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Ekta Gupta

Drama


4.5  

Ekta Gupta

Drama


काली रात

काली रात

5 mins 673 5 mins 673

"तुम कब तक यूँ अकेली रहोगी?" लोग उससे जब तब यह सवाल कर लेते है और वह मुस्कुराकर कह देती है, "आप सबके साथ मैं अकेली कैसे हो सकती हूँ।"

 उसकी शांत आँखों के पीछे हलचल होनी बंद हो चुकी है। बहुत बोलने वाली वह लड़की अब सबके बीच चुप रहकर सबको सुनती है जैसे किसी अहम् जवाब का इंतजार हो उसे।

 जानकी ने दुनिया देखी थी उसकी अनुभवी आँखे समझ रही थी कि कुछ तो हुआ है जिसने इस चंचल गुड़िया को संजीदा कर दिया है लेकिन क्या?

"संदली!, क्या मैं तुम्हारे पास बैठ सकती हूँ ?", प्यार भरे स्वर में उन्होंने पूछा।

"जरूर आंटी, यह भी कोई पूछने की बात है।", मुस्कुराती हुई संदली ने खिसककर बेंच पर उनके बैठने क लिए जगह बना दी

"कैसी हो? क्या चल रहा है आजकल ?", जानकी ने बात शुरू करते हुए पूछा।

"बस आंटी वही रुटीन, कॉलिज - पढ़ाई " संदली ने जवाब दिया। "आप सुनाइए।“

“बस बेटा, सब बढियां है। आजकल कुछ न कुछ नया सीखने की कोशिश कर रही हूँ।" चश्में को नाक पर सही करते हुए जानकी ने कहा।

"अरे वाह! क्या सीख रही है इन दिनों ?", संदली ने कृत्रिम उत्साह दिखाते हुए कहा, जिसे जानकी समझकर भी अनदेखा कर गयी।

"चलो छोडो यह सब बातें, जानकी ने कहा।" संदली बेटा तुम मुझपर भरोसा कर सकती हो। मैं तुम्हारी माँ की सबसे प्रिय सहेली हूँ, तो हुई न तुम्हारी माँ जैसी। अपना दिल हल्का कर लो बेटा, बताओ न क्या हुआ ? क्यों इतनी खुश रहने वाली संदली इतनी खोयी -खोयी है ?

माँ शब्द सुनते ही संदली को माँ -बाबूजी की याद आ गयी। कितने सपने सँजोए थे, उन्होंने मेरी पढाई की, मुझे अफसर बनाने की। अतीत का एक -एक पन्ना उसकी दृष्टि पटल पर छा गया।

वह सपनो की नगरी में बहुत उत्साह से आयी थी। अपना और अपने माँ- बाबूजी का सपना पूरा करने, बड़ा अफसर बनने, लेकिन सपनो की नगरी की चकाचौंध ने मेरे आँखों पर परदा डाल दिया और मुझे अँधेरे खाई में धकेल दिया। मेरे स्थिति ‘चिराग तले अँधेरा’ मुहावरे को चरितार्थ कर रही थी। मुंबई जाने के बाद जब मैं कालेज गयी, वहां मेरी मुलाकात एक रईसजादे समीर से हुई। जो हर तरह से आकर्षक था। पहले दिन से समीर मुझे अच्छा लगने लगा, इसीलिए जब उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो मैं मना नहीं कर पायी। कुछ ही समय में मैं उसकी आदी हो गयी। उसका साथ मुझे अच्छा लगने लगा। हरपल मैं उसके बारे में ही सोचती रहती थी। उसकी उपस्थिति मुझे विशेष बनाती थी। एक दिन उसने मुझे अपने घर पार्टी में बुलाया और उसके घर जाना मेरी सबसे बड़ी भूल थी।

उस काली रात को मैं शायद कभी भूल न पाऊँ। इतने भोले चेहरे के पीछे हैवान होगा जान भी न पायी। उठने पर मैंंने देखा मेरे आस-पास बहुत सारी लड़कियां थी और हमारे सामने वो हैवान समीर और रज्जो बाई, जो लड़कियों के खरीद- बिक्री का धंधा करती है, बैठे थे। उसने मुझे महज पचास हजार रूपये में बेच दिया था। उसे देखते ही क्रोध से मैं उबल पड़ी लेकिन अपने -आप को असहाय महसूस कर रही थी।

मैं यहाँ अपनी जिंदगी सवारने आयी थी लेकिन मैंंने अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार ली थी। वहां से मैं निकलना चाह रही थी लेकिन मेरी सारी कोशिशें नाकाम रही। आज पूरे तीस दिन बीत गए सांसत भोगते हुए। मैं इसी उधेड़बुन में थी कि कैसे निकला जाय तभी दरवाजा खोलकर रज्जो बाई आयी और गरज कर कहने लगी-"ऐ लड़की ! तैयार हो जा, तुझे जाना है। " कुछ देर बाद एक लड़का आया और मुझे उठाकर डिक्की में डाल दिया और चल पड़ा। इस जंजाल से निकलने का सुनहरा मौका आज ही है, ऐसा सोचकर मैं उत्साहित थी। गाड़ी तेजी से आगे बढ़ रही थी, तभी गाड़ी के रुकने का अहसास हुआ। मुझे पता चला कि पुलिस नाके पर कुछ चेकिंग हो रही है।

मैंंने धीरे से अपनी चुन्नी का एक सिरा डिक्की के बहार लटका दिया।

गाड़ी जैसे ही आगे बढ़ने वाली थी वैसे ही एक हवलदार ने आकर गाड़ी को रोक लिया और डिक्की खोलकर मुझे निकाला और अस्पताल में भर्ती कराया । ड्राइवर को पकड़ लिया गया और उससे पूछताछ हुई, लेकिन वहां पुलिस को कुछ भी न मिला। पूरे दो दिनों के बाद मुझे होश आया, पूछताछ हुई और समीर को पकड़ लिया गया। उसके माध्यम से रज्जो बाई को भी पकड़ लिया गया। मैं अपने गांव चली गयी। घर पहुंचते ही किसी अनहोनी की आशंका से घिर गयी। घर पूरा वीरान था। आस-पास के लोगों से पूछने पर पता चला कि माँ -बाबूजी ने मुझे खोजने की कोशिश की,पता नहीं चलने पर वे निराश हो गए और उसी परेशानी कि वजह से उनका प्राणांत हो गया। ये सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी। मेरी गलती की कीमत मुझे माँ- बाबूजी के प्राणो से चुकानी होगी, मालूम न था। जानकी, संदली का हाथ थामे बैठी थी। संदली की आपबीती सुनकर उनके आँखों में आंसू आ गए और संदली जोर- जोर से रोने लगी। जानकी को उसकी शांत आँखों का मतलब समझ आ गया था। जानकी ने संदली को गले लगाया और बोला- "बेटा जो हुआ सो हुआ, तू अब से अकेली नहीं है।" तुझे पता है मेरी बेटी भी ऐसे ही हादसे का शिकार हुई थी। अपने इसी खालीपन को भरने के लिए मैं दिनभर व्यस्त रहती हूँ और कुछ न कुछ नया सीखने का दिखावा करती हूँ। रमा की कमी को अब तू पूरा करना। जानकी अपने साथ संदली को घर ले गयी और बहुत प्यार से उसकी देखभाल करने लगी। प्यार पाकर उसकी मनोदशा सुधरने लगी और वह फिर से खिलखिलाने वाली संदली बन गयी।


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