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Deepak Bundela arymoulik

Romance

3  

Deepak Bundela arymoulik

Romance

इश्क़ दा वार-1992 (पार्ट-1)

इश्क़ दा वार-1992 (पार्ट-1)

3 mins
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वो मोहब्बत की चिंगारी 90 के दशक से सुलगना शुरू हों चुकी थी... मौसम वसंती हो कर अपने शबाब की और बढ़ रहा था.... हर यौवन के दिलों दिमाग में कहीं ना कहीं कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था जो जवानी की दहलीज़ पर थे उनके मन का स्थिर पन अब विचलित हो चला था.... मन में कोई राग बस यूं ही बजने लगता तो स्कूल के युवाओं की गुनगुनाहट यदा कदा कानों में सुनाई देने लगी थी.... पर किस के मन में कौन था किस के लिए ये संगीत था ये तो वही जानें... पर हाँ एक जगह थी जहां नज़रों ही नज़रों में कोई एक दूसरे का सुकून चैन छीन रहा था... जब पहली दफा नज़रें मिली तो कुछ अजीब से सुकून का एहसास हुआ... और वो एहसास रोज़ की आदत में बदल चुका था जब दोनों में से कोई एक किसी को ना दिखे तो सारा दिन मायूसी सें भरा रहता.. लेकिन करे भी तो क्या... कुछ भी तो बस में नहीं था... तो मन की कसक मन में ही रख कर सारी रात उन हसीन आंखों में एक दूसरे की तस्वीर को महसूस करते करते पूरी रात गुज़ार देते... अल सुबह फिर समय से पहले घर से भागने को मन मचल उठता... ना नाश्ता हलक से उतरे ना दूध... बस जितनी जल्दी हो मुकाम पर पहुंचने की तड़प छट पटाने लगती थी... और एक नई उमंग और चाहत की गुज़ारिश में पता ही ना चलता के स्कूल के समय के कितने पहले तीरे नज़र के दीदार को आ खड़े हुए.... हर पल घंटों की माफिक कटता और नज़रें कमबख्त उसके आने के रास्ते से हटती ही नहीं.... और काफ़ी इंतज़ार और मशक्कत के बाद वो वक़्त आ ही जाता... जो सिर्फ और सिर्फ कुछ छड़ो के लिए नज़रें मिलती और बस... मानो सब मिल गया हो.... और ये नशा फिर नज़रों के अगले दीदार तक बना रहता... कभी फिर मन में ख्याल उभरता कल मुलाक़ात होगी या नहीं.... और फिर वही सवाल और जवाब की रात... जो सुबह होने तक कशमकश में कटती....


नज़रों की मुलाकातों का ये सिलसिला चलते चलते 91वें के दशक में जा पहुंच गया था लेकिन जिस्म से अनजान को अनजान कहना भी मुनासिब न होगा... क्योंकि नज़रें तो परिचित हो चुकी थी... और दिल भी तो एक दूजे का हो चुका था बस कमी थी की पहला शब्द अपने हलक से कौन निकाले... यही सोचते सोचते इस मुलाक़ात का दूसरा बसंत आ चला था...


आज अनु और मनु ने ठान ही लिया था अब चाहे जो हो इस रिश्ते को कोई तो शब्द देना होगा...अनु आईने के सामने खड़ी होकर कई बार प्रेक्टिस कर चुकी थी... लेकिन वो नज़रों का जब उसे एहसास होता तो चेहरा लाल हो उठता और नज़रें शर्म से झुक जाती... तभी मन की आवाज़ उसे कानों में सुनाई देती... तुझसे ना होगा... क्यों फ़ालतू के इश्क़ में पड़ी है.... लेकिन दिल तो मजबूर था उसने तो जुबान और कान को अपने काबू में जो कर रखें थे... बस तभी होंठ हिल पढ़ते है ... अ... अ.. आई.... ल.s.s.s...व.... यू.... मनु और अनु शर्मा कर दौड़ती हुई कमरे के बाहर निकल कर भाग जाती है... इश्क़ का जोश ना जानें कितनी हिम्मत दे देता है ये तो इश्क़ करने वाला ही जानता है.....


आगे पार्ट दो में पढ़े....


क्रमशः


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