? लड़की ने पूछा'

           ' जी हाँ' लड़के ने जबाब दिया।

           ' कौन से काँलेज में? लड़की ने पूछा।

           ' जी इंस्टीयूट आफ टेक्नालॉजी में। लड़के ने जबाब दिया।

           ' ओह तो आप इंजिनियरिंग कर रहे हैं। लड़की ने कहा।' होस्टल में रहते  होंगे? '

           ' नहीं इस साल लेट हो गया था सो सीट फुल हो गई थी। प्राइवेट रुम लेकर रह रहा हूँ  यहीं पास के मोहल्ले में। लड़के ने बताया।

           ' किस गाँव के रहने वाले हैं।' लड़के ने सवाल किया।

 

            फिर लड़के ने अपने गाँव का नाम बताया,  लड़की ने अपने मौहल्ले का। लड़की ने यह भी बताया कि कैसे उसे मैट्रिक करते ही नौकरी मिल गई। लड़के ने बधाई दी। लड़की ने यह भी बताया कि वह भी इंजिनियरिंग करना चाहती थी लेकिन बैंक की एग्जाम में पास हो जाने और इंटरव्यू में सफल हो जाने के कारण उसने बैंक ज्वाइन कर लिया और यह भी कि शायद यह नौकरी छोड़ दे। लड़के ने उसे मना किया यह कहकर  कि नौकरी बहुत भाग्यवालों को मिलती है और लगी लगाई नौकरी छोड़ने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। और फिर लड़के ने अपनी परिस्थितियाँ बताई। यह भी बताया कि उसने कल से कुछ खाया नहीं है। यह सब संवाद उतनी देर में ही सम्पन्न हुआ जितनी देर अगला ग्राहक नहीं आया। अगले ग्राहक के आते ही लड़की अपनी उसी मुस्कान के साथ उसे इंटरटेन करने में मशगूल हो गई।

 

            लड़का कुछ देर तक तो खड़ा रहा फिर कुछ देर पश्चात लड़के को यह ख्याल आया कि जिस काम के लिये वह आया था  वह तो हुआ नहीं, अब इस व्यर्थ की बातचीत में क्या लाभ। उसने सौजन्यवश कहा' मैं चलता हूँ। 'उसे लगा शायद इस जान-पहचान से अगले दिन काम जल्दी हो जाए।

           'आप ज़रा रुकियेगा, मैं  देखकर आती हूँ शायद आज की डाक में आ गई हो।' लड़की ने उसे रुकने का इशारा किया। फिर उसने उस ग्राहक का काम निपटाया फिर पीछे के दरवाज़े से निकल कर एक अन्य कक्ष में चली गई।

            कुछ देर बाद वह लौटकर आई' साँरी, आज की डाक में भी आपके नाम से कुछ नहीं हैं।'

           'अच्छा मैं चलता हूँ' उसे लगा वह व्यर्थ ही इतनी देर वहाँ रुका। बाहर आकर उसने हाथ में पड़े कागज़ के गोले को हवा में उछाला और फुटबाल की तरह उस पर किक लगाते हुए कहा ..'हुंह, बड़े प्यार से पूछ रही थी' अकेले रहते हैं?' जैसे कह रही हो.. 'अच्छा तो आप ग़रीब  हैं। इसे टाइमपास करने के लिये मैं ही मिला था।'उसे इतनी ज़ोरों से भूख लगी थी कि उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह सोच क्या रहा है और बोल क्या रहा है।

             वह सोचने लगा.. पता नहीं कहाँ अटका होगा उसका पैसा। दफ्तरों में कागज़ात कई दिनों तक अटके रहते हैं। सबको बस अपनी फिक्र होती है चाहे कोई उनकी राह देखते देखते भूखा मर जाए। उसे पूरी व्यवस्था से चिढ़ होने लगी, नेताओं की आश्वासन लुटाने  वाली जीभ, उज्ज्वल भविष्य का सब्ज़बाग दिखाने वाली सरकारी योजनाए.. सब कुछ उसके क्रोध के दायरे में था।

