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હર્ષદ અશોડીયા

Children Stories

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હર્ષદ અશોડીયા

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कृतज्ञता

कृतज्ञता

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। २/४७ ।।

"कर्म करने का अधिकार तुम्हारा है, लेकिन उसके फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और ना ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।"

इस श्लोक के मुख्य संदेश निम्नलिखित हैं:

कर्म पर अधिकार: मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्मों पर है। हमें अपने कर्मों को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करना चाहिए।फल पर अधिकार नहीं: कर्म का परिणाम या फल हमें कैसा मिलेगा, यह हमारे हाथ में नहीं है। हमें परिणाम की चिंता किए बिना अपने कार्य को करना चाहिए।फल की इच्छा से कर्म न करें: हमें कर्म करते समय फल की इच्छा या अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।आलस्य से बचाव: कर्म न करने में आसक्त मत हो। आलस्य या निष्क्रियता से बचना चाहिए और सतत कर्मशील रहना चाहिए।


ये उन दिनों की बात है जहाँ मानवता अभी भी जीवित थी। उस छोटे से गाव में, एक दिन, एक गरीब लड़का, जो स्कूल की फीस भरने के लिए घर-घर जाकर सामान बेचता था, बेहद भूखा था और उसके पास केवल एक छोटा सा सिक्का बचा था। उस सिक्के से तो कुछ आ नहीं सकता था इसलिए उसने सोचा कि अगले घर में वह खाने के लिए कुछ माँगेगा।

दरवाज़ा खटखटाने के बाद जब एक जवान लड़की ने दरवाजा खोला, तो उसकी हिम्मत नहीं हुई कुछ मांगनेकी। खाने की बजाय, उसने सिर्फ पानी माँगा। वह युवती उसकी हालत देखकर समझ गई कि वह भूखा है। दोप्रहर का वक्त – भोजन का समय बिट चूका था। इसलिए उसने उसे पानी के बजाय दूध का एक बड़ा गिलास दिया।

लड़के ने धीरे-धीरे दूध पिया और फिर पूछा, "मैं आपको कितना दूँ?" उस युवती ने जवाब दिया, "आपको कुछ देने की ज़रूरत नहीं है। हमारी माँ ने हमें सिखाया है कि दयालुता का भुगतान कभी नहीं लेना चाहिए।" लड़के ने दिल से धन्यवाद दिया और वहां से चला गया। लेकिन सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, उसका ईश्वर और इंसानियत पर विश्वास भी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया था।

सालों बाद, वही युवती एक गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। स्थानीय डॉक्टर उसकी बीमारी से परेशान हो गए थे, इसलिए उसे बड़े शहर के अस्पताल भेज दिया गया। वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह मांगी गई, और विशेषज्ञ डॉ. राधे श्याम को भी बुलाया गया। जब उन्होंने सुना कि वह महिला उसी बचपन वाले गांव से आई है, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई। वह तुरंत उसके कमरे में गए और उसे पहचान लिया। इसके बाद उन्होंने उस महिला की पूरी देखभाल और इलाज में विशेष ध्यान दिया। काफी संघर्ष के बाद आखिरकार वह महिला ठीक हो गई।

जब महिला को अस्पताल का अंतिम बिल दिया गया, तो वह डर रही थी कि उसे चुकाने में पूरी जिंदगी लग जाएगी। लेकिन जब उसने बिल देखा, तो उसकी नजर बिल के एक कोने पर लिखे शब्दों पर पड़ी। उसमें लिखा था: "एक गिलास दूध के बदले कृतज्ञता अर्पण की"

किसीने किया हुआ प्रेम का मूल्य नहीं हो सकता।

यह पढ़ते ही उसकी आँखों में आंसू आ गए, और उसने महसूस किया कि एक छोटी सी दया कैसे उसकी जिंदगी बदल सकती है। एक छोटा सा बिज जो बोया था बचपन में आज बरगद बन कर छाव डे रहा है!

"कृतं मे जानतां पुण्यं ज्ञातृन् एवोपतिष्ठति।

अज्ञातानां तु यत्कृत्यं परं पापाय कल्पते॥"


भावार्थ: जो व्यक्ति कृतज्ञ होते हैं, उनके लिए की गई भलाई पुण्य स्वरूप बनकर लौटती है। वहीं, जो अज्ञानी होते हैं, उनके लिए किया गया काम उन्हें पाप का भागी बनाता है।


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