जीवन का संघर्ष:
जीवन का संघर्ष:
जीवन का संघर्ष: प्रकृति की गहन शिक्षा
एक शांत उद्यान में, जहाँ फूलों की सुगंध हवा में घुली रहती थी और पत्तियों की सरसराहट संगीत सी प्रतीत होती थी, एक विचारशील व्यक्ति प्रतिदिन टहलने आया करता था। उस उद्यान की हरियाली उसे जीवन की गहराइयों में ले जाती थी। एक दिन उसकी दृष्टि एक पेड़ की टहनी पर लटकते कोकून पर पड़ी – एक तितली का कोकून, जो अभी-अभी परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा था। कोकून की सतह चिकनी और मजबूत थी, प्रकृति का एक चमत्कारिक कवच, जिसमें एक छोटा-सा जीवन छिपा था।
व्यक्ति ने उस कोकून को रोजाना देखना शुरू कर दिया। वह उसमें छिपे रहस्य को समझने का प्रयास करता, प्रकृति के उस सूक्ष्म चक्र को महसूस करता। दिन बीतते गए, और एक सुबह उसने देखा कि कोकून में एक छोटा-सा छेद उभर आया है। तितली का जन्म होने वाला था। उत्सुकता से भरकर वह वहीं बैठ गया, घंटों निर्निमेष उसकी ओर टकटकी लगाए। उसने देखा कि कोकून के अंदर से तितली संघर्ष कर रही है। वह बार-बार छेद से बाहर निकलने का प्रयास करती, अपने नाजुक शरीर को धकेलती, पंखों को फड़फड़ाती। घंटों की मेहनत के बाद भी वह बाहर नहीं निकल पाई। थककर वह शांत हो गई, मानो हार मान ली हो। उसकी यह दयनीय दशा देखकर व्यक्ति के हृदय में करुणा उमड़ आई।
अपनी दया और जल्दबाजी में उसने सोचा, "मैं इस बेचारी की मदद करूँगा।" उसने एक छोटी कैंची ली और कोकून के छेद को सावधानी से बड़ा कर दिया, इतना कि तितली बिना किसी कष्ट के बाहर आ सके। और ऐसा ही हुआ। तितली आसानी से कोकून से निकल आई। व्यक्ति ने राहत की सांस ली। लेकिन जैसे ही तितली बाहर आई, उसकी दशा देखकर वह स्तब्ध रह गया। उसका शरीर सूजा हुआ था, भारी और असंतुलित। पंख सिकुड़े हुए, सूखे और कमजोर। वह उन्हें फैलाने का प्रयास करती, लेकिन व्यर्थ। व्यक्ति उत्सुकता से उसे देखता रहा, सोचता कि अब वह अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर आकाश में उड़ने लगेगी, स्वतंत्र होकर फूलों का रस पीने लगेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ श्रीमद भगवद गीता २-४८
हे धनंजय (अर्जुन)! तुम आसक्ति (फल की इच्छा) का त्याग कर, सिद्धि और असिद्धि (सफलता और असफलता) में समान बुद्धि होकर अपने कर्तव्य (कर्म) करते रहो। समभाव ही योग कहलाता है।
बेचारी तितली कभी उड़ नहीं पाई। उसके पंख कभी मजबूत नहीं बने। उसे अपनी शेष जिंदगी जमीन पर घिसटते हुए बितानी पड़ी – फूलों की पहुंच से दूर, आकाश की स्वतंत्रता से वंचित। वह व्यक्ति अपनी अच्छाई और करुणा के भाव में इतना खो गया कि उसने प्रकृति के गहन नियम को नहीं समझा। दरअसल, कोकून से बाहर निकलने का वह कठिन संघर्ष प्रकृति की जानबूझकर रची गई प्रक्रिया थी। उस छोटे छेद से निकलने के लिए तितली को जितना अधिक प्रयास करना पड़ता, उतना ही उसके शरीर का तरल पदार्थ पंखों में पहुँचता। वह संघर्ष ही पंखों को मजबूती और लचीलापन देता, जिससे बाहर आते ही वह उड़ सके। लेकिन व्यक्ति की दया ने उस संघर्ष को छीन लिया, और परिणामस्वरूप तितली आजीवन अपंग रही।
यह छोटी-सी घटना जीवन का एक गहरा सबक है। संघर्ष जीवन की अनिवार्यता है। यह वह अग्नि है जो हमें मजबूत बनाती है, वह दबाव जो हीरे को जन्म देता है। हम अक्सर अपने प्रियजनों को कष्ट से बचाने के लिए जल्दबाजी में हस्तक्षेप करते हैं – माता-पिता बच्चे की हर मुश्किल को आसान बना देते हैं, मित्र विफलता से बचाने के लिए रास्ता सरल कर देते हैं, या हम खुद जीवन की चुनौतियों से भागते हैं। लेकिन यही जल्दबाजी हमें कमजोर बना देती है। संघर्ष से ही चरित्र का निर्माण होता है, आत्मविश्वास जागता है, और सफलता का स्वाद मीठा लगता है। बिना संघर्ष के मिली सफलता खोखली होती है, जैसे वह तितली जो उड़ना भूल गई।
प्रकृति हमें बार-बार सिखाती है कि कष्ट सहन करना ही विकास का मार्ग है। बीज को अंकुर बनने के लिए मिट्टी के बोझ को झेलना पड़ता है, नदी को समुद्र तक पहुँचने के लिए पर्वतों को चीरना पड़ता है। इसी प्रकार मानव जीवन में आने वाली बाधाएँ हमें परिपक्व बनाती हैं। जो व्यक्ति संघर्ष से डरता है, वह कभी पूर्णता नहीं प्राप्त करता। वहीं जो धैर्य और साहस से संघर्ष करता है, वह आकाश छू लेता है।
यह सत्य प्राचीन भारतीय ज्ञान में भी प्रतिबिंबित होता है।
**उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।**
**न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥**
कार्य केवल प्रयास और परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, न कि मात्र मन की इच्छाओं या कल्पनाओं से। जैसे सोते हुए सिंह के मुँह में मृग स्वयं नहीं आते – उसे शिकार के लिए जागना और प्रयत्न करना पड़ता है।
जीवन में सफलता के लिए संघर्ष अनिवार्य है। बिना उद्यम के कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। प्रकृति का नियम है कि संघर्ष से ही शक्ति जन्म लेती है। हमें अपनी और अपनों की राह में आने वाली कठिनाइयों को सहन करने देना चाहिए, क्योंकि यही जीवन की सच्ची उड़ान का आधार है।