             फिर उसका गुस्सा अपने माँ बाप की ओर ट्रांसफर हो गया। अभी उस दिन उसका दोस्त कह रहा था'माँ-बाप  जब भलिभाँति पाल नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हैं।' उसके मध्यवर्गीय संस्कारों ने प्रतिवाद किया था'माँ बाप पूरी ज़िंदगी का ठेका क्यों लेंगे। उन्होनें हमें मनुष्य के रूप में जन्म दे दिया यही क्या कम है? हमें अपने बाजुओं पर भरोसा रखना चाहिए। हालाँकि अपनी बात के खोखले पन से वह वाक़िफ था। उसे यह भी पता था कि इसके बाद भी उसका संघर्ष समाप्त नहीं होगा। पढ़ाई फिर रोज़गार और भी ढेरों समस्यायें। हर सहानुभूति रखने वाले से निष्कर्ष के रुप में एक ही उत्तर मिलता है' बेटे,  रोजगार देने का और ज़िन्दगी की समस्याओं को सुलझाने का ज़िम्मा सरकार का है,जाओ उसीसे मांगो।'

 

            किसी तरह वह दिन भी बीत गया। गनीमत कि शाम को एक मित्र मिल गया और एक दुकान से एक प्लेट भेल उसने खिलादी।वह उससे कह भी नहीं पाया कि उसने उस पर क्या अहसान किया है। अगले दिन कांपते हुए कदमों से उसने फिर बैंक की उस इमारत में प्रवेश किया। लड़की को काम में व्यस्त देख काउंटर के बगल में,अपनी पैंट पर हथेलियों का पसीना पोंछते हुए वह चुपचाप खड़ा हो गया।

 

           'अरे आप?' लड़की ने कुछ देर बाद नज़रें उठाई। फिर कम्प्यूटर के की बोर्ड पर उंगलियाँ चलाकर उसने स्क्रीन की ओर देखा और पूछा' कितने रुपयों की एम .टी . आने वाली थी आपकी?

            लड़के ने जबाब दिया' यही कोई एक हजार की।' फिर खुश होकर पूछा' आ गई क्या?'

            लड़की ने कोई जबाब नहीं दिया। बस मुस्कराते हुए उसने एक विथड्राल फॉर्म लाकर उसके सामने रख दिया और कहा' लीजिए एक हजार भर दीजिए।'फिर वह कम्प्यूटर पर अपना काम करने लगी।

            उसने फॉर्म भरकर पासबुक सहित उसे थमा दिया। लड़की ने उस वाउचर को कम्प्यूटर पर पोस्ट किया फिर उसे लेकर पीछे साहब के पास गई, आकर ड्राअर खोला और सौ सौ के दस नोट उसके सामने रख दिए। उसने जल्दी से नोट गिने और' अच्छा धन्यवाद  ' कहकर बैंक की इमारत से बाहर आ गया।

             कमरे पर पहुँचकर सबसे पहले उसे कमरे का किराया देना था। दरवाज़ा खोलते ही फर्श पर पड़े पोस्टकार्ड पर उसकी नज़र पड़ी वह लिखावट से पहचान गया पिताजी का पत्र था। उसकी नज़र इन पंक्तियों पर अटक गई 'बेटा, तुम बहुत बेसब्री से पैसों का इंतजार कर रहे होगे, लेकिन क्या बताऊँ, इस बार धान अभी तक नहीं बिका है, वैसे भी बहुत कर्जा हो गया है। साहूकार ने भी आगे कर्जा देने से मना कर दिया है सो फिलहाल तुम्हें पैसा नहीं भेज पा रहा हूँ। जैसा भी हो महिने दो महिने कहीं से उधार लेकर काम चला लेना .. जैसे ही व्यवस्था होगी ......

             वह आगे नहीं पढ़ पाया .. उसके दिमाग में तेजी से पहले तो एक सवाल उभरा .. तो खाते में फिर पैसे कहाँ से आये और फिर जेहन में उभर आया काउंटर के पीछे मुस्कराता हुआ वह चेहरा। वह उन आँखों में छिपे दर्द को याद करने की कोशिश करने लगा।


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